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लॉकडाउन' : धन्यकुमार बिराजदार का समसामयिक कहानी संग्रह
October 25, 2020 • स्मिता खंडप्पा सिताफळे


      कोरोना जैसी महामारी से आज पूरा विश्व प्रताड़ित हुआ है। विश्व के अधिकाधिक देशों में कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या बढती जा रही है। अमेरिका, इंग्लैंड, चीन के साथ-साथ खाड़ी देश भी कोरोना का समाधान ढूंढ रहे हैं, वैक्सीन रिसर्च काम अंतिम चरण में होने के समाचार पढने में भी आते हैं। यदि प्रगत, विकसित देशों की अवस्था वैसी हो तो भारत का क्या जैसे प्रश्न सबको सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं। भारत में अचानक कोरोना मरीजों की बढ़ती संख्या तथा समाज पर होने वाले परिणामों का विचार करते हुए कई रचनाकार विविध आयामों पर कलम चला रहे हैं, चिंतन कर रहे हैं। इसी कड़ी में महाराष्ट्र के सोलापुर से अहिंदीभाषी धन्यकुमार बिराजदार भी कोरोना की आपत्कालीन स्थिति पर कहानी लिखते हुए सामाजिक दायित्व निभा रहे हैं। जनवरी महीने में भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली से "समाज धन" नामक कथा संग्रह प्रकाशित हुआ है। इसमें स्त्री विमर्श, वृद्ध विमर्श, बाल विमर्श के साथ समकालीन परिस्थितियों का सजीव चित्रण है। 
      धन्यकुमार बिराजदार ने वर्तमान परिस्थिति पर प्रकाश डालते हुए अनेक कहानियाँ लिखी हैं। लॉकडाउन शुरू होते 'लॉकडाउन' शीर्षक से कहानी संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली से जून 2020 में प्रकाशित किया। शायद यह कोरोना कालीन परिस्थितियों पर प्रकाशित प्रथम कहानी संग्रह होगा। इसमें कुल सोलह कहानियाँ हैं। प्रवासी मजदूरों की समस्या को लेकर "लॉकडाउन" नामक कहानी में मुंबई में काम कर रहे मजदूरों की समस्या का चित्रण किया है। इस कहानी में एक नायक अपनी पत्नी जगदेवी तथा बच्चा मुन्ना को लेकर लेकर मुंबई में रहता है परंतु लॉकडाउन घोषित होने के बाद वह मुंबई में समस्या का सामना करता है। कहानी में शुरू-शुरू में ट्रेन बंद होने पर गाँव लौटने वाले मजदूरों की मनोदशा चित्रित है। अशिक्षा के कारण मजबूर मजदूर मुंबई में मजदूरी करते हुए बेटे मुन्ना को पढाने का स्वप्न देखता है, परंतु मजबूर होकर ट्रेन की पटरी से होकर गाँव की ओर लौटता है। लॉकडाउन शुरू होते ही विदेश में बसे भारतीय नागरिकों को स्वदेश लाया जाता है, परंतु भारत के विभिन्न स्थानों में फंसे मजदूरों की गाँव लौटाने की व्यवस्था तुरंत नहीं की गई। इस पर उनके शब्द इस प्रकार हैं- "वाह ! कैसा चमत्कार है। आश्चर्य की बात है, विदेश में बसे भारतीय नागरिकों को सम्मान के साथ हवाई जहाज से भारत लाया गया था। वे तो भारत में पढ़-लिखकर पैसे कमाने के लिए, अमीर बनने के लिए परदेस गए थे और हम तो पापी पेट भरने के लिए गाँव से चार-पाँच सौ किलोमीटर दूर मुंबई आए थे। अब राष्ट्रभक्ति हमारी कि उनकी जो भारत सरकार के पैसे से साक्षर हो गए थे और मातृ-ऋण, पितृ-ऋण चुकाने के बदले धन कमाने के लिए अमेरिका, इंग्लैंड, इटली तथा अरब आदि देशों में गए थे।" मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले मजदूरों के लिए घंटा गाड़ी का वह विज्ञापन व्यर्थ है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से आने पर डॉक्टर तथा प्रशासन से संपर्क करने के लिए कहा जाता है। झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले काम न होने पर गाँव लौटते समय ही रेलवे पटरी पर पकड़े जाते हैं और उन्हें पुनः महानगर ले जाकर क्वारंटीन किया जाता है। परंतु उसमें नायक की पत्नी की मृत्यु हो जाती है और वह इकलौते मुन्ना को साथ लेकर गाँव लौटता है। इसमें सामाजिक दूरी बनाए रखने के साथ मानव धर्म निभाने का संदेश देते हुए कहा गया है, "धर्म तो एक ही है मानव धर्म! जहाँ हम पड गए हैं यहाँ कोई अन्य धर्म नहीं है। हमें मानव धर्म निभाना है, राष्ट्र धर्म निभाना है। कोरोना कोई धर्म, जाति, भाषा या ऊंच-नीच नहीं जानता। उसे इतना ही मालूम है कि जो उसे मिलता है वह उसे ले जाता है ...सदा के लिए।" इस तरह 'लॉकडाउन' कहानी में प्रवासी मजदूरों की व्यथा का चित्रण किया गया है। ठीक इसी तरह मजदूरों का चित्रण 'कन्हैया' कहानी में है। पापी पेट भरने के लिए हैदराबाद जाने वाले युवक की पत्नी आखिर लॉकडाउन में गाँव की ओर लौटते समय पति और बच्चों को खो बैठती है।
     "कोरोना सप्तपदी" नामक कहानी में लेखक ने श्रेयांश और कोमल नामक दो डॉक्टरों द्वारा सामाजिक दायित्व निभाने का संदेश दिया है। कोमल और श्रेयांश की शादी तय हो गई थी परंतु लॉकडाउन के कारण दो बार शादी पोस्टपोन कर दी गई थी। गाँव के ही मरीज डॉ. सदानंद को कोमल जब शहर ले जाती है और उसका कोरोना का निदान होता है तब पंद्रह-सोलह दिन मंगेतर पति के साथ ही रहती है। गाँव लौटते समय सभी कोमल और डॉक्टर श्रेयांश को विवाह करने की सलाह देते हैं। विवाह के बाद डॉक्टर श्रेयांश अपनी पत्नी कोमल को सामाजिक दायित्व निभाने हेतु कोरोना की नयी सप्तपदी की परिक्रमा पूर्ण करने के लिए कहता है। इसमें आरोग्य सेतु ऐप, सामाजिक दूरी के साथ-साथ गरीबों की देखभाल, माता-पिता की देखभाल के साथ मजदूरों का खयाल रखना आदि का विचार करते हुए पत्नी कोमल से कहता है," कोमल ! तुम तो मेरी भार्या बन गई हो। सप्तपदी का अर्थ है विवाह की एक रीति, जिसमें वर और वधु अग्नि के चारों ओर सात परिक्रमा करते हैं। इसमें कई परिक्रमाएँ हमने पूरी की हैं पर कई परिक्रमाएँ बाकी हैं। तुम जानती हो कि वर्तमान की सप्तपदी कुछ और ही है।" डॉ श्रेयांश आगे कहता है, "यदि तुम इधर ही रहोगी तो शादी का बहाना कर पति के घर जाने वाली डॉक्टर साहिबा के रूप में और दूसरी ओर भगोड़ा पत्नी के रूप में तुम कलंकित हो जाओगी। क्या तुम मेरी पत्नी के रूप में यह कलंक पसंद करोगी ? क्या कलंकित पति के रूप में मैं भी तुम्हें अपने कर्तव्य से दूर यहाँ ले आऊं? बोलो, बोलो कोमल! अब तुम्हें बोलना चाहिए।" और अंत में कोमल कोरोना सप्तपदी की परिक्रमा पूर्ण करने हेतु विवाह होकर भी गाँव वापस लौटती है।
     'मास्क' नामक कहानी में सब्जी मंडी के सामने बैठे भीखमंगों को दान के रूप में मास्क देने वाले गोपाल का चित्रण किया गया है । भिखारियों को मास्क देते हुए वह कहता है,"देखो, एक दिन तुम्हें भीख नहीं मिली तो भी चलेगा, पर जान गई तो दुबारा नहीं मिलती, समझी? मास्क को ठीक इसी तरह अपने बच्चों को भी बांध दो। और देखो, बार-बार मास्क को हाथ भी मत लगाना। मैं जानता हूँ तुम्हें सुबह से खाने के लिए कुछ नहीं मिला होगा। यह लो मेरी थैली। यह घर ले जाकर ठीक से धोकर और अपने हाथ भी साबुन से धोकर ही खाना।" कहते हुए उन्हें सब्जी और फल भी देता है । चोर समझकर उसके पीछे पड़े पंचकल्याणक मेडिकल के लोगों से गोपाल नामक लडका कहता है, "अरे नहीं अंकल! गणतंत्र दिवस पर 'मेरे सपनों का भारत' विषय पर आयोजित वाक् प्रतियोगिता में मुझे प्रथम क्रमांक मिला है। आखिर वे रुपये भी तो भारत के ही हैं। उसी में से आपको मास्क के रुपये दे दूँगा।" 
     लॉकडाउन कालावधि में कई घरों में बढता तनाव भी देखा गया है। एक ही परिवार में तीन-तीन पीढियाँ एक साथ रहती हो और जनरेशन गैप के कारण विचारों में परिवर्तन आया तो तनाव निर्माण स्वाभाविक है। लॉकडाउन कालावधि में सास-बहू का मनमुटाव आखिर घर के मुखिया को आत्महत्या के लिए मजबूर करता है। वह सोचता है, "... घर के बाहर जानलेवा महामारी का खतरा है। इन्हें घर के मुखिया, घर चलाने वाले की चिंता भी नहीं है। कोरोना से मर जाता तो कितना अच्छा होता... " इसका जीवंत चित्रण 'घुटन' कहानी में है। सामाजिक अंधविश्वास के कारण 'घर बेचना है' कहानी में नायक सोसाइटी के लोगों से तंग आकर घर बेचने के लिए मजबूर हो जाता है। इसी तरह 'कोरोना महिमा' कहानी में सामाजिक अंधविश्वास का बेजा फायदा लेने वाले राजनेताओं का चित्रण है। सामाजिक बुराइयों का वास्तविक चित्रण 'सुधा' कहानी में द्रष्टव्य है। गरीबी का फायदा उठाते हुए मैनेजर विवाह की पूर्वसंध्या में सुधा से बलात्कार करता है और वह  ".... भलाई इसी में है कि अपने आप को मैनेजर को सौंप दूँ क्षण भर के लिए! ... कुछ गलत भी हो जाए तो भी चिंता नहीं। कुमारी माता का कलंक भी नहीं लगेगा। आज नेकलेस गले में है, पर कल से पेट में पलने वाले बच्चे के लिए माँ की भूमिका अदा करने में डर नहीं होगा, क्योंकि नेकलेस से भी बढकर ऐसे नरभक्षकों से बचाने के लिए मंगलसूत्र गले होगा।... " सोचते हुए जीवन का समाधान पाती है। नराधमों का चित्रण कहानी में है। सामाजिक अंधविश्वास का उत्तर देने वाली महिला 'मुक्ति' कहानी में है, जो पति की कोरोना से मृत्यु होने पर कम लोगों को बुलाती है और अंत्येष्टि में सोने का टुकड़ा देने के बदले समाज हित के लिए मास्क और दवाइयाँ खरीदने के लिए उपयोग में लाती है। सामाजिक योगदान दे रहे संस्थाओं के साथ वेश्या भी सामाजिक योगदान हेतु चंदा इकट्ठा करती नजर आती है और 'पवित्र कार्य' करती है। 'पवित्र कार्य' कहानी इसका जीवित दस्तावेज है। 
     उपर्युक्त कहानियों के साथ 'वसीयतनामा', 'अंकुर', 'मास्क', 'निर्णय', 'चोट', 'माता-विमाता' जैसी कहानियों में भी कोरोना की वर्तमान ज्वलंत परिस्थिति का चित्रण किया है। भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली से प्रकाशित 'लॉकडाउन' पुस्तक में धन्यकुमार बिराजदार ने समाज के जीवंत, वास्तविक चित्रण के साथ आदर्श भी निर्माण किया है। लेखक नाराज न होकर समाज के साथ न्याय करते हुए सच्चाई से पेश आते हैं। इस दृष्टि से प्रस्तुत कहानी संग्रह समसामयिक नजर आती है। यथाशीघ्र कहानी संग्रह प्रकाशित करते हुए लेखक ने समाज को सही रूप से देखा है जिसके लिए पाठक वर्ग उन्हें धन्यवाद ज्ञापित करता है।

स्मिता खंडप्पा सिताफळे, दयानंद लॉ कॉलेज, 
सोलापुर, महाराष्ट्र