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 ( प्रेरक बाल कथा - शरारती अमर )
January 21, 2020 • नीरज त्यागी • Hindi literature/Hindi Kavita Etc.
 ( प्रेरक बाल कथा - शरारती अमर )
 
 
           अमर दसवीं कक्षा की पढ़ाई कर रहा था।आमतौर पर इस कक्षा के विद्यार्थी काफी शरारती होते हैं और उसी प्रकार अमर का भी व्यवहार काफी शरारती था।
 
          अमर पढ़ने में एवरेज बच्चा था और उसकी कोशिश हमेशा पेपरों से बचने की रहती थी।दसवीं के प्री बोर्ड के एग्जाम चल रहे थे।अमर काफी घबराया हुआ था क्योंकि उसकी तैयारी पेपरों के लिए अच्छी नहीं थी।
          
          अमर अपने पिता से भी काफी डरता था।हालांकि उसके पिता का स्नेह उसके प्रति बहुत ज्यादा था क्योंकि वह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था।
 
           अमर का परसो गणित का एग्जाम है लेकिन उसकी तैयारी बिल्कुल भी नहीं है।पिता से डरा हुआ अमर समझ ही नहीं पा रहा था कि किस तरह पेपर से बचे ताकि उसे अपने पिता से डॉट ना पड़े।
 
           आखिर वह सुबह आ ही गई जब उसकी परीक्षा होनी थी।अमर काफी घबराया हुआ था।तभी उसने अपना दिमाग लगाया और बहुत जोर से पेट में दर्द होने का नाटक किया।
 
          वह दर्द से बड़े ही नाटकीय अंदाज में कराह रहा था।क्योंकि उसके माता-पिता उससे बहुत प्रेम करते थे।इसलिए वह दोनों घबरा गए और अमर के पिता उसे तुरंत एक बड़े से हॉस्पिटल में लेकर चल पड़े।
 
          अमर को इस बात की बहुत खुशी थी कि अपने इस नाटक से वह परीक्षा देने से बच जाएगा।अमर के पिता किसी फैक्ट्री में बड़ी ही मेहनत-मशक्कत से घर की जीविका चलाने लायक ही कमा पाते थे।
 
           अमर के पिता ने अपनी आमदनी के हिसाब से अपनी औकात से भी ज्यादा बड़े स्कूल में अमर को पढ़ाया था ताकि उसका भविष्य उज्ज्वल हो जाये।
 
          अब वह अमर को लेकर हॉस्पिटल पहुंच गए।डॉक्टर ने अमर के पेट को हर तरफ से दबाया और काफी देर जांच करने के बाद उन्होंने अमर के पिता को बताया कि शायद अमर को अपेंडिक्स है और उसको एडमिट करके ऑपरेशन भी करना पड़ सकता है।
 
           अब अमर अपने नाटक पर काफी पछता रहा था।छोटा बच्चा इतना घबरा गया कि शायद उसे ऑपरेशन ना करवाना पड़ जाए इस डर का उसके पास कोई हल नही था और वो अपने ही बुने जाल में फस गया था।
 
          अमर को अस्पताल में एडमिट कराया गया।दो दिन तक उसके सभी टेस्ट कराए गए जिसके उपरांत डॉक्टर ने उसके पिता को उसे छुट्टी ले कर घर जाने के लिए कहा और बताया कि शायद कुछ खाने-पीने का इंफेक्शन था।जिसकी वजह से उसके पेट में दर्द हुआ।
 
           दो दिन के इलाज में उसके पिता की बड़ी ही मेहनत की कमाई से जुड़े हुए लगभग ₹40000 इस प्रक्रिया में खर्च हो गए।अमर अपने पिता के मेहनत से कमाए गए पैसे इस तरह जाने से बहुत परेशान हुआ और बहुत ही लज्जा महसूस कर रहा था।
 
           इसके बाद अमर ने कभी अपनी पढ़ाई से कभी मुँह नहीं फेरा और पूरी लगन से अपनी पढ़ाई में लग गया और दसवीं की परीक्षा में उम्मीदों से परे बहुत ही अच्छे नंबरों से उसने स्कूल को टॉप किया।
 
          दसवीं परीक्षा को पास करने के बाद उसने अपने पिता को बताया कि उसने प्री बोर्ड में नाटक किया था।जिसकी वजह से उसके पिता के काफी पैसे का नुकसान हो गया था।
 
           यह बताते हुए अमर की आंखों में पश्चाताप के आँशु थे।अमर के पिता ने अमर के सर पर हाथ रखा और अपने बेटे से कहा कि उसकी पढ़ाई के प्रति इस लग्न को देखने के लिए वह अपना कुछ भी देने के लिए तैयार है।आँखों में आँशु भरा हुआ अमर अपने पिता के गले लग गया।