ALL Hindi literature/Hindi Kavita Etc. Research article literature News Interview Research Paper Guidline
भाषा एवं राजनीति
January 12, 2020 • गुरमीत कौर • Research article

 भाषा जिसका शाब्दिक अर्थ-'वाणी की अभिव्यक्तिÓ होता है, ने मानव को अभिव्यक्ति का एक ऐसा माध्यम प्रदान किया है जिससे वे अपनी आवश्यकताओं व आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने के साथ ही संवाद द्वारा अपने जीवन में गतिशीलता ला सकें। भाषा की इसी संवेदनशीलता के महत्व को देखते हुए भाषा को प्रत्येक राष्ट्र में उचित स्थान दिया गया है। किन्तु भाषा से संबंधित विवाद विश्व के अनेक भागों के साथ भारत में भी समय-समय पर उठते रहे है। भारत में शासन की लोकतांत्रिक प्रणाली के अन्तगज़्त भाषा की समस्या ने जितना मुखर रूप धारण किया उतना हम विश्व के किसी भी देश में नहीं देखते। भारत के राजनीतिक दल एवं राजनेताओं ने अपनी महत्वकांक्षाओं की पूर्ति के लिए भाषा जैसे संदेनशील मुद्दे पर लोगों का धु्रवीकरण कर उन्हें स्वयं के हित साधन के रूप मे सफलतापूर्वक प्रयोग किया है और वर्तमान समय में भी यह प्रक्रिया अनवरत चल रही है। प्रस्तुत लेख में भारत की राजनीति में भाषा का किस प्रकार उपयोग किया जाता रहा है, इस बिंदु के साथ ही उसके कारण एवं प्रभावों पर एक तार्किक विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है। 
 'भाषा यादृच्छिक प्रतीकों की वह सामाजिक संपे्रषण व्यवस्था है जिसमें ध्वनियाँ एवं शब्द तो सीमित होते परंतु सृजनात्मक प्रयोग के कारण उससे निर्मित वाक्य असीमित हो जाते है।ÓÓ
 किसी भी समाज के विकास की पहचान भाषा एवं उसके शब्दों के चयन से की जा सकती है। अत: यदि हम कहे कि भाषा हमारे विकास, अस्मिता, सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान काएक साधन है, तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। नि:संदेह भाषा के बिना मनुष्य सर्वथा अपूर्ण है। भाषा की इसी संवेदनशीलता को पहचानते हुए भारतीय राजनीति में इसका प्रयोग अपने हित में करने का सफलतापूर्वक प्रयास भी किया गया है। इसका नवीन उदाहरण हम कर्नाटक के बेंगलुरू में देख सकते जहाँँ मेट्रो रेल सेवा के लिए जारी निर्देश एवं बोर्ड हिन्दी में लिखे जाने का तीव्र विरोध हुआ। विरोध कर रहे लोगों का नेतृत्व एक विशेष (कन्नड़) भाषा-भाषी क्षेत्र से जुड़े नेता कर रहे थे तथा यह नारा लगा रहे थे 'नम्मा कन्नड़ नम्मा बेंगलुरूÓ साथ ही 'हिन्दी समाजवाद नहीं चलेगाÓ, 'हिन्दी  थोपी जा रही हैÓ, 'पिछले आश्वासनों को पूर्ण करोÓ आदि विघटनकारी शब्द भी वायुमंडल में गूंज रहे थे।
 चूंकि कर्नाटक में शीघ्र ही विधानसभा चुनाव होने जा रहे थे तथा प्रत्येक राजनीति दल ने भाषा के मुद्दें को हवा देकर उसके द्वारा अपना हित साधने का उचित अवसर इसके अंतगज़्त देखा। इस प्रकार बढ़ते विवाद के कारण मेट्रो रेल को हिन्दी भाषा में छपे बोर्डो तथा दिशा-निदेर्शों को हटाने का निणज़्य लेना पड़ा।
 राजनीति में भाषा संबंधी एक दूसरा विवाद हाल ही में चर्चा का केन्द्र रहा। घटनाक्रम कुछ इस प्रकार था कि केन्द्रीय कृषि मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने '2032 का भारत कैसा होÓ विषय पर आयोजन में भाग लेने हेतु सभी मंत्रीगणों को हिन्दी में एक पत्र लिखा एवं ऐसा ही एक निमंत्रण-पत्र ओडिशा के सांसद तथागत सत्पथी को भी भेजा। इस पत्र का आश्चर्यनजक रूप से जवाब उडिय़ा भाषा में लिखते हुए श्री सत्पथी ने लिखा कि ''चूंकि मैं आपकी हिन्दी भाषा नहीं जानता, इसलिए आपने पत्र में क्या लिखा है, मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ। ओडिशा एक 'सीÓ श्रेणी राज्य है, अत: आप हमारे साथ उडिय़ा या अंग्रेजी भाषा में पत्र-व्यवहार करें।
यह बात आश्चर्यजनक लगती हैं कि श्री सत्पथी को अपने स्टाफ (कर्मचारी) में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो हिन्दी भाषा में लिखे पत्र को पढ़ सके, साथ ही श्री सत्पथी उस पत्र का जवाब उडिय़ा में न देकर अंग्रेजी भाषा में दे सकते थे। एक मंत्री और सांसद के मध्य पत्र-भाषा सम्बन्धी विवाद इस बात को दृढ़ करता है की भाषा संबंधी विवाद की जड़े काफी उच्च स्तर पर पहुँच चुकी है तथा भाषा को अपने नीहित स्वाथज़् के लिए मोहरा बनाया जा रहा है।
इस तथ्य को हम स्वतंत्रता के पश्चात् ही देख सकते है जब क्षेत्रीय राजनीतिक दलों द्वारा अपने नीहित स्वार्थ तथा राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण भाषावाद एवं क्षेत्रवाद जैसे मुद्दों को उठाया गया और तभी से भारत में कभी तेलगू भाषी आंध्रप्रदेश राज्य के निमाज़्ण हेतु आंदोलन हुआ तो कभी कन्नड़ भाषी कर्नाटक, बोडो भाषा-भाषी बोडोलैण्ड आदि के लिए आंदोलन चलाया गया जिनसे उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा की पूतिज़् भी हुई तथा जो प्रक्रिया 1953 में आंध्रप्रदेश के निमाज़्ण के साथ प्रारंभ हुई उसने आगे बढ़ते हुए गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना आदि राज्यों के निर्माण को संभव बनाया जिसके परिणामस्वरूप राज्यों की संख्या 1950 ई0 के पश्चात् 14 से बढ़कर वतज़्मान में 28 हो चुकी है।
यदि बात यही तक रूक जाती तो सही भी था लेकिन विडंबना यह है कि भाषा पर आधारित क्षेत्रवाद का दायरा दिनो दिन बढ़ता जा रहा है और हाल ही में मिथिलांचल, पूर्वाचल, विदर्भ, कोंकण, मराठावाड़ा जैसे नवीन राज्यों के निर्माण हेतु मांगे बढ़ती जा रही है जिससे नित नए प्रकार के आंदोलन उभर कर सामने आ रहे है।
भाषा का राजनीतिक स्वार्थ के लिए प्रयोग केवल भारत में ही नहीं अपुति वैश्विक स्तर पर भी भाषा को राजनीतिक स्वार्थो की प्रति-पूर्ति का माध्यम बनते हुए देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए जब विशुद्ध जर्मन भाषी लोगों के लिए जर्मनी राज्य की स्थापना का सफल प्रयास किया गया तो इसी संदर्भ में प्रकार चेक, पोलिश, डेन, आदि भाषा पर आधारित नवीन राज्यों की स्थापना तथा पुराने राज्यों का विखंडन भी हमारे समक्ष आया।
इस प्रकार कह सकते है कि भाषा और राजनीति का चोली-दामन का संबंध रहा है। आधुनिक समय में राजनेता प्राय: जनता के समक्ष उनकी भाषा में ही बात करते है जिससे जनता में यह विश्वास उत्पन्न किया जा सके कि वे उन्हीं के राजनेता है, उनके हितों के प्रति संवेदनशील है तथा वे ही उनके हितों की पूतिज़् एवं रक्षा कर सकते है। इस प्रकार क्षेत्र विशेष के लोगों के साथ नेता या नेतृत्व अपना सम्बंध स्थापित करने में कामयाब हो जाते है। साथ ही वे क्षेत्र विशेष के लोगों को इस बात का विश्वास दिलाने में भी सफल हो जाते है कि दूसरे भाषा-भाषाी लोग उनका शोषण कर रहे है तथा उनकी प्रगति को बाधित कर रहे है।
 इस प्रकार का विभाजनकारी दृष्टिकोण देश के लोगों के मध्य परस्पर अविश्वास की भावना को उत्पन्न करता है जो अंतत: क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद, जातिवाद और प्रजातिवाद जैसे विभाजनकारी भावना या स्वरूप में परिवर्तित हो जाती है।
 उपरोक्त विवरण भाषा को राजनीतिक रूप से प्रयोग करने के एक ही पहलू को दर्शाते है। वर्तमान समय में भाषा का राजनीति के संदर्भ में एक दूसरा पहलू भी सामने आता है जो हमारे समाज-संस्कृति पर कठोर चोट करता है तथा राजनीति में नैतिकता के स्तर में आई गिरावट को प्रदर्शित करता है, वह है - भारतीय राजनीति एवं राजनेताओं का भाषा के संबंध में गिरता हुआ स्तर।
 हाल ही में दिवंगत हुए भारत के वरिष्ठ राजनेता श्री अरूण जेटली ने अपने फेसबुक पोस्ट में राजनीतिक बहस के दौरान भाषा में आ रही गिरावट का उल्लेख किया था। राजनेताओं जनप्रतिनिधिओं द्वारा न केवल संसद पटल पर अपितु संसद के बाहर भी दूसरे तथा अपने प्रतिद्वंद्वी नेताओं के प्रति अमयादिज़्त भाषा में टिप्पणी करते हुए देखा जा सकता है, जो नि:संदेह राजनीति में नैतिकता के संकट की बहस ;कमइंजमद्ध को प्रकट करती है। राजनीतिक बहस का स्तर दिन-प्रति-दिन गिरता जा रहा है। अधिकतर राजनीतिक बहस एक दूसरे की आलोचनाओं की अपेक्षा अपशब्दों पर केन्द्रित होकर रह गई है। आज भारतीय राजनीति में असंसदीय भाषा और भावों का प्रयोग इतना सामान्य हो गया है जिससे यह अंतर करना मुश्किल हो गया है कि क्या संसदीय है और क्या असंसदीय। यह राजनीति में मानसिक दिवालियापन को प्रदर्शित करता है। 
भाषा को किसी जाति और सम्प्रदाय से जोड़कर देखने वाले देश के नेता तथा राजनीतिक दल कभी मराठी, कभी ऊर्दू, कभी बांग्ला, तो कभी कन्नड़ आदि के नाम पर अपना वोट बैंक स्थापित करने के सम्बंध संकुचित स्वार्थसिद्धि के प्रयास में लगे हुए है जो भारतीय राष्ट्रवाद तथा राष्ट्रीयता के लिए किसी भी प्रकार से उपयोगी नहीं है।
 जैसा कि ऊपर वर्णन किया जा चुका है कि यह अचानक उपस्थित होने वाली समस्या नहीं है। इस समस्या का विकास भारत में दलगत राजनीति के उत्थान के साथ ही प्रारम्भ हो गया था। हमारे राष्ट्रवादी नेताओं तथा दूसरे बौधिक व्यक्तियों ने इस समस्या को देखते हुए भविष्य में इस समस्या की विभीषिका से बचाव हेतु अनेक प्रयासों की व्यवस्था की जिसमें से एक महत्वपूर्ण पहलू था 1968 में भारतीय शिक्षा प्रणाली में त्रिभाषा फार्मूले को लागू करना था।
 त्रिभाषा फार्मूले व्यवस्था के अंतर्गत प्राथमिक स्तर पर विद्यालयों में बच्चों को कम से कम तीन भाषाएँ जैसे प्रथम भाषा हिन्दी, द्वितीय भाषा अंग्रेजी तथा तृतीय भाषा स्थानीय भाषा पढ़ाए जाने का प्रावधान किया गया था। इसका प्रमुख उद्देश्य यह था कि न तो क्षेत्रीय या स्थानीय भाषाएँ समाप्त हो और न ही दो भिन्न प्रदेशों के लोगों के मध्य वार्तालाप (कम्युनिकेशन) से सम्बन्धित समस्या उत्पन्न हो, जब ये समस्याएँ उत्पन्न ही नहीं होंगी तो भाषावाद या क्षेत्रवाद की समस्या भी उत्पन्न नहीं होगी परंतु क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के विरोध तथा सरकार के ढुलमुल रवैये के कारण यह फार्मूले सही तरह से क्रियान्वित नहीं हो पाया अंतत: यह फार्मूला असफल हो गया। इसका असफल होना न केवल भारतीय राजनीति में बढ़ते क्षेत्रवाद, भाषावाद, अलगाववाद को मौन स्वीकृति प्रदान करता है अपितु इनके निरंतर बढ़ते स्वरूप पर अपनी मौन सहमति भी प्रदान करता है जो भारतीय राष्ट्रवाद की दृष्टि से किसी भी प्रकार से उचित नही है। आज हमारे राजनेता शायद यह बात मानने को तैयार नहीं है कि उन्होनें भाषा को जिस प्रकार अपने हितों की पूर्ति का माध्यम बनाया है उससे न सिर्फ राजनीति अपितु भाषा एवं संस्कृति का भी दीर्घकालीन नुकसान हो सकता है।
 हमारे नीति-निर्माताओं, राजनीतिज्ञों एवं समाज के दूसरे वर्ग के लोगों को अब यह समझना होगा कि भाषा विवाद का जो विषाक्त बीज वो बो रहे है वो आगे चलकर उनके लिए भस्मासुर अवश्य साबित होगा और वह क्षणिक लाभ के लालच में दीर्घकालीन क्षति कर रहे है। हम सभी को यह समझना होगा कि आज कर्नाटक का बेंगलुरू जो आई टी सीटी के रूप में विकसित हुआ है उसमें भारत के सभी भागों के लोगों के साथ-साथ विश्व के लोगों का भी महत्वपूर्ण योगदान है या फिर मुम्बई जिसने आर्थिक राजधानी एवं मायानगरी बालीवुड का रूप लिया है उसके पीछे भी भारत के अन्य भागों में रहने वाले लोगों का ही महत्वपूर्ण योगदान है ना कि सिर्फ मराठियों का। 
अत: आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने नीहित स्वार्थों से ऊपर उठकर देशहित-राष्ट्रहित के साथ ही मानव कल्याण के विषय में भी चिन्तन-मनन करें तभी हम सबका कल्याण हो सकता है तथा राष्ट्र प्रगति के पथ पर निरंतर निर्बाध रूप से प्रगतिशील हो सकता है।

संदर्भ सूची:-
1. भारत में शासन और राजनीति - ए. एस. नारंग
2. हिन्दी भाषा - डॉ. भोलानाथ तिवारी
3. हिन्दी भाषा - डॉ. हरदेव बाहरी
4. www.bbc.com/hindi/index/2016/03/
 160314_politics_absolute
5. www.deshbandhu.co.in/editorial/
 lite/politics

गुरमीत  कौर

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली