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आकाश महेशपुरी के दोहे-
December 31, 2019 • आकाश महेशपुरी • Hindi literature/Hindi Kavita Etc.

1-
कलयुग के इस दौर मेँ, बस हैँ दो ही जात।
एक अमीरी का दिवस, अरु कंगाली रात॥
2-
कौन यहाँ है जानता, कब आ जाए अन्त।
चलना अच्छी राह पर, कर देँ शुरू तुरन्त॥
3-
मौसम मेँ है अब कहाँ, पहले जैसी बात।
जाड़े मेँ जाड़ा नहीँ, गलत समय बरसात॥
4-
यारी राजा रंक की, या दोनोँ की प्रीत।
अक्सर क्योँ लगती मुझे, ये बालू की भीत॥
5-
ध्यान रखे जो वक्त का, रहता है खुशहाल।
जो इससे है चूकता, दुख भोगे तत्काल।।
6-
कुछ कहने से पूर्व ही, कर लेँ सोच विचार।
ऐसा ना हो बाद मेँ, बढ़ जाए तकरार।।
7-
हिन्दू-मुस्लिम से बड़ा, अपना भारत देश।
ये लड़ते तो देश के, दिल को लगती ठेस।।
8-
यह भी तो अच्छा नहीँ, भरना केवल पेट।
कर लेते हैँ जानवर, भी भोजन से भेँट।।
9-
कैसी उसकी सोच है, कैसा है इंसान।
छोटी-मोटी बात से, हो जाती पहचान॥
10-
मौसम तो बरसात का, किन्तु बरसते नैन।
सूखी सूखी ये धरा, पंक्षी भी बेचैन।।
11-
थोड़ा कम भोजन करेँ, काम करेँ भरपूर।
निर्धनता इससे डरे, रोग रहेँ सब दूर।।
12-
रूप सलोना हो भले,मन मेँ बैठा मैल।
ऐसे मानव से भले, लगते मुझको बैल।।
13-
यदि बूढ़े माँ-बाप को, पुत्र करे लाचार।
उससे पापी कौन है, तुम ही बोलो यार।।
14-
आग लगे जब गाँव मेँ, संकट हो घनघोर।
कितनी छोटी सोच है, खुश हो जाते चोर।।
15-
आँखोँ मेँ बादल नहीँ, दिल के सूखे खेत।
हरियाली गुम हो चली, दिखती केवल रेत॥
16-
खाता है जो धन यहाँ, बिना किये कुछ काम।
माफ उसे करते नहीँ, अल्ला, साईँ, राम।।
17-
ये हैँ शत्रु समाज के, ताड़ी और शराब।
हो जाते विद्वान भी, पीकर बहुत खराब।।
18-
ना कोई छोटा यहाँ, बड़ा न कोई आज।
सब हारे इस वक्त से, जग मेँ इसका राज।।
19-
प्रेम भाव घर मेँ अगर, तो दौलत है फूल।
वरना ये लगता जहर, चुभता बन के शूल।।
20-
वह धन धन होता नहीँ, जो रखता है चोर।
धन चोरी का आग है, बचे न कोई कोर।।
21-
चाहे धूप कठोर हो, या जलता हो पाँव।
काम धाम करते सदा, वे ही पाते छाँव।।
22-
मीठा भी फीँका लगे, इतना मीठा बोल।
पर इस चक्कर मेँ कहीँ, झूठ न देना घोल।।
23-
आ जाओ हे कृष्ण तुम, लिए विष्णु का अंश।
एक नहीँ अब तो यहाँ, कदम-कदम पर कंस।।
24-
कंसो का ही राज है, रावण हैँ चहुँ ओर।
भला आदमी मौन है, जैसे कोई चोर।।
25-
होता यदि दूजा हुनर, होते हम भी खास।
भूखे कबसे फिर रहे, ले कविता आकाश।।
26-
कविता का आकाश ले, हम तो खाली पेट।
लौटे हैँ बाजार से, लेकर केवल रेट।।
27-
मुझ पर मातु जमीन का, इतना है उपकार।
इसके खातिर छोड़ दूँ, जी चाहे घर-बार।।
28-
मातु-पिता घर-बार से, धरती बहुत महान।
इसके आगे मैँ तुझे, भूल गया भगवान।।
29-
चालू हो जाता पतन, सुनेँ लगाकर ध्यान।
आ जाता इंसान मेँ, जिस दिन से अभिमान।।
30-
बादल के दल आ गये, ले दलदल का रूप।
रूप दलन का देख कर, बिलख रही है धूप।।
31-
वे जग मेँ हैँ मर चुके, सत्य न जिनके संग।
बिन डोरी कबतक उड़े, जैसे कटी पतंग।।
32-
बोली से ही सुख मिले, बोली से संताप।
बोली से मालूम हो, मन के कद की नाप।।
33-
संकट हो भारी बहुत, अंधेरा घनघोर।
उसमेँ भी कुछ रास्ते, जाते मंजिल ओर।।
34-
दारू पीने के लिए, जो भी बेचे खेत।
बन जाता है एक दिन, वह मुट्ठी की रेत।।
35-
धरती की चन्दा तलक, जाती है कब गंध।
इसीलिए करिए सदा, समता मेँ सम्बन्ध।।
36-
आलम ये बरसात का, देख रहे हैँ नैन।
धनी देखकर मस्त हैँ, मुफलिस हैँ बेचैन।।
37-
पशुओँ को बन्धक बना, हम लेते आनन्द।
आजादी खुद चाहते, कितने हैँ मतिमन्द।।
38-
कल की बातेँ याद रख, पर ये रखना याद।
आगे जो ना सोचते, हो जाते बरबाद।।
39-
भारत देश महान की, यह भी है पहचान।
घर आए इंसान को, कहते हैँ भगवान।।
40-
अच्छाई की राह पर, चलते रहिए आप।
दुःख चाहे जो भी मिले, या कोई संताप।।
41-
जिसके डर से सौ कदम, रहती चिन्ता दूर।
कहते उसको कर्म हैँ, दुख जिससे हो चूर।।
42-
पूजा करने से नहीँ, या लेने से नाम।
आगे बढ़ते हैँ सभी, बस करने से काम।।
43-
अच्छी बातेँ सोचिए, अच्छी कहिए बात।
अच्छाई अच्छी लगे, दिन हो चाहे रात।।
44-
जाति धर्म के नाम पर, लड़ते जो दिन रात।
भारत माँ के लाल वे, करते माँ से घात।।
45-
कथनी करनी एक हो, और इरादा नेक।
बैर भाव जाता रहे, मिलते मित्र अनेक।।
46-
रोगी सब संसार है, और पेट है रोग।
रोटी एक इलाज है, दर-दर भटकेँ लोग।।
47-
इस लोभी संसार मेँ, जीना है दुश्वार।
यारी भी झूठी लगे, झूठा लगता प्यार।।
48-
कहते हैँ वैभव किसे, जाने कहाँ किसान।
फुरसत कब देते उसे, कष्टोँ के फरमान।।
49-
धीरे धीरे ही सही, करते कोशिश रोज।
वे ही भर पाते यहाँ, जीवन मेँ कुछ ओज।।
50-
एक सफलता है यही, चैन अगर हो पास।
यह पाने के वास्ते, कर आलस का नाश।।
51-
धन असली है खो रहा, यह पूरा संसार।
नाम कहूँ तो पेड़ है, जो धरती का सार।।
52-
कैसे हो सकता भला, अमर किसी का नाम।
अमर नहीँ जब ये धरा, नश्वर सारे धाम।।
53-
असली धन है गाँव मेँ, हरियाली है नाम।
याद करूँ जब शहर को, दिखलाई दे जाम।।
54-
अगर किसी भी भष्ट को, वोट दे रहे आप।
तो समझेँ हैँ दे रहे, निज बच्चोँ को श्राप।।
55-
जीवन है जो देश का, भूखों देता जान।
देता सबको रोटियां, कहते उसे किसान।।
56-
सोना ही महँगा नहीं, महँगे आलू प्याज।
पर सबसे महँगा हुआ, भाई-चारा आज।।
57-
कानों पर होता नहीं, तनिक मुझे विश्वास।
गाली देते देश को, इसके ही कुछ खास।।
58-
अपनी ही वह सम्पदा, कर देते हैं नष्ट।
और माँगते भीख तो, सुनकर होता कष्ट।।
59-
हम सबके ही वास्ते, सैनिक देते जान।
जाति-धर्म के नाम पर, क्यों लड़ते नादान।।
60-
एक धर्म होता अगर, होती दुनिया एक।
बिना किसी मतभेद क्या, होते युद्ध अनेक।।



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संक्षिप्त परिचय :
नाम- आकाश महेशपुरी
(कवि, लेखक, शिक्षक)
मूल नाम- वकील कुशवाहा
जन्मतिथि- 20 अप्रैल, 1980
प्रकाशन व उपलब्धियां-
काव्य संग्रह 'सब रोटी का खेल'
साझा काव्य संग्रह- कवितालोक, गीतिकालोक, कुण्डलिनीलोक व अन्य।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का निरन्तर प्रकाशन
आकाशवाणी व दूरदर्शन से कविता-पाठ
कवि सम्मेलनों व कवि गोष्ठियों में सहभागिता
कुछ साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानपत्र
पता-
ग्राम- महेशपुर, पोस्ट- कुबेरस्थान, जिला- कुशीनगर, उत्तर प्रदेश
पिन- 274304 , मोबाईल- 9919080399