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gazal
March 23, 2020 • चाँदनी समर • Hindi literature/Hindi Kavita Etc.

मुझे इंसाफ दिल दो

 
मैं रास्ते पे खड़ी थी और रात अंधेरी थी।
के खाली था वो रस्ता खामोशी बड़ी थी ।

कोई दीपक न दिखता था कहीं पर एक भी
तभी आए वो चारों, दिखते थे जो ना नेक भी

मैंने माँगी मदद उनसे इसरार करके
उनकी ओर बढ़ी इंसानियत पर ऐतबार कर के

मगर वो तो निकले अंधेरे के दानव कोई
लगे नोचने मुझको, ना था मानव कोई।।

मेरी चीख तब फैली थी हवाओं में
बड़ा दर्द था मेरी सदाओं में।।

बहुत तड़पी बहुत लरज़ी मैं रोई बहुत थी
मगर उनको रहम ना आया, गैरत उनकी सोई बहुत थी

मैं मिन्नतें करती रही के कोई कृष्णा आये
लूट रही आबरू द्रौपती की कोई तो बचाये

मगर भगवान बहरा हो गया था इंसान की तरह
कि शहर मुर्दा पड़ा हो जैसे शमशान की तरह।

मैं चीथड़ों में लिपटी आखरी सांसे गिन रही थी
लगा के मुझसे मेरी ज़िन्दगी छिन रही थीं।।

किसी ने डाला तेल फिर मेरे जिस्म पर ऐसे
लगानी आग हो किसी लकड़ी में जैसे।।

कि अगले पल वही हुआ जिसका अंदेशा था
मेरी मौत का अब आया संदेशा था।।

अब तो मेरीचीख भीनिकल ना पाई
बड़ी बेरहमी से फिर सबने मेरी चिता जलाई

मैं दहकी कोयले सी पड़ी सड़क पर सबसे
के माँग रही रही इंसाफ पूरे वतन से कब से

मिलेगा मुझको कब इंसाफ मुझे इतनाबता दो
या खुद अपने घर में ही अपनी बेटियों की चिता सजा दो।।

चाँदनी समर