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अनुसूचित जनजातियों की प्रमुख विशेषताएँ एवं समस्याएँ            
December 10, 2019 • दयाराम मुझाल्दा, शोध निर्देशक - डॉ. कांता अलावा  

सारांश - भारत मेे हजारों वर्षो से जंगलो और पहाड़ी इलाको रहने वाले आदिवासियों की अपनी  संस्कृति रीति-रिवाज रहन-सहन के कारण अपनी अलग ही पहचान एवं विशेषता रही है। परन्तु इन आदिवासियों को हमेशा से दबाया और कुचला जा रहा है। जिससे उनकी जिंदगी अभावग्रस्त ही रही है। इनका खुले मैदान के निवासियों और तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले लोगो से न के बराबर संपर्क रहा है। केन्द्र सरकार आदिवासियों के नाम पर हर साल हजारों करोड़ रूपयो का प्रावधान बजट मे करती है। इसके बाद भी 6-7 दशक से उनकी आर्थिक स्थिति जीवन स्तर में कोई बदलाव नही आया है। स्वास्थ्य सेवाएँ पीने का साफ पानी आदि मूलभूत सुविधाओं के लिये आज भी तरस रहे है। इन सब बातो को जानने के बावजूद आदिवासियों की समस्या को तय कर पाना कतई आसान नही है। हर क्षैत्र की समस्या अलग-अलग हो सकती है। आदिवासी समाज की अपनी पहचान होती है। जिससे रहन-सहन आचार-विचार एक जैसे ही होते है। इधर बाहरी प्रवेश, शिक्षा और संचार माध्यमों के कारण इस ढांचे में भी थोड़ा बदलाव जरूर आया है। वैसे वर्षो से शोषित रहे इस समाज के लिये परिस्थितियाँ आज भी कष्टप्रद और समस्याएँ बहुत अधिक है। ये समस्याएँ प्राकृतिक तो होती ही है। साथ ही यह मानवजनित भी होती है। अत: जाति के आधार पर आंकड़े एकत्रित कर अनुसूचित जनजाति आदिवासियों की विभिन्न समस्याओं का विश्लेषण कर उपाय प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
 प्रस्तावना - विश्व में जनजातीय आबादी की दृष्टि से 'भारतÓ अफ्रीका के पश्चात द्वितीय क्रम पर है। ऐसा विश्वास किया जाना भी भारत के लिये गर्व का विषय है कि ये जनजातियाँ भारतीय प्रायद्वीप की ही मूल अधिवासी है उल्लेखनीय है कि इस देश का भारत नाम भी 'भारत जनजातिÓ से ही उद्घृत है।
 मानव विज्ञान के अध्यययन से ही मानववेत्ताओं का झुकाव 'आदिम समाजÓ की और रहा है। जनजातियाँ आदिम समाज का सटीक उदा. मानी जाती है। विश्व के अनेक भागो मे रहने वाले उन आदिवासी समूदायों को 'जनजाति कहा जाने लगा है जो सामाजिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से तत्कालीन समाजो की तुलना में अत्यंत पिछड़े हुए। महाद्वीपो के दुर्लभ क्षेत्रों में आज भी ऐसे अनेक स्थान या मानव समूह है जो हजारों वर्षो से शेष विश्व की सभ्यता से दूर अपनी सामाजिक राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना की पहचान बनाये हुये है। ये मानव समूह बीहड़ वनो मरूथलो, ऊचे पर्वतों अनुर्वर पठारो के उन अंचलों में निवास करते है। जिन्हें आधूनिक समाज की अर्थदृष्टि अनुत्पादक मानती है। इन्ही समूदायों के लोगों को विकसित लोगो ने आदिवासी जनजाति वन्यजाति आदि नाम दिये है। लेकिन इतिहास की विडम्बना ने इन सम्पूर्ण समुदायों को आदिवासी ज्तपइंस की संज्ञा दे दी है।
 भारत ही ऐसा देश है जिसमें ऐसे बहुत से मानव समूह निवास करते हैं जो इस आधुनिक समय में भी सभ्यता के आदिम स्तर से जीवन जी रहे है। ये मानव समूह सभ्यता के प्रभावों से  अपेक्षाकृत दूर जंगलों और पहाड़ों की गोद में जीवन की सरगम छेड़ते है जिनका जीवन अभी भी प्राचीन परम्पराओ और अंधविश्वासो से घिरा हुआ है। जिसे जनजाति या वनजाति के नाम से पुकारा जाता है। ये जनजातियाँ आधुनिक परिवर्तनशीलता युग में अपनी पवित्र परम्पराओं ! आदिम रीति-रिवाजो सामाजिक, मान्यताओं और विश्वासो को अक्षुण्य बनाये हुये है। सभ्य समाज से दूर जंगलो एवं पहाड़ो में एकाकी जीवन व्यतीत करने के कारण इनका मानसिक विकास नही हो पाया है। इसी के परिणामस्वरूप ये समाज में उच्च एवं सम्मानित स्थान नही पा सके। सदियों से अलग रहने के कारण आदिवासी समाज सामाजिक राजनैतिक आर्थिक और सांस्कृतिक प्रणाली रीति-रिवाज और आस्था अन्य समाजो एवं समूदायो से अलग बनाये हुए है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत का संविधान बना जिसके अन्तर्गत निम्न वर्ग एवं अपेक्षाकृत अधिक पिछड़ी जातियों एवं जनजातियों की अनुसूची बनाई गई। परन्तु आज भी जनजातियों में विभिन्न समस्याएँ विद्यमान है -
अनुसूचित जनजातियों की विशेषताएँ -
(1) निश्चित भू-भाग - प्रत्येक जनजाति का अपना एक निश्चित भू-भाग होता है, किन्तु यह सदैव के लिये स्थायी नही होता क्योंकि इनमें स्थान परिवर्तन की प्रवृत्ति पाई जाती है। एक निश्चित भू-भाग में जनजातियों का निवास उनमे सामूदायिक भावना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन करता है। वर्तमान समय में जनजातियों मे स्थान परिवर्तन की प्रवृत्ति कम हो गई है।
(2) सामान्य भाषा - एक जनजाति के सभी सदस्य अपने विचारो एवं भावनाओं को व्यक्त करने के लिये एक सामान्य भाषा का प्रयोग करते है। इसी भाषा के माध्यम से उनके विचार एवं भावनाएँ भावी पीढिय़ो को हस्तान्तरित होते रहते है।
(3) विशाल आकार - एक जनजाति में अनेक परिवार एवं परिवार समूहों का संकलन होता है इसलिये एक जनजाति अपने आकार में अन्य क्षैत्रीय समूहों की तुलना में अधिक विस्तृत एवं विशाल होती हैं।
(4) अन्तर्विवाह - प्राय: सभी जनजातियों में अन्तर्विवाह की प्रथा का प्रचलन पाया जाता है। अर्थात् एक जनजाति के सदस्य अपनी ही जनजाति के सदस्यो से विवाह करते है इन्हेें अपनी जनजाति से बाहर विवाह करने की अनुमति नही होती है।
(5) सामान्य संस्कृति - एक जनजाति के सभी सदस्यो मे सामान्य संस्कृति का प्रचलन पाया जाता है जिससे संबंधित नियमों का पालन सभी सदस्यो के लिये अनिवार्य होता है। खान-पान भाषा बोली नृत्य-संगीत रीति रिवाजों धर्म तथ कला आदि के संबंध में समानता दृष्टिगोचर होती है।
(6) आर्थिक आत्मनिर्भरता -आर्थिक निर्भरता जनजातियों की एक अन्य प्रमुख विशेषता है जनजाति के सभी सदस्य आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर होते है। क्योंकि ये सभी जीवनोपयोगी वस्तुओं के उत्पादन मे सक्षम होते है। इनमें पुरूष-स्त्री बच्चे बूढ़े बुजुर्ग भी उत्पादन विनियमय के लिये नही वरन उपभोग के लिये होता है। परन्तु वर्तमान समय में अनुसुचित जनजातियों में आर्थिक आत्मनिर्भरता नही बल्कि आर्थिक असमानता पायी जाती है क्योकि विकास के इस दौर में जनजाति के लोग दो भागो में विभाजित देखे जाते है। एक भाग आर्थिक रूप से सम्पन्न तो दूसरा भाग आर्थिक रूप से कमजोर होता है और आर्थिक रूप से सम्पन्न जनजाति भाग पर आश्रित रहता है।
(7) राजनीतिक इकाई - एक जनजाति का अपना एक महत्वपूर्ण लक्षण राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र इकाई के रूप में या मुखिया होता है। जो वयोवृद्ध लोगों की एक सभा या पंचायत के माध्यम से सदस्यों के व्यवहारों का निर्धारण और नियंत्रण करता है तथा नियमों का उल्लंघन करने वालों को कठोर दण्ड देता है।
अनुसूचित जनजातियों की विभिन्न समस्याएँ -
1. स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ - जनजातीय लोगों का निर्धनता परिस्थिति संबंधी कारणो अजनजातीय संस्कृतियों के सम्पर्क मे आने के कारण अनेक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। एक समय था। जब जनजाति लोग नग्न रहते थे फिर वे पेड़ो की छाल या पशुओं की खाल के वस्त्र पहनने लगे परन्तु निर्धनता के कारण वे एक जोड़ कपड़े से ज्यादा वस्त्र प्राप्त नही कर सकते थे। उस वस्त्र के मैला हो जाने पर भी वे उसे ही पहने रहते है। जिस कारण उनमें कई प्रकार के चर्म रोग एवं अन्य रोग फैल जाते है। जिसके कारण इन लोगों की असामयिक मृत्यु हो जाती है। ग्रामीण क्षैत्रो में स्वास्थ्य सेवाएँ आज भी नही पहुँच पाई है इसका प्रमुख कारण है ग्रामीण क्षैत्रों का जिला मुख्यालय से बहुत दूर होना या सड़क मार्ग का न होना पाया गया है तथा डॉक्टरों के द्वारा ग्रामीण क्षैत्रों में सेवाएँ देने में अरूचि दिखाना आदि।
2. भाषा संबंधी समस्याएँ - अनुसूचित जनजाति के लोगों में भाषा सम्बन्धी समस्या है बाहरी संस्कृति के सम्पर्क मे आने के कारण जनजातीय लोगों में भाषावाद की समस्या उत्पन्न हुई। एक ही जनजाति के लोग अपनी भाषा के अलावा किसी बाहरी समूह की भाषा भी बोलने लगे है। वे लोग जिन पर बाहरी संस्कृति का प्रभाव अधिक होता है। अपनी स्वयं की भाषा भूलने भी लगे है। इससे एक ही जनजाति के लोगों के बीच  सांस्कृतिक मूल्यों एवं आदर्शो में गिरावट आती है।
3. जनसंख्या वृद्धि - सामाजिक न्याय के लिये जनसंख्या वृद्धि भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है। यह समस्या विकराल एवं व्यापक है जिसने समूचे राष्ट्र की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को डांवाडोल कर रखा है। वर्तमान में भारत जैसे विकासशील देश को 123 करोड़ की आबादी का भरण-पोषण करना एक गम्भीर समस्या है। जनसंख्या वृद्धि ने निर्धनता, दरिद्रता अशिक्षा बेरोजगारी जैसी समस्याओं को बढ़ावा दिया है। इतनी बड़ी जनसंख्या के लिये पर्याप्त आवास व्यवस्था तथा सबके लिये शिक्षा सुलभ नही है। बहुत से परिवार अपने बच्चों सहित खाली जगहों पर या पहाड़ी इलाकों में झुग्गी झोपडिय़ाँ बनाकर रहने लगते है। वहाँ साफ सफाई और रोशनी की कोई उचित व्यवस्था नही हो पाती है। देश के संसाधनों के अनुपात से अधिक जनसंख्या की वृद्धि निश्चय ही समाज की प्रगति तथा विकास मे बाधक है। सरकार की अनेक योजनाएँ जनसंख्या वृद्धि के कारण असफल हो गई है मंहगाई दिनोदिन बढ़ती जा रही है।
4. आर्थिक समस्याएँ - अनुसूचित जनजातियों की समस्याओं में आर्थिक समस्या एक गंभीर समस्या है। प्रारम्भ में मनुष्य वनो के माध्यम से फल-फूल कन्दमूल अपनी आवश्यकतानुसार उपयोग करते थे। जंगली जानवरों का भी वो आहार के लिये शिकार करते थे। इन सबके बावजूद भी वे अनाज के रूप में ज्वार, बाजरा, मक्का आदि उपजा लेते थे। लगभग 100 वर्षो तक कृषि का ये पारम्परिक तरीका ही था। अनुसूचित जनजाति का आत्मनिर्भरता जीवनचर्या में परिवर्तन का दौर अंग्रेजी सत्ता के द्वारा वनों में अतिक्रमण के साथ प्रारम्भ हुआ। अंग्रेजो ने अनुभव किया कि प्रचुर वन सम्पदा उनके आर्थिक हितों की वृद्धि में सहायक हो सकते है। इसी अनुभव के बाद इन्होंने वनों के आर्थिक दोहन की नीति अपनाई वन से लकड़ी की कटाई वनोपज का वाणिज्यिक उपयोग शिकार पर निषेध आदि से संबंधित अनेक प्रतिबंध लगाये गए। वनो में भरण-पोषण के लिये कठिन नियम बन गये । ऐसी स्थिति में अनुसूचित जनजाति में प्रवजन स्वाभाविक था। वर्तमान में सरकार ने अनुसूचित जनजाति कल्याण के लिये ग्राम, खण्ड, राज्य स्तर तक अधिकारियों के व्यापक तंत्र की स्थापना की है तथा इनकी बहुत सी आर्थिक समस्याओं का सुधार करने का प्रयास किया है।
5. शैक्षणिक समस्याएँ - आदिवासी जनजातियों के कुछ क्षेत्रों में शिक्षा का अभाव है और वे अज्ञानता के अंधकार में जीवन शिक्षा बिता रहे है। अशिक्षा के कारण वे अनेक अंधविश्वासों कुरितियों एवं कुसंस्कारों से घिरे हुये है। आदिवासी लोग आधुनिक शिक्षा के प्रति उदासीन है क्योंकि यह शिक्षा उनके लिये अनुत्पादक है जो लोग आधुनिक शिक्षा ग्रहण के कर लेते है वे अपनी जनजातीय संस्कृति से दूर हो जाते है। और अपनी मूल संस्कृति को घृणा की दृष्टि से देखने लगते है। आज की शिक्षा जीवन-निर्वाह का निश्चित साधन प्राप्त नही करती है। अत: शिक्षित व्यक्तियों को बेकारी का सामना करना पड़ता है। जनजातियों की सम्पूर्ण समस्याओं का मुख्य आधार उनका अशिक्षित होना है। अशिक्षित होने के कारण वे अंधविश्वासी है और जादू-टोने पर विश्वास करते है और उनमें पैसा लुटाते है।
6.  जतिवाद की समस्या - भारतीय समाज में सामाजिक न्याय की विकट समस्याओं में से एक समस्या जातिवाद की है। वह न केवल समस्या है अपितु अनुसूचित जनजाति के सामाजिक न्याय का एक सशक्त शत्रु भी है। जातिवाद को छुआ-छुत ऊँच-नीच और निस्कृष्ट भेदभावों में अभिव्यक्त करता है। जातिवाद के कारण ही करोड़ों स्त्री-पुरूष दयनीय तथा अर्धमानव स्थिति में जीवनयापन कर रहे है संविधान में उनका निषेध कर रखा है। पर हिन्दू समाज में आदिवासी-दलित के साथ पशु के समान व्यवहार किया जाता है। उन्हें उनके संवैधानिक अधिकारों और विधिक सुविधाओं से वंचित रखा जाता है।
7. विधिक प्रक्रिया में विलम्ब - अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक न्याय के अन्तर्गत बहुत से लोगों को सुविधाएँ मिली है पर कागज तक ही सीमित रह जाती है। और उनके लिये इनके द्वारा न्यायिक लड़ाई लडऩा संभव ही नहीं हो पाता है। न्यायिक प्रक्रिया मेंं भी इतना विलम्ब तथा खर्चा होता है कि उससे सामाजिक न्याय की भावना ही नष्ट हो जाती है। विधिक प्रक्रिया बहुत ही मंहगी है उसे सामान्य आदमी वहन नही कर सकता है फलत: बहुत से परिवार सामाजिक न्याय से वंचित रह जाते है। सरकार की और से विधिक सहायता का प्रबन्ध तो है पर वह अपर्याप्त है और सीमित भी इसलिये सामाजिक न्याय के हकदार हिंसात्मक गतिविधियों की और आकर्षित होते है।
8. ऋणग्रस्तता - आदिवासी लोग अपनी गरीबी बेरोजगारी, तथा अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण ऋण लेने को मजबूर होते है, जिसके कारण दूसरे लोग इनका फायदा उठाते है। आदिवासियों के लिये ऋणग्रस्तता की समस्या सबसे जटिल है। जिसके कारण जनजातीय लोग सेठ, साहुकारों एवं बनियो के शोषण का शिकार होते है। ये शोषण कभी-कभी इतना अधिक किया जाता है कि आदिवासी लोग इनके दबाव के कारण आत्महत्या तक कर लेते है।
9. मदिरापान - आदिवासियों में मदिरापान काफी लोकप्रिय है। चाहे वे अपने प्रमुख पेशे के रूप में हो या सेवन के लिये अधिकांशत: आदिवासी मदिरा का निर्माण स्वयं करते है। मदिरा बनाने के लिये वह महुए के फल को इस्तेमाल मे लाते है। मदिरापान सदियों से उनकी सामाजिक परम्परा का भाग रहा है। आदिवासी महुए के अलावा बाजरे और चावल से भी मदिरा का निर्माण करते है।
 आदिवासियों के पास अपनी बनाई मदिरा पर्याप्त मात्रा में होने के बावजूद सरकार द्वारा लाइसेंस प्राप्त ठेकेदारों द्वारा बाहरी मदिरा के विक्रय ने आदिवासियों को बहुत सी समस्याओं में मे उलझा दिया है। मदिरा एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा बाहरी असामाजिक तत्व इन पिछड़े समुदायों के बीच पहुंचकर आपत्तिजनक कार्य करते है। साथ ही आदिवासी इन परम्पराओं और संस्कृतियों को बनाये रखने के कारण नशे के आदि हो गये है। जिसके कारण इनकी आर्थिक स्थिति भी कमजोर हुई है और अत्यधिक मदिरा के सेवन से इनकी असामाजिक मृत्यु हो रही और इन लोगों की संख्या दिनोदिन घटती जा रही है।
10. एकीकरण की समस्या - भारतीय जनजातियों में अर्थव्यवस्था, समाज, व्यवस्था संस्कृति धर्म एवं राजनीतिक व्यवस्था के आधार पर अनेक भिन्नताएँ पायी जाती है। वे देश के अन्य लोगों से पृथक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सम्पूर्ण देश एवं जनजातियों की विशिष्ठ समस्याओं से मुक्ति पाने के लिये सभी देशवासियों द्वारा सामूहिक प्रयास किये जाये। जनजातियाँ अपने को अन्य लोगो से पृथक न समझकर देश की मुख्य जीवन धारा से जोड़े तभी हम गरीबी, शोषण अज्ञानता अशिक्षा बीमारी, बेकारी और खराब स्वास्थ्य की समस्याओं से निपट सकेगे।
 निष्कर्ष - निश्चित रूप से जनजातीय आबादी भारत में बहुताय रूप में विद्यमान है और आधुनिक समय में भी अपनी संस्कृति एवं सभ्यता को संजोये हुये है तथा ये जनजातियाँ अपनी संस्कृति सभ्यता एवं रहन-सहन के कारण ही सम्पूर्ण भारत एवं विश्व में अपनी अलग पहचान रखती है। जनजातियों के उत्थान एवं विकास के लिये केन्द्र एवं राज्य सरकारों के द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् से ही विभिन्न योजनाएँ एवं कार्यक्रम संचालित किये जा रहे है। परन्तु जनजातीय समुदाय के लोगो में आज भी निश्चित भू-भाग, आर्थिक असमानता, सामाजिक असमानता, स्वास्थ्य, भाषा, शैक्षणिक, ऋणग्रस्तता, जनसंख्या वृद्धि विधिक प्रक्रिया में विलम्ब जातिवाद जैसी समस्याएँ आज भी कही-न-कही विद्यमान है। अत: जनजातियों को अपनी स्थिति में सुधार की आवश्यकता है तथा इनकी स्थितियो को सुधारने के लिये सरकारों के भी सशक्त कदम उठाना चाहिए।
संदर्भ सूची :-
1. श्रीवास्तव प्रदीप, भारत का जनजातीय जीवन, 2001 पृष्ठ क्र.   42-43
2. उपाध्याय शर्मा, भारत में जनजातीय संस्कृति, 1989 पृष्ठ क्र.1
3. श्रीवास्तव प्रदीप, भारत का जनजातीय जीवन 2001 पृष्ठ क्र. 1
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7. द्धह्लह्लश्चह्य/ ज् द्धद्बश 2द्बद्मद्बश्चद्गस्रद्बड्ड. ह्रह्म्द्द/2द्बद्मद्ब