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*समाज में बिकता अपराध* (यात्रा वृतांत)
January 2, 2020 •  वंदना पुणतांबेकर • Hindi literature/Hindi Kavita Etc.

आज मेरा ट्रेन से दिल्ली जाना हुआ।ट्रेन निर्धारित समय से कुछ लेट थी।मेरा रिजर्वेशन थर्ड एसी में था।ट्रेन कुछ ही पलों में अपने गंतव्य की ओर रफ्तार पकड़ चुकी थी।मुरैना पार करते ही दो तेईस चौबीस साल के दो युवक ट्रेन के बोगी में घुस आए।टी सी नदारत था।एसी कोच में किसी की अनुमति नहीं थी।मगर ना जाने वह दोनों अंदर कैसे आये।ट्रेन बीहड़ जंगलों से अपनी रफ़्तार से गुजर रही थी।बाहर झमाझम बारिश हो रही थी।बाहर का मंजर कुछ धुंधला-धुंधला सा दिखाई दे रहा था।तभी उन युवको ने मेरे पास आकर चाकू दिखाया।गहने उतार कर देने के लिए कहने लगे।मैने कहाँ..,"भाई क्यों लूट-पाट करते हो..,तभी वह दोनों बोले..,"मैडम जल्दी करो टी.सी आ जायेगा।मैने कहाँ,"भाई यह तो गोल्ड नही नकली हैं, बेचने जाओगे तो कुछ नही मिलेगा।और तुम्हारे बिज़नेस में घाटा हो जाएगा।तो वह दोनों सोचकर बोले,चलो आपके पास जो भी रुपये है,जल्दी से दे दो।में चीखना चाह रही थी।मैने उन्हें कहा रुको देती हूं।और में पर्स से रुपए निकाल ने लगी।ओर कहा कि बस सौलासौ रुपये है।इतनी मेहनत से चढ़े हो,कुछ फायदा नही होगा।तभी वहाँ लोगो की हलचल देख उन्होंने चाकू छिपा लिया।मैने पूछा,"क्यो करते हो ये सब क्या दो वक़्त की रोटी के लिए यह जरूरी हैं।शायद वह नये-नये थे।घबराकर पसीने-पसीने हो गए।तब एक बोला,"मैडम क्या करें, माँ बाप ने जल्दी शादी कर दी,जिम्मेदारियों का पहाड़ बड़ा होता जा रहा है।गरीबी के चलते ठीक तरह से पढ़ भी न सके,ओर अब घर में बीवियां हैं।सारा दिन टी.वी सीरियल देखकर गहने, साड़ियों की डिमांड करती रहती है।उनके इन शब्दों को सुनकर मेरा मन सोचने लगा।कि सीरियल की टी आर पी के लिए एडवरटाइजिंग कम्पनियां तो खुप मुनाफ़ा कमाती है।लेकिन आज यह बात साफ़ तौर पर सामने आई कि टी वी सिरियल देखकर गरीब और अज्ञानी लोग अपराध की दुनियां का हिस्सा बनते जा रहे हैं।डिमांड की कोई सीमा नही होती।जितनी पूरी हो।उतनी बढ़ती जाती है।में उन दोनों युवकों से बोली,"बेटा कुछ नौकरी धंधा कर गुजारा कर लो,लुट पाट ही क्यो..?एक बोला, पहले हम हम्माली का काम ही करते थे।लेकिन दिनभर हम्माली से थकने के बाद भी उतना पैसा नही मिलता जितनी जरूरत है।इसलिए अब यह बिज़नेस अपनाया हैं।मैने पूछा,क्या तुम्हारी बीवियां इस काम से खुश हैं..?इस पर वह खामोश रहे,कहने लगे नही....,पर वह हमें मजबूर करती हैं।मेरे मन मे एक सवाल बार-बार क्रोन्ध रहा था।कि क्या आधुनिकीकरण या टी वी  सीरियल भी कही न कही समाज मे अपराध परोस रहे हैं।इसे रोक जाना अति आवश्यक है।नही......तो हमारे देश और समाज की स्थिति आनेवाले समय मे और भी भयावह हो जाएगी।स्टेशन आते ही भीड़ देखकर वह उतर गए।वह शायद इस फील्ड में शायद  नये थे। मैं उन्हें जाता देख रही थी।अंतर्मन में अनेक सवालोंं का द्वंद चल रहा था।

, इंदौर (म. प्र)