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चैलेन्जेज़ एवं स्टे्रेटेजीस इन मेंकिंग इण्डिया एण्ड 5 ट्रिलियन इॅकानॉमी , खादी ग्रामोद्योग में रोजगार की असीमित संभावनाएँ: भारत एक उभरती हुई  वैश्विक आर्थिक शक्ति की और              
December 10, 2019 •     विद्या नंद पाण्डेय  

शोध सांराश :- भारतीय अर्थव्यवस्था में 70-80त्न आन्तरिक उपभोग पर आधारित वैश्विक स्तर की अनेक सम्भावनाओं वाली शक्ति बनने के कगार पर है जिसकी नवोदित आबादी1 60-65त्न विश्व में सर्वाधिक है, यही वो ताकत है जो किसी अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा निर्धारित करती रही है। भारत में कुशल शिल्पी और प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों2 के साथ अतीत का गौरवशाली इतिहास रहा है आज भारत में विश्व की तीसरा स्टार्ट अप इकोलाजिकल सिस्टम है जो दो बिलियन डॉलर को पार करने वाला है जनसंख्या विश्व की आबादी में 20त्न योगदान एवम् 2030 तक चीन का स्थान ले चुका होगा उभरती हुई अर्थव्यवस्था में टॉप 5 में शामिल है। वर्तमान में 3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ राजनीतिक इच्छा शक्ति से परिपूर्ण है। विदेशी मुद्रा भण्डार में टॉप 7 देशों में 440 अरब डॉलर पर पहुॅचकर सेनसेक्स 40000 के आँकड़ो को भी पार कर चुका है चीन से विदेशी निवेशक हताश होकर भारत में आने को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। गैर परम्परागत ऊर्जा  क्षेत्रों में भारत अग्रणी देशों मं काफ ी प्रगति की है विश्व बैंक के व्यापार सुगमता सूचकांक में एक लम्बी छलाँग भरी है। (63 रैंक) विश्व राजमार्ग और टेली कम्प्यूनिकेशन में आज भारत के आगे विकसित देश भी पानी भर रहे है अगर भारत की यही गति को कुछ आंतरिक कमजोरियों पर सुधार किया जाए तो निश्चित ही पाँच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था का तमगा पहन सकता है रेल और अंतरिक्ष शक्ति इसका बांट जोह रहे है।   
शब्द बीज- 1. नवोदित आबादी, 2. प्राकृतिक संसाधन, 3. स्टार्टअप इकोलोजिकल सिस्टम, 4. पाँच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था, 5. सूचकांक
शोध अभियांत्रिकी- सम्पूर्ण शोध साहित्य रूपी भवन का निर्माण द्वितीय समंको के मजबूत नींव पर आधारित है। 
 शोध उद्देश्य:-
01. खादी ग्रामोद्योगों का रोजगार सृजन में भूमिका का अध्ययन करना। 
02. खादी ग्रामोद्योगों की शासकीय नीति का अध्ययन करते हुए वैश्वीकरण के आलोक में उनकी प्रासंगिकता हेतु निर्माण का सुझाव का पता लगाना। 
 परिचय:-भारतीय अर्थव्यवस्था के अतिप्राचीनकाल से ग्रामोद्योग तथा लघु व कुटीर उद्योग अर्थव्यवस्था की धुरी1, कला कौशल के उत्कृष्ट स्वरूप एवं इतिहास के स्वर्णिम अध्याय रहे है2। ब्रिटिश शासनकाल की स्वार्थपूर्ण नीति के झंझावत में फंस कर भारतीय परम्परागत ग्रामोद्योग अपने दैदीप्यमान आभा3 को गंवाने को बाध्य हुए। भारतीय संस्कृत व परम्परा के भावुक्तापूर्ण मोह में इस मुहिम टिमटिमाते द्वीप1 को अल्प कही सही परन्तु बनाए रखा। अति प्राचीनकाल से ही भारतीय वस्त्र बुनने की कला विश्व-विख्यात रही सूती और रेशमी कपड़ों की भारत जन्म भूमि रही। ढाका का मलमल व 'चापा का कोसा' आज तक प्रसिद्ध हैं। इस प्रकार वस्त्र निर्माण सम्बन्धी भारतीय कला की पूर्णता, दक्षता का अद्भुत कौशल के अनेकानेक प्रमाण उपलब्ध है। हमारे वेदों से लेकर पुराणों एवं विवाह गीतों में मानव निर्मित सूत्रों का निव्र्रिवाद प्रमाण है कि भारतीय वस्त्र कला उस काल में भी अपने चरम पर थी। 
 समस्या:-ब्रिटिश शासनकाल की औपनिवेशिक नीतियों वृहद उद्योगों की स्थापना, विदेशी वस्तुओं की प्रतिस्पर्धा, प्रमापीकरण एवं इन उद्योगों के प्रति उपेक्षित दृष्टिकोण, सामाजिक संरचना में कारीगरों के साथ उपेक्षित व्यवहार, कच्चेमाल की कमी, कठोर श्रम आदि ने भारतीय सूती वस्त्र को गहरा धक्का लगा दिया। 
 स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व खादी ग्रामोद्योग का गौरवशाली इतिहास4 रहने के बावजूद इनका सम्पूर्ण ढाँचा जीर्ण-शीर्ण सा हो गया था। उन्नीसवीं शताब्दी तक खादी एवं ग्रामोद्योग अपनी पहचान कायम न रख सकी। भारतीय कारीगरों ने पलायन कर दिये और परम्परागत हस्तकला का परित्याग कर दिया। 
 वस्त्र उद्योग में निरंतर मांग की संभाव्यता से सम्पन्न हैं बल्कि तकनीकी कौशल एवं स्टार्टअप हेतु अनेकों संभावनाओं से भी है। टेक्सटाइल की भारतीय कहानी में चुनौतियाँ तो हैं, लेकिन उम्मीदों की रोशनी भी है। भारत के टेक्सटाइल उद्योग अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर एक बहुत बड़े खिलाड़ी की भांति है। राष्ट्र के कॉमट्रेड रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में इटली, जर्मीनी और बाग्लादेश को पीछे छोड़कर चीने के बाद दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक रहा है। 
 सम्बन्धित साहित्य का अध्ययन:- अपने अध्ययन साहित्य में 'साइमन एण्ड शूस्तर रिइमेजिनिंग इण्डिया केकोन्जी एण्ड कम्पनी (सम्पादित) नई दिल्ली 2013 फ ारवर्ड ङ्गढ्ढढ्ढढ्ढढ्ढ में भारत का निर्यात वृहत स्तर पर था। 
'माक्र्स, पूँजी खण्ड एक अध्याय 15 अनुभाग-4 में - 
 ब्रिटिश औपनिवेशिक लोलुपता में भारतीय हस्त करघा और ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति में सहायक बने शोषण का विस्तृत इतिहास लिखा गया है। 
'इण्डियन इडस्ट्रियल कमीशन 1916-18 की रिपोर्ट - में भारतीय वस्त्र उद्योग अपने चरम पर था। रजनी पाम दत्त, आज भारत पृष्ठ 44, मैकमिलन इण्डिया लि0 1996 - में भारत का शोषण करके गलत नीतियों से ब्रिटिश उद्योगों का लाभ पहुॅचाया गया। 
 नौरोजी दादा भाई अनब्रिटिश रूल इन इण्डिया 1868  में ङ्खद्गड्डद्यह्लद्ध ष्ठह्म्ड्डद्बठ्ठ का विस्तृत विवरण मिलता है। 
दि टाइम्स, 4 जनवरी 1933, में भारत में निर्यात में बाधा के नये मापदण्डों में ब्रिटिश उद्योगों को लाभ पहुॅचाया गया। 
ष्ठद्ग1द्गद्यशश्चद्वद्गठ्ठह्ल ष्टद्गठ्ठह्लह्म्द्ग स्ह्लह्वस्रद्बद्गह्य,ङ्कशद्य. -ढ्ढ, ्र द्वद्ब.द्यद्यद्बठ्ठठ्ठद्बड्डद्य क्कद्गठ्ठह्यद्गश्चद्गष्ह्लद्ब1द्ग ङ्कशद्य-२, ॥द्बह्यह्लशह्म्द्बष्ड्डद्य ह्यह्लड्डह्लद्बह्यह्लद्बष्ह्य में ब्रिटिश प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मेडिसन एंगेज ने भारत और चीन के बीच 20देशों की कुल विश्व जी0डी0पी0 का विस्तृत विवरण किया है। जिसमें 657 पेजों में से 263 पेज पर भारत का वैश्विक जी0डी0पी0 में योगदान 32.9 एवं चाइना भारत का योग वैश्विक जी0डी0पी0 का 59.1 प्रतिशत जो कि सर्वोच्च बिन्दु पर था।  कपास की खेती से हुई प्रगति का अक्स शुरूआती दशकों में देश की टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर साफ  दिखा है। कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला उद्योग टेक्सटाइल उद्योग है। 2013 में यह 140 अबर डॉलर का उद्योग बन चुका जो कि देश की कुल जीडीपी का करीब 7.5 प्रतिशत है। 44 लाख लोग बुनकर कला से सम्बद्ध है जिनमें 78 लाख स्त्रियों को ताकत मिलेगी और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में समावेश की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलेगा बशर्ते इनके मध्य सम्बद्धता स्थापित। कपड़ा मंत्रालय ने वस्त्र उद्योगों के विकास के लिए 1 करोड़ लोगों को रोजगार उपलब्ध होने की उम्मीद है जिसमें 70 प्रतिशत महिलाएं होंगी। भरतीय वस्त्र क्षेत्र देश के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाला एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। भारत विविध प्रकार के टेक्सटाइल का निर्यात करता है। इनमें प्राकृतिक, रीनेनेेरडिट सेल्यूलोस और सिंथेटिक फाइबर्स शामिल है। बाग्लादेश, चीन और पाकिस्तान जैसे कम लागत वाले आपूर्तिकर्ताओं के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद देश के टेक्सटाइल निर्यात ने हाल के वर्षो में महत्वपूर्ण कार्य किया है। 
 लघु एवं कुटीर उद्योग में रोजगार:- लघु एवं कुटीर उद्योग के माध्यम से हम भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में रोजगार सृजित कर सकते हैं, संतुलित क्षेत्रीय विकास के लक्ष्य को भी साध सकते हैं एवं अंतत: प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि कर सकते हैं। गांव-गांव तक लघु उद्योगों के प्रसार से हमारे अनुपयुक्त संसाधनों का भी अनुकूलतम उपयोग संभव हो पाएगा। अत: हमें आवश्यकता है कि विभिन्न क्षेत्रों की आवश्यकताओं एवं संसाधनों को ध्यान में र खते हुए संबंधित उद्योग को ही विकसित किया जाए तथा हाल के दिनोंमें सरकार द्वारा चलाई गई 'स्किल इंडिया' मुहिम को इससे जोड़ा जाए ताकि आवश्यक मानव संसाधन तैयार हों एवं अपने गृह क्षेत्र में ही लोगों को रोजगार भी मिल सके। भारत के प्रथम प्रधामंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के पश्चात् कहा था 'कुटीर और लघु उद्योग भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हमारे पास पूंजी की कमी है परंतु मानवशक्ति की नहीं, और हमें इसी मानवशक्ति का उपयोग देश की सम्पत्ति को बढ़ाने एवं देश से बेरोजगारी को दूर करने के लिए करना चाहिए।' आज भी जब सरकार जनसांख्यिकीय लाभांश प्राप्त करना चाहती है तो उसके लिए आवश्यकता है राष्ट्र की विशाल मानव शक्तिको मानव संसाधन में परिणत कर उन्हें रोजगार प्रदान करने की और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अगर सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र कोई है तो वह है लघु उद्योग । ऐसा क्यों है और लघु एवं कुटरी उद्योग में कितनी अपार संभावनाएं हैं। इसको भी हम आगे समझेंगे। लेकिन उससे पहले लघु उद्योग से संबंधित मूल बातों को जानने की आवश्यकता है। 
 किसी भी राष्ट्र के आर्थिक सशक्तिकरण में छोटे-छोटे स्तर पर संचालित इन घरेलू लघु एवं कुटीर उद्योगों की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।, इसे जानने के लिए हमें कही दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। हम पड़ोसी देश चीन का उदाहरण ले सकते है। चीन का विनिर्माण के क्षेत्र में मजबूत होना एवं वहाँ के विभिन्न उत्पादों का भारत सहित विश्व में कई बाजारों में अच्छी-खासी दखल होने की एक प्रमुख वजह है वहां के लघु उद्योगों का सशक्त होना। 
 भारत में लघु उद्योग की स्थिति एवं संभावनाएं:- भारत के संदर्भ में देखा जाए तो हमारे यहां लघु उद्योगों में उत्तरोत्तर संवृद्धि हुई। इकाईयों की संख्या, उत्पादन एवं इससे सृजित रोजगार के आंकड़ो को देखकर हम यह कह सकते हैं कि हमारे देश के आर्थिक -सामाजिक विकास में यह एक अहम भूमिका निभा रहा है। 
 यदि आंकड़ो को देखा जाए तो वर्ष 1994-95 में लघु उद्योग की इकाईयों की अनुमानित संख्या 79.6 लाख थी, जबकि वर्ष 2001-02 में हुई लघु उद्योगों की तीसरी अखिल भारतीय गणना के अनुसाय यह संख्या 105.21 लाख हो गई। इसी प्रकार अनुमानित रोजगार की संख्या वर्ष 1994-95 हेतु 191.40 लाख से वर्ष 2001-02 के लिए 249.33 लाख पाई गई थी। यह आंकड़े लघु उद्योगों की बढ़ती संख्या एवं इनके द्वारा रोजगार सृजन की संभावनाओं के तरफ इंगित करते हैं। अब अगर वर्ष 2006-07 में हुई सूक्ष्म,लघु, और मझोले उद्योग की चौथी अखिल भारतीय गणना की रिपोर्ट को देखे तो वर्ष 2006-07 के लिए अनुमानित रोजगार सृजन की संख्या361.76 लाख बताई गई है एवं अनुमानित रोजगार सृजन की संख्या 805.24 लाख। आंकड़ो को दो अलग भागो में रखने का कारण यह है कि वर्ष 2006-07 में मंत्रालय का नाम लघु उद्योग से बदलकर सूक्ष्म, लघु एवं मझोला उद्योग मंत्रालय रखा गया जिसके कारण परिभाषा में परिवर्तन आ गया तथा अब निर्माण के साथ - साथ सेवाओं को भी इसमें सम्मिलित कर लिया गया है। इसलिए यह आंकड़े सीधे -सीधे 2001-02 से तुलनीय नहीं हैं। परंतु मंत्रालय की वर्ष 2012-13 की रिपोर्ट यह कहती है कि यदि सख्ती से तुलना की जाए तो वर्ष 2001-02 से वर्ष 2006-07 तक के दौरान उद्यमों की अनुमानित संख्या के लिए विकास दर 15.30 प्रतिशत एवं रोजगार के लिए विकास दर 15.02 प्रतिशत रही। 
 भारत जैसे देश में लघु उद्योगों के विस्तार व सशक्त होने से मुख्यत: दो प्रकार के महत्वपूर्ण लाभ मिलेगे - 
01. रोजगार सृजन
02. संतुलित क्षेत्रीय विकास 
 आइए, हम समझने का प्रयास करें कि कैसे एवं क्यों हम लघु उद्योगों के माध्यम से रोजगार सृजित करने के साथ साथ भारत के संतुलित क्षेत्रीय विकास (जोकि हमारे समावेशी विकास के राह की सबसे बड़ी बाधा है) को संभव बना सकते है। 
महिला रोजगार - 
 महिला उद्यमिता हमारी आर्थिक प्रगति का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। बिना महिलाओं को स्वावलंबी बनाए हम महिला सशक्तीकरण के स्वप्न को भी साकार नहीं कर सकते हैं। लघु उद्योग महिला उद्यमिता को विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। विशेषकर ग्रामीण परिवेश में जहां महिलाएं पर्याप्त रूप से शिक्षित व कुशल नहीं हैं। साथ ही साथ ग्रामीण परिवेश के कारण उनके घरों से ज्यादा दूर जाने परभी बंदिशेहोती हैें। ऐसे में कुटीर उद्योग एवं ग्रामोद्योग को बढ़ावा देकर ही महिलाओं को उनके घरों के आसपास ही रोजगार प्राप्त हो सकता है। हमारे यहां कई सफल महिला, उद्यमों के उदाहरण भी है परंतु ये संख्या बेहद कम है। यदि सूक्ष्म, लघु एवं मझोले मंत्रालय का वर्ष 2010-11 की रिपोर्ट देखें तो पता चलता है कि महिलाओं द्वारा प्रबंधन किए जाने वाले  अथवा महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यम महज 13.72 प्रतिशत की है। उसमें भी अन्य आंकड़े देखे तो भाारत में महिलाओं द्वारा चलाई जाा रही सभी लघु उद्योग इकाईयों में दक्षिण के चार राज्यों और महाराष्ट्र की महिला उद्यमी 50 प्रतिशत से अधिक हैं। अत: स्थिति स्पष्ट है कि एक तो महिला उद्यमियों की संख्या कम है और जो वह भी अधिकांशत: कुछ राज्यों तक की सीमित हैं। इसलिए हमें दोनों ही दिशाओं में कार्य करना होगा। महिलाओं को उद्यमी बनने के लिए उत्प्रेरित करना होगा एवं इसके साथ ही भारत के सभी राज्यों में समान रूप से महिला उद्यमिता कोबढ़ावा मिले, इस दिशा में भी सभी आवश्यक कदम उठाने पर ध्यान देना होगा। 
रोजगार सृजन एवं महिला उद्यमों को बढ़ावा देने हेतु सरकार की पहल :- 
हमारी सरकार भी इस क्षेत्र से रोजगार सृजन एवं महिलाओं को स्वावलंबन प्रदान करने हेतु प्रयासरत है। वर्ष 2008 में'प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम' नामक एक राष्ट्र-स्तरीय ऋण संबंधी सब्सिडी स्कीम शुरू की गई। इस कार्यक्रम के अंतर्गत सेवा क्षेत्र में 10 लाख रूपये तक और निवनिर्माण क्षेत्र में 25 लाख रूपये तक की लागत वाले सूक्ष्म उद्यमों की स्थापना हेतु वित्ततीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है। यह वित्तीय सहायता ग्रामीण क्षेत्रों में परियोजना लागत की 25 प्रतिशत की दर पर मार्जिन मनी सब्सिडी (कमजोर वर्गो सहित विशेष श्रेणी के लिए 35 प्रतिशत) उपलब्ध कराई जाती है। इस योजना के तहत सामान्य लाभार्थी का अंशदान परियोजना लागत का 10 प्रतिशत है एवंऋण के रूप में बैंक वित्तपोषण परियोजना उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए कई प्रकार की विशेष योजनाएं चलाई जा रही है। महिला उद्यमिता के संवर्धन के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आयोजन पर विशेष बल दिया जारहा है। वर्ष गुवाहाटी , एनएसआइसी इत्यादि संस्थाओं ने विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के अन्तगर्त लगभग 87437 महिलाओं को प्रशिक्षित किया।यह संख्या कितनी बड़ी है यह बहस का मुद्दा हो सकता है परंतु यह कम से कम इतना तो इंगित करता ही है कि इस क्षेत्र में जो असीमसंभावनाएं हैउसे समझरही है तथा भविष्य में सुदृढ़ प्रयास के माध्यमसे और बेहतर परिणाम मिल सकते है। इसी क्रम में महिलाओं को ही समर्पित एक और योजना है 'महिला कॉयर योजना'।इसस्कीम के अन्तर्गत प्रशिक्षण देनेके बाद महिला कारीगरों को कॉयर यार्न की बताई के लिए मोटरयुक्त रट के वितरण का प्रावधान है। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम में भी महिला उद्यमियों के लिए परियोजना लागत की 25 प्रतिशत की दर पर मार्जिन मनी सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है एवं ग्रामीण क्षेत्रों में यह परियोजना लागत की 35 प्रतिशत की दर पर है। इतना हीं नहीं महिला उद्यमियों के मामले में लाभार्थी का अंशदान परियोजना लागत का 5 प्रतिशत है जबकि अन्य के मामले में लाभार्थी का अंशदान परियोजना लागत का 10 प्रतिशत है और महिलाओ के लिए ऋण के रूप में बैंक से प्राप्त होने वाला वित्तपोषण भी परियोजना लागत का 95 प्रतिशत है। ये सारे प्रयास यहीं इंगित करते हैं कि सरकार भी यह स्वीकार करती है कि रोजगार सृजन व विशेषकर महिलाओं को स्वावलंबी बनाने का उत्तम  माध्यम लघु उद्योग हो सकते है।  
देश का  संतुलित क्षेत्रीय विकास  एवं उत्तर पूर्व राज्यों में व्याप्त संभावनाएं - 
 गांधी जी ने सशक्त  भारत के लिए गांवों को सशक्त बनाने की बात की थी और यह तभी संभव है जब गांव आर्थिक रूप से सशक्त बनें। चूंकि लघु उद्योगों के लिए बड़ी आधाभूत संरचनाओं की आवश्यकताएं नहीं है अत: यक सुदूर गांवों में भी स्थापित हो सकता है। क्षेत्र की विविधता के अनुरूप एवं वहां उपलब्ध संसाधनों के प्रकार के अनुरूप उस क्षेत्र विशेष में वैसे उद्योग स्थापित किए जा सकते है। उदाहरणार्थ यदि वहां के लेाग शिल्पकला में निपुण हों तो हस्तशिल्प। यदि वहां कृषि अच्छी है फल-सब्जियों आदि की अच्छी उपज हो तो खाद्य प्रसंस्करण उद्योग। इससे पलायन रूकेगा तथा क्षेत्र के संसाधनों का श्रेष्ठ उपयोग भी होगा एव ंअसंतुलित विकास की समस्या धीरे धीरे स्वत: समाप्त हो जायेगी। लघु उद्योगों को लेकर हमारे उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी विराट संभावनाएं हैं। 
 आज जब हमारे प्रधानमंत्री समग्र भारत के विकास को उत्तर पूर्व राज्यों के विकास के माध्यम से परिपूर्ण करने की बात कर रहे हैं ऐसे में यह आवश्यक है कि हम वहां व्याप्त संभावनाओं को देखें। अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विख्यात भारत के इस हिस्से में किन्हीें भौगोलिक कारणों से बड़े - बड़े उद्योगों की स्थापना नहीं हो पाई, परन्तु यहां लघु उद्योगों की अपार संभावनाएं है। इस क्षेत्र की जलवायु कृषि अनुकूल है एवं विशेषकर फलों एवं सब्जियों की पैदावार प्राकृतिक तरीके से यहां बड़े पैमाने पर हो सकती है। इसके साथ ही सरकार की तरह से मिलने वाली सब्सिडीज, एक्साइज, आयकर एवं पूंजी निवेश में विशेष लाभ यहां एक बेहतर व्यापार एवं उद्योग अनुकूल स्थिति का निर्माण करते हैं। अत: उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण एवं कृषि संबंधित उद्योगों की असीम संभावनाएं हैैं। यहां वर्तमान में भी लघु स्तर पर इस प्रकार के उद्योग चल रहे हैं पर वे संख्या में बहुत कम है। वर्ष 2009 में यहां 85 इकाइयों को फूड प्रॉडक्ट ऑर्डर (एफ0पी0ओ0) के तहत् लाइसेंस प्राप्त हुआ और  इनमें महज 32 की कार्यरत है। एमएसएमई 2009 की उत्तर पूर्व में हुए औद्योगिक विकास से संबंधित एक शोध रिपोर्ट कहती है कि यदि सामान्य मूल्यवर्धन जैसे कि खाद्य पदार्थो की सफाई कर उन्हें अच्छी तरह पैक करने आदि से ही कृषको की आय 42.8 प्रतिशत प्रति किलोग्राम तब बढ़ सकती है। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण इन उत्पादों के निर्यात की भी संभावनाएं है। ऐसे में हम उत्तर पूर्व के राज्यों में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देकर न सिर्फ उस क्षेत्र में रोजगार सृजित कर पाएंगे बल्कि निर्यात करने से हमारे 'भुगतान का संतुलन' भी सुधरेगा एवं सकार के 'चालू खाते के घाटे' को नियंत्रित करने की योजना में भी लाभ होगा। इसके अलावा हथकरघा उद्योग में भी उत्तर पूर्व क्षेत्रों में असीम संभावनाएं है। अधिकांश पूर्वोततर राज्यों में विशेषकर ग्रामीण लोगों के बीच हथकरघा उद्योग उनके सांस्कृतिक एवं आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण निभाता है। पूर्वोतर क्षेत्रों में पूरे देश की तुलना में हथकरघा का संकेद्रण सर्वाधिक है।
 लेकिन नकारात्मक पक्ष यह है कि यहां का अधिकांश उत्पादन अवाणिज्यिक अथवा स्व उपयोग के कार्य में आता है। अब जरा इसे आंकड़ों के माध्यम से समझते हैं। उत्तर पूर्व के पांच राज्यों अरूणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, नागालैण्ड एंव त्रिपुरा मिलकर घरेलु लूमेज का 82 प्रतिशत हिस्सा उत्पादित करते हैं, जबकि वाणिज्यिक रूप से इन राज्यों का हिस्सा महज 13.4 प्रतिशत पर सिमट जाता है। दूसरी समस्या है इन क्षेत्रों में बनाए जा रहे वस्त्रों की बनावट एवं प्रकार के कारण इस क्षेत्र के परिधान पूर्वोतर क्षेत्र के बाहर के परिधानों से मेल नहीं खाते जिसके कारण इनका पूर्वोत्तर क्षेत्र से बाहर बाजार नहीं हैं। अगर हमने इन समस्याओं को हल कर लिया तथा इनके उत्पाद को बाजार की मांग के अनुरूप ढालने में सक्षम हो गए तो यह पूर्वोत्तर राज्यों की अर्थव्यस्था को बहुत बल दे सकता है। 
लघु उद्योग के विकास में आने वाली प्रमुख चुनौतियां:- 
खादी संकट एवं उजड़ते गाँव की संस्कृति-
 पिछले कुछ दशकों में सभी अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों में शहरीकरण को ही विकास का पर्याय मान लिया गया है। इसका पूरा प्रभाव भारत के अर्थशास्त्रियों, योजनाकारों और प्रशासन पर दिखाई पड़ता है। उद्योग व्यापार से जुड़े लोगों की दृष्टि में यही स्वाभाविक गति है और गांवों को उजडऩे में ही सबका हित उन्हें दिखाई पड़ता है। 
 पुराने शहरों की बदहाली के बावजूद अगले कुछ वर्षो में 100 नये शहरों की योजना आगे बढ़ रही है। इसका सीधा अर्थ होगा कि हजारों गांवों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और उससे कई गुणा गांव इस विकास प्रक्रिया की चपेट में आएंगे। यह सवाल नजरअंदाज किया जा रहा है कि मौजूदा शहरों के कूड़े-कचरे और सीवर को निपटने में अक्षम प्रशासनिक व्यवस्था प्रदूषण की मार से ग्रस्त नदियों और चरमराती जल-व्यवस्था का सामना कैसे करेंगे? इस परिपेक्ष्य में खादी ग्रामोद्योग आज बहुत ही प्रासंगिक हो गया है। वही प्रश्न उठता है कि 2019 में महात्मा गांधी साद्र्धशति समारोह के अवसर पर खादी और ग्रामोद्योग एक जीवन्त क्षेत्र होगा? एक जीवन्त क्षेत्र होगा? या खादी कुछ संग्रहालयों और स्मारकों तक सिमट जाएगी? 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशव्यापी अभियान में अपनी सरकार की नीतियों और दिशा के बारे में स्पष्ट घोषणाएं की हैं। राष्ट्रपति के अभिभाषण और संसद में प्रधानमंत्री के भाषणों में औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने और रोजगार के नये अवसर पैदा करने का संकल्प स्पष्ट है। फरवरी के अंतिम सप्ताह में पंजाब में फतेह रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा था कि देश में आर्थिक विकास के तीन खंभे हैं, - कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र। उन्होंने यह भी कहा था कि जीडीपी में तीनों क्षेत्रों की बराबर एक-तिहाई हिस्सेदारी होनी चाहिए, तभी देश का संतुलित विकास होगा और देश आगे बढ़ेगा। यह एक महत्वपूर्ण घोषणा थी जिसका व्यापक प्रभाव पड़ेगा। पिछले कुछ वर्षो में ठीक उल्टा हो रहा है। कृषि और उद्योग की हिस्सेदारी घटती जा रही है। इसके लिए संप्रग सरकार की सोच, नीतियों और कार्यक्रम जिम्मेदार थे। अब यह उम्मीद है कि मोदी के नेतृत्व में यह असंतुलन आगामी वर्षो में धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा। 
हिन्द स्वराज में सभ्यता और जीवन शैली से जुड़े अनेक पहलू हैं। अभी इस आलेख में कुछ सीमित बिन्दुओं पर विषय केन्द्रित होगा। गांधी ने कहा था 
1. अगर गांवों का नाश होता है तो भारत का भी नाश हो जाएगा। उस हालत में भारत नहीं रहेगा दुनिया को उसे जो संदेश देना है उस संदेश को वह खो देगा। 
2. अगर हमें स्वराज्य की रचना अहिंसा के पाये पर करनी है तो गांवो को उनका उचित स्थान देना होगा। 
3. ग्रामोद्योग का यदि लोप हो गया, तो भारत के सात लाख गांवो का सर्वनाश ही समझिए। 
4. खादी वृत्ति का अर्थ है जीवन के लिए जरूरी चीजों की उत्पत्ति और उनके बंटवारे का विकेन्द्रीकरण।
5. जबसे गांवो में चलने वाले अनेक उद्योगों में से मुख्य उद्योग का और इसके आपस पास जुड़ी हुई कई दस्तकारियों का बिना सोचे समझे मनजाने तरीके से और बेरहमी के साथ नाश किया गया है, तब से हमारे गांवो की बुद्धि और तेज नष्ट हो गया है। 
 वित्तीय समस्या के अतिरिक्त कच्चे माल की समस्या तकनीकी समस्या, विपणन (मार्केटिंग) में कठिनाई एवं अवसरंचना का अभाव जैसी अनेक समस्याओं से इन लघु उद्यमियों को दो-चार होना पड़ता है। 
0. बिहार में पहला खादी ग्रामोद्योग माल कार्यालय का शुभारम्भ हुआ। 
0. देशी क्षमता को विकास परक बनाने हेतु कौशल विकास योजनाओं का समन्वय। 
0. महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन। 
0. प्रशस्ति पत्र एवं सेना तथा आम नागरिक को खादी वस्त्रों के लिए प्रोत्साहन दीन दयाल उपाध्याय योजना। 
0. कुशल उद्यमियों को प्रोत्साहन परक योजनाएं तैयार करना एवं स्वच्छ उर्जा पर विशेष प्रगति तथा गुरूग्राम हरियाणा में वैश्विक स्वच्छ उर्जा केन्द्र की स्थापना। 
0. एक जिला एक उत्पाद के लिये राज्य प्रोत्साहित उत्पाद को संसाधन उपलब्ध कराना। 
 लघु उद्योगों के विभिन्न आयामों को देखकर यह स्पष्ट है कि इनके माध्यम से हम भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में रोजगार सृजित कर सकते हैं, संतुलित क्षेत्रीय विकास के लक्ष्य को भी साध सकते हैं एवं अंतत: प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि कर सकते हैं गांव गांव एवं लघु उद्योगों के प्रसार में हमारे अनुपयुक्त संसाधनों का भी अनुकूलतम उपयोग संभव हो पाएगा। अत: हमें आवश्यकता है कि विभिन्न क्षेत्रों की आवश्यकताओं एवं वहाँ उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखते हुए संबंधित उद्योग को ही विकसित किया जाए तथा हाल के दिनों में सरकार द्वारा चलाई गई 'स्किल इंडिया' मुहिम को इससे जोड़ा जाए ताकि आवश्यक मानव संसाधन तैयार हो एवं लोगों को अपने गृह क्षेत्र के आसपास ही रोजगार भी मिल जाए। हमें एक और मिथ को दूर करने की आवश्यकता है कि लघु उद्योग और बड़े उद्योग एक-दूसरे के लिए नुकसानदेह हेैं। वास्तव में हमें लघु उद्योगों को इस प्रकार विकसित करना चाहिए कि वृहद्स्तरीय उद्योग हेतु सहायक सिद्ध हो क्योंकि अर्थव्यवस्था के संतुलित विकास हेतु दोनों आवश्यक हैं। 
सुझाव:- 
0. भारत का 90 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में रोजगार है जो कार्यकुशल बनाकर उनको प्रोत्साहित करे स्टार्ट अप और स्टैण्ड अप की बुनियादी सुविधाओं को सरलीकरण करके विस्तार दिया जाए भारत दुनियां की तीसरी स्टार्ट अप रैंक में है जो पहले पायदान पर होना चाहिए।  
0. युवा आबादी को कार्य कुशल बनाकर सरकारी सेवाओं से बाहर असंगठित क्षेत्र को आकर्षित बनाया जाए। जापान इसका ज्वलंत उदाहरण है। 
0. बैंकिग और लेबर सुधार की अद्यतन योजनाओं को वैश्विक लेखिल पर लायी जाये। 
0. असंगठित क्षेत्र के लिए एक बड़ा फंड रिजर्व रखा जाए जो जोखिम को पूरा कर सके। ताकि परचेसिंग पॉवर बढ़ सके। 
0. शिक्षा को व्यावसायिक बनाने की क्रिया तेज किया जाए और जहाँ आज गैर व्यवसायिक क्षेत्र है उसको भी इस क्षेत्र में लायी जाए। 
0. रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट पर जी0डी0पी0 8 प्रतिशत देने की जरूरत है। 
0. एमएसएमई को प्रोत्साहित करके वास्ट मेटेरियल का चक्रीकरण करने की जरूरत है जो नर्स दी बेबी प्रोटेक्शन दी चाइल्ड एण्ड फ्री एडल्ट में तब्दील करने की आवश्यकता है। टिसको (1907), इसरो, डी0आर0डी0ओ0 जैसे संस्थान जैसे बनाने की जरूरत है। तभी जी0डी0पी0 का 12 प्रतिशत विकास दर प्राप्त कर 5 ट्रिलीयन अर्थव्यवस्था को पार कर जायेगी। 
संदर्भ सूची:- 
1. वार्षिक रिपोर्ट - 2015-16, वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार। 
2. एस0एन0लाल (2015) भारतीय अर्थव्यवस्था, शिवम्    पब्लिकेशन, इलाहाबाद। 
3. द्धह्लह्ल://ड्ढह्वह्यद्बठ्ठद्गह्यह्य2द्बह्म्द्ग.ष्शद्व/ठ्ठद्ग2ह्य/द्धशद्व/
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4. 12वीं योजना की वर्किंग गु्रप रिपोर्ट, वस्त्र मंत्रालय, भारत   सरकार। 
5. भारत 2016, सूचना प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार नई दिल्ली। 
6. वासुदेवशरण अग्रवाल हर्षचरित, एक सांस्कृतिक अध्ययन, पृ0   761
7. वाल्मीकि रामायण 2/4/30
8. डॉ0 रामविलास शर्मा, ऋग्वेद और पश्चिम एशिया। 
9. वाल्मीकि रामायण 1/74/4
10. भारत का सांसकृतिक, सामाजिक और आर्थिक इतिहास, चोपड़ा,     पुरी, दास खण्ड-1, पृ0 23
11. वैदिक इंडेक्स, खण्ड-2, पृ0 291
12. ऋग्वेद 10/130/2
13. भारत का सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास चौपड़ा,   पुरी,दास पृ0 47
14. तदैव पृ0 46