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‘चन्द्रकान्त देवताले के काव्य में जनजातीय संस्कृति तथा विविध आयाम“
February 23, 2020 •       डाॅ. मुक¢श भार्गव      • Research article

‘चन्द्रकान्त देवताले के काव्य में जनजातीय संस्कृति तथा विविध आयाम“

          डाॅ. मुक¢श भार्गव     
                (संविदा सहायक प्राध्यापक) 
तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति अध्ययनषाला 
देवी अहिल्या विष्वविद्यालय, इन्दौर (म.प्र.)


 कवि चन्द्रकान्त देवताले की कई रचनाअ¨ं में स्वातंत्रेŸार भारत की समाज विर¨धी तत्व¨ं, गरीबी, बेर¨जगारी, महंगाई, व्यक्तिगत स्वार्थ परकता, ईश्वरी तत्व¨ं क¢ प्रति नकारवादी दृष्टिक¨ण, धार्मिक मतभेद, साम्प्रदाकि भेदभाव, आदि की ह्रासमान स्थितिय¨ं का प्रभावी चित्रण दिखाई देता है। 

 सन् 1960 क¢ दशक क¢ बाद समकालीन काव्यधारा में अर्थ बढता कर्ज, पेट्र¨लियम पदाथर्¨ं में बढ़ती कीमतें, आदि क¢ कारण जनमानस में जटिल समस्याएं पैदा हुई जिनका जिक्र‘ बड़ी उग्रता क¢ साथ व्यक्त किया गया।

 दुष्यंत कुमार ने अपनी एक गजल में इस स्थितिय¨ं का बड़ा मार्मिक उल्लेख किया है। वे कहते हैं-
   ‘हां तक आते-आते सूख जाती है कई नदियां।
                      हमें मालूम है कि पानी कहां ठहरा हुआ है।’

  स्वतंत्र निर्णय कभी नहीं कर पाता। ताकतवर ल¨ग सरकार बनाते हैं। गरीब¨ं के क¢न्द्र पर वे व¨ट हासिल कर जनता पर ही शासन करते हैं। कवि चन्द्रकान्त देवताले कहते है-
   ‘सरकार भी सरकार बनने क¢ लिए
     झाँकती है द¨न¨ं की दुनियां में
                      फिर मुुðी भर दाने छितरा कर
                      लड़वा देती है आपस में
                      और एक नाजूक ’म©का देख मांगती हैं ताकत
                      उन कर¨ड़¨ं कमज¨र ल¨ग¨ं से
                      जिनकी आँख¨ं में जलता हुआ जंगल।’
                      सारी दुनिया क¨ देकर अपनी ताकत
                      वे नहीं जानते ताकत कहां हैं
                      खड़ी करक¢ सरकार पूछते हैं सरकार कहाँ है।
  कवि ने स्वातंत्र्तयोत्तर, सामाजिक स्थिति पर काफी कुछ लिखा है। झूठे फरेबी नेता, काला बाजारी करनेे वाले और मुनाफाख¨र¨ं क¢ षडयंत्र, खून चूसने वाले पूंजीपति खटमल और इस बीच भूख, बेबसी, बीमारी क¢ शिकार ह¨कर चूह¨ं की तरह दम त¨ड़ते ल¨ग, और उन्हीं पर रिश्वतख¨र, न©करशाह¨ं द्वारा सŸााये जाने वाले आम जन।
    ‘वह एक आदमी
                      नंगी सड़क पर, खेत क¢ किनारे या जंगल में
                      भूख से दम’ त¨ड़ देता है
                      कत्लेआम की तरह नहीं ह¨ता कुछ भी
                      हजार¨ं मरे हुए चूह¨ं की दुर्गन्ध क¢ विस्फ¨ट में
                      तड़फड़ाती तितलिय¨ं की तरह दम घुटता रहता है
                      रिश्वतख¨र न©कर शाह¨ं द्वारा सताये जाने वाले
                      अब¨ध¨ं की गिनती करते-करते
                      बचपन से उमर बीत जाने तक थक जायेगंे।’
  आदिवासी और दलित¨ं क¨ लिए भी कवि ने अपनी सहानुभूति व्यक्त की है। आधुनिक जीवन से कटे, एकान्त जंगल¨ं में अपने अभावगग्रस्त कष्ट भरे जीवन बीताने वाले बस्तर क¢ आदिवासी, जिन्हें विकास क¢ नाम पर न©करशाह¨ं और राजनेताअ¨ं ने भी उन्हें जी भर कर लूटा है, आज भी वे ल¨ग खुशहाली का जीवन जीने क¢ लिए तरस रहे है।

 कवि चन्द्रकान्त देवताले ने उनकी घुटनभरी जिंदगी का मर्म भेदी किन्तु यथार्थ चित्रण किया है।-
   ‘पर मैं देख रहा हूँ
                     बस्तर क¢ जंगल में जन्मान्ध अंधेरे का दमा
                     पेट भर टंगे घ¨सल¨ं में कैद
                     चिन्ताअ¨ं क¢ छिन्न-भिन्न क¢ंचुल
                     कहां हैं हमारा गाढा खून
                     हमार पैतृक मस्तक
                     स्वाभिमान से दमकता हुआ
                     पसीन¨ं क¨ पीता
                     आदमी का ल¨हा
                     अब क¢ फिर मुर्गे पक¢ंगे
                     मंद और सल्फी की हांडी फूटेगी
                     माद्री का थाप थिरक¢गी बस्तर की लड़किांया
                     ब्लाउज नहीं पहनेगी क¨ई भी लड़की
                     चाहे ज¨ भी ह¨ं उनक¢ पास
                     मांस क¢ जंगल में घँसते
                     त¨ड़ी की हुकुमत क¢ साथ
                     नाचेगी लड़किाँ सारी रात
                     जुल्म की आरी क¢ नीचे छिरता हुआ
                      उसका पूरा दिन
                      दुबक कर रह ह¨गा ’धुए की छाह क¢ पीछे।’

  धूरे क¢ दिन भी कभी पलट जाते हैं। बुरे दिन टल जाते हैं। खुशहाली फिर ल©ट आती है, लेकिन बस्तर क¢ इन जनजाती ल¨ग¨ं की दशा में क¨ई बदलाव आज भी नजर नहीं आता। कवि ने इसी प्रसंग पर कहा है-
   ‘दस बरस में चमक जाती है
      धूरे की किस्मत भी
                      पर तीस बरस से यहाँ त¨
                      वैसा का वैसा ही अन्धेरा है
     बस्तर त¨ घूरा नहीं
                      पिंजरा है म¨हने वाली मैना का
                      बस्तर त¨ मादल हैं
                      हवा की पीठ पर बजता हुआ।’

  कुल मिलाकर सीदे साधे, भ¨ले भाले आदिवासी ल¨ग सभ्य कहे जाने वाले बनिय¨ं, अफसर¨ं तथा अन्य लुटेर¨ं क¢ द्वारा कि¢ जाने वाले अन्याय और अत्चार¨ं से त्रस्त हैं, पीड़ित है। किन्तु जुल्म का यह सिलसिला अनवरत बढता ही रहा है। एक अत्याचार क¢ बाद दूसरा अत्याचार तत्पर है। जुल्म की चक्की मे बेचारे अब¨ध आदिवासी आज भी पिस रहे है।
 चन्द्रकान्त देवताले ने अपनी रचना ‘आग हर चीज में बताई गई थी’ में बाहर क¢ जनजीवन की व्यथा का चित्रण इस प्रकार किया है-
   ‘कब तक देखते रह सक¢ंगे वे
     उनकी ही हड्डिय¨ं पर खड़े किए हैं
      आलीशान ’हल डंडी मार बनिय¨ं ने
                      कर¨ंड़¨ं का हिसाब चुकता करना हैं, उन्हें
                      शताब्दिय¨ं का, पेड़¨ं का असंख्य‘
                      पीठ पर पड़े चाबुक क¢ निशान¨ं का
                       ग¨श्त का हिसाब, खून का 
                      साँवली वन कन्याअ¨ं की चीख और सिसकिय¨ं का,
                      भंग-धड़ंग बच्च¨ं क¢ फूले हुए पेट
                      और बूढी नंगी देह¨ं की 
                      आत्मा की झुरिय¨ं का हिसाब।’
  बस्तर में जनजीवन में आज भी विकास का मुँह नहीं देखा है। बचपन से ही आदिवासी बच्च¨ं क¨ पेट भरने क¢ लिए दिन रात कष्ट उठाना पड़ता है।

 आदिवासी लड़कियाँ चकाच©ंध वाले शहर में भयभीत चिड़ियां की तरह लगती है-
   ‘फकत भयभीत चिड़िय¨-सी
      देखती रहती है लड़कियां सात
                      बड़ी फजर से आकर बैठी गई है
                      पत्थर क¢ घ¨ड़े क¢ पास।’
                      ‘ह¨ंगी अंधेरे क¢ कई-कई म¨ड़ पर
                      इस वक्त मेरे देश की कितनी ही आदिवासी बेटियाँ।’
  आदिवासिय¨ं का जीवन अभावग्रस्त रहा है। जंगल¨ं में और पहाड़¨ं में रहकर पेट भरना बहुत मुश्किल ह¨ रहा है। आदिवासी ल¨ग हर बार ’मौसम पर अन्यत्र मजदूरी क¢ लिए अन्यत्र पलान करते हैं।
 
 यूं त¨ पुरुष प्रधान समाज में नारी की स्थिति में क¨ई खास परिवर्तन नहीं आया है। नारी अपना सब कुछ अपने परिवार क¢ लिए समर्पित कर देती है। इसक¢ बावजूद भी अपनी क¨ई निजी पहचान नारी क¢ पास अब भी शेष नहीं है। इसी बात क¨ कवि चन्द्रकान्त देवताले ने निम्नांकित शब्द¨ं में व्यक्त किया है-
   ‘एक औरत का धड़
     भीड़ में भटक रहा है
      उसक¢ हाथ अपना चेहरा ढूंढ रहे है
      उसक¢ पाँव
     जाने कब से
     सबसे 
                      अपना पता पूछ रहे हैं।’
 प्रस्तुत पंक्तिय¨ं में प्रतीक क¢ रूप में कवि कहता है कि एक औरत का धड़ भीड़ में भटक रहा है याने स्त्री का आज भी अपना क¨ई अस्तित्व नहीं है। वह अपने चेहरे क¨ ढूंढ रही हैं। अपनी पहचान आज भी नारी अस्तित्वहीन नहीं बनी रहती है।

   ‘ब्लाउज बदलती, साड़ी पछीटती
                     कंघी करती हुई औरतें
                     सड़क क¨ एक साथ हर’ औरत हमाम’ की
                     तरह वापरती औरतें।’
  जनता की य¨जनाअ¨ं क¨ हड़प कर धनिक बनते सŸााधारी अपने गुंडे पालते हैं। प्रजातंत्र की यह निकृष्टत’ स्थिति कवि ने बेलाग तरीक¢ से व्यक्त की है।
   ‘प्रजातंत्र की रथ-यात्रा निकल रही है
     औरत¨ं और बच्चें र¨ंदा जा रहा है
                     गुंडे और न¨ट¨ं की ताकत से हतप्रभ ल¨ग
                     खाम¨श खड़े है।’
  सŸाा पर बैठे ल¨ग संवेदनशील नहीं रहते। सŸाा पाने क¢ लिए गुंड¨ं का सहारा लेते है। औरत¨ं और बच्चे पर जुल्म’ करते हैं। हमेशा सŸााधारी ल¨ग आम जनता पर अनुचित दबाव डालते रहते हैं।

निष्कर्ष क¢ रूप में कहा जा सकता है कि समकालीन कविता में दलित¨ं, आदिवासिय¨ं और आम जनता क¢ प्रति सहानुभूति का स्वर कवि ने मुखर किया है। समकालीन कविता पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से संघर्ष करती है और कवि ने श¨षित¨ं क¢ हक में अपनी बात स्पष्ट रूप से व्यक्त की गई है।
 सŸाा पाने तक सŸााधारिय¨ं ने आम ल¨ग¨ं क¨ भारी प्रल¨भन दिये है। लेकिन सŸाा पाने पर सŸााधारी ल¨ग¨ं ने जनता से ’मुँह म¨ड़ लिया। वे भ्रष्टाचार में ही लिप्त रहे हैं। कवि ने उनकी भरपूर भत्र्सना की है। कवि का समूचा काव्य लेखन आम जनता क¢ प्रति सह्रदता और समाज विर¨धिय¨ं क¢ प्रति उग्र‘ आक्र¨श व्यक्त किया है।

संदर्भ
1. दुष्यंत कुमार-साए में धूप, पृ.15
2. चन्द्रकांत देवताले, भूखण्ड तप रहा है, पृ. 34
3. चन्द्रकांत देवताले, पत्थर की बेंच, पृ.90
4. चन्द्रकांत देवताले, आग हर चीज में बताई गई थी, पृ.106
5. चन्द्रकांत देवताले, आग हर चीज में बताई गई थी, पृ.109
6. चन्द्रकांत देवताले, आग हर चीज में बताई गई थी, पृ.111
7. चन्द्रकांत देवताले, उसके सपने, रोषनी मैदान की तरफ, पृ. 104
8. चन्द्रकांत देवताले, उजाड़ में संग्रहालय, पृ.82
9. चन्द्रकांत देवतालंे, आग हर चीज में बताई गई थी, पृ.35