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हिंदी दिवस;14 सितम्बरद्ध पर विशेष एक उत्सव से कम नहीं हिन्दी दिवस
August 28, 2020 • डाॅ.विभा खरे 

हिंदी दिवस;14 सितम्बरद्ध पर विशेष
एक उत्सव से कम नहीं हिन्दी दिवस

 मैं वही भाषा हूँ जिसने हिन्दुस्तान को स्वराज दिलाया.... मैं वहीं हिन्दी हूँ जिसने घर-घर में अलख जगाया.... फिर आखिर क्यों मुझे आज वह स्वाभिमान, सम्मान और जहाँ नहीं मिल पाया, अपनी ही मातृभूमि पर.... आखिर क्यों.... क्या सभी शहादतें एक जल बिन्दु की तरह सूख जाएँगी....राष्ट्रपिता का सपना, नेताओं और राजर्षि की वो अमृत वाणी कब साकार होगी.... साल दर साल गुज़र रहे हैं, लेकिन इस प्रश्न का उत्तर हम अभी तक नहीं दे पाए हैं.... आखिर क्यों? सब मौन हैं।
हिन्दी दिवस एक उत्सव से कम नहीं

 हम कब तक हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, हिंदी मास परम्परा का निर्वाह करते रहेंगे....हम हिंदी के नाम पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन करते-करते अपने-अपने चहेतों को आतिथ्य दिलवाकर गर्वोन्मत्त होते रहेंगे..... आखिर कब तक....शायद ही विश्व की किसी भाषा का इस तरह मंचन किया जाता हो...प्रत्येक राष्ट्र की अपनी राष्ट्रभाशा हैं....फिर आखिर क्यों करोड़ों-करोड़ों की जुबान आज भी गुलामी की जिन्दगी जीने को मजबूर हैं.... हम अपनी-अपनी ताजपोशी करने और धर्मध्वजता फहराने में व्यस्त और मस्त हैं....। आजादी अभी अधूरी हैं....!
हिन्दी भाषा राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधती
 राष्ट्रभाषा का प्रश्न मेरे मस्तिष्क में जब-तब उमड़ा-घुमड़ा करता हैं। क्योंकि शहीदों की शहादतें मुझसे ऐसे प्रश्न पूछने आती रहती हैं, मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं होता हैं। मैं मौन बना देखा करता हूँ पूरी व्यवस्था को। वो इसलिए कि मेरी जुबान पर ताला हैं, हाथों में हथकड़ियाँ हैं और पैरों में बेड़ियाँ। मेरे जैसे कितने ही लोगों के साथ ऐसी परिस्थितियाँ सम्भव हैं।
 कुछेक राजकीय प्रतिष्ठानों में राष्ट्रभाषा से सम्बन्धित, राष्ट्र निर्माताओं के कहे वाक्य दीवारों पर टँगे शोभा बढ़़ा रहे हैं- ’’हिन्दी भाषा ही राष्ट्रभाषा, राजभाषा और सम्पर्कभाषा की पूरी अधिकारिणी है’’..... ’’हिन्दी भाषा राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधती हैं’’.... आदि-आदि। आखिर उसे अब तक वो अधिकार क्यों नहीं मिल पाया हैं। क्यों अब तक अमलीजामा नहीं पहनाया गया?
 मुझे अपने जीवन में कटु यथार्थ से रू-ब-रू होना पड़ा हैं, यहाँ इसका जिक्र करना प्रासंगिक होगा।
मातृभाषा से प्रेम आवश्यक
  राष्ट्र निर्माताओं ने आज देश का ढाँचा इस तरह खड़ा कर दिया हैं कि अंग्रेजी के बिना सभी को जीवन अधूरा लगने लगा हैं। चाहे वो हिन्दीभाषी क्षेत्र हों, या तमिल, तेलुगु, कन्नड़, असमी और मराठी आदि वाले। चुँनाचे हर जगह अंग्रेजी का भूत सवार हैं। चपरासी से लेकर अफसर तक, सब ही अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में पढ़ाना चाहते हैं। इसीलिए इन विद्यालयों की बाढ़-सी आ गई हैं। ये कुकुरमुत्ते-से खूब फल-फूल रहे हैं। ऐसे विद्यालयों में बच्चा जो भी पढ़े या न पढ़े, लेकिन संरक्षकों को पूरी तरह सन्तुष्टि रहती हैं कि उनका बच्चा इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ रहा हैं। वह बड़ा होकर निश्चित ही उनका नाम रोशन करेगा। आज इस तरह अंग्रेजी माध्यम के तीन प्रकार की श्रेणी के हो गए हैं - प्रथम वो नामी-गिरामी स्कूल जिनका भार-वहन दस-पन्द्रह प्रतिशत लोग उठाने में सक्षम हैं, दूसरे वे हैं जो नामी-गिरामी स्कूलों की नकल कर रहे हैं, इनका वहन बीस प्रतिशत लोग तथा तीसरे वे विद्यालय हैं जो कुकुरमुत्तों की तरह गली-कूचों में खुल गए हैं, चाहे उनकी मान्यता हिन्दी माध्यम से हो अथवा न हो, लेकिन बोर्ड इंग्लिश मीडियम का लगा रखा हैं। 
कुकुरमुत्ते-से खूब फल-फूल रहे इंग्लिश मीडियम स्कूल
इसी सबके चलते राजकीय प्राइमरी और उच्च प्राइमरी विद्यालयों से बच्चे नदारद हैं, उनके भवन भुतहा लग रहे हैं और शिक्षक वेतन ले रहे हैं। मैं यह ही नहीं समझ पाया कि इन राजकीय विद्यालयों की महत्ता दिन प्रतिदिन गिरती क्यों जा रही हैं। यानी स्थिति यहाँ तक पहुँच गई हैं कि राजकीय प्राइमरी स्कूल के शिक्षक का बच्चा भी इन स्कूलों में पढ़ने को राजी नहीं हैं या शिक्षक ही वहाँ पढ़ाना नहीं चाहते। एक तरफ भवन भुतहा हैं, तो दूसरी तरफ कंकरीट का जंगल बढ़ता जा रहा हैं। जैसे अंग्रेजी के नाम पर नया व्यापार खड़ा किया जा रहा हैं। इस त्रासद स्थिति को मजबूती प्रदान करने वाले कौन हैं, इसकी पहचान के नाम पर सारा समाज मौन हैं।
यह सब है आज का कटु यथार्थ
 यह सब आज का कटु यथार्थ हैं, जिससे हम मुँह मोड़कर भौतिकवाद की अंधी दौड़ में भागने के लिए आतुर हैं। हम हिन्दी भाषा पर बड़े-बड़े व्याख्यान को बड़े-बड़े मंचों से पढ़करी इतिश्री कर लेते हैं, तालियाँ बजवा लेते हैं, या क्लिष्टम आलेख लिखकर नामी-गिरामी पत्र-पत्रिकाओं में छपवा लेते हैं और प्रथम श्रेणी के अमलदार हिन्दी साहित्यकार बुद्धिजीवी कहलवाने में अपना बड़़प्पन महसूस करते हैं। मै कुछ ऐसे वरिष्ठतम ख्यातिप्राप्त हिन्दी साहित्यकारों को जानती हूँ जो सत्ता के बहुत नजदीक रहे, लेकिन निजी हित साधने के माया मोह में उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की पुरजोर वकालत नहीं की, यदि वे हिन्दी की वकालत करते तो निज लाभ पाने से वंचित रह जाते। हाँ, ये एक काम बड़ी मुस्तैदी से करते रहे कि सत्ता से नज़दीकियाँ बढ़ाने के घमासान में आपस में टाँग-खिंचाई करते रहे और अपनी क्रान्तिकारी विचार-धाराओं का पाखण्ड करते रहे। अब तो और ज्यादा बुरा हाल हैं कि हिन्दी भाषा में नई-नई विचारधाराओं को श्रेष्ठतम मानने के ्रव्यामोह में खेमे, गुटबंदियाँ और मठाधीसी बहुत बढ़ गई हैं। हिन्दी राष्ट्रभाषा बने इसकी पुरजोर वकालत कौन करेगा,? हिन्दी के कवि, साहित्यकार, बुद्धिजीवी और जनता मौन....।

 यह सच हैं कि राष्ट्र में हिन्दी भाषा के अलावा उसकी छोटी बहनें तमिल, तेलुगु, बंगला, मलयाली और पंजाबी आदि कई एक भाषाएं हैं, जिनका विस्तार और सम्पर्क एक सीमित क्षेत्र में ही हैं, जबकि हिन्दी भाषा का विस्तार और सम्पर्क देश की सीमाओं के बाहर भी हैं। पूरे विश्व पटल पर बोलने और समझने वालों की संख्या दूसरे नम्बर पर हैं, चुँनाचे इसे वह मान-सम्मान और जहाँन मिलना ही चाहिए, जिसकी ये पूरी तरह अधिकारिणी हैं।

राष्ट्रभाषा का दर्जा कैसे मिले हिन्दी भाषा को
1. हिन्दी के लेखकों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और प्रेमियों को एक मंच पर आना होगा अपने-अपने दुराव छोड़कर। मजबूत संगठन बनाकर अपनी बात भी मजबूती से केन्द्र की सत्ता के सम्मुख रखनी होगी। सब तरह की गुट खेमेबंदी और मठाधीसी पूरी तरह ध्वस्त कर दी जाए।
2. एकता में शक्ति हैं। चुँनाचे जब तक हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल जाता, तब तक वह स्थापित संगठन अपनी बात मजबूती से रखता रहे।
3. उच्च शिक्षा में सम्बन्धित विषयों का हिन्दी में सरल भाषा में अनुवाद हो, उसके साॅफ्टवेयर बनें, कम्प्यूटर, मोबाइल, लैपटाॅप या अन्य आधुनिक तकनीकी ज्ञान हिन्दी में हो। उसके लिए आवश्यक संसाधन अपनाए जाएँ। उच्च शिक्षा हिन्दी माध्यम से सुलभ कराई जाए।
4. उच्च प्रशासनिक, न्यायिक और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में से कुछ हिन्दी में देने के लिए विकल्पित हैं, लेकिन चयन वाली टीम आज भी उन्हें दोयम दर्जे का मानती हैं। इसलिए हिन्दी माध्यम से प्रतियोगी परीक्षाएँ देने वाले परीक्षार्थी न के बराबर ही चयनित होते हैं, यदि उनमें से कुछ लिखित परीक्षा मे ंउत्तीर्ण हो भी गए तो साक्षात्कार में अच्छी अंग्रेजी का होना बहुत जरूरी हैं। इसी कारण अधिकतर परीक्षार्थी अंग्रेजी को ही देवी मानकर इसी के माध्यम से परीक्षा देने को मजबूर होते हैं। इस दिशा में गंभीर मंथन जरूरी हैं।
5. केन्द्र की सत्ता का मूलमंत्र हिन्दी-भाषी क्षेत्रों पर हैं, अतः वहाँ के नागरिकों के लिए भी जागरूक होना बहुत आवश्यक हैं। जब कोई कठोर संकल्प होता हैं तभी अपनी बात को मनवाया जा सकता हैं।
6. उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय व अन्य न्यायालयों में हिन्दी भाषा में अपनी बात रखनें का अधिकार दिया जाए। जब हिन्दी को वहाँ दोयम दर्जे का भी स्थान नहीं हैं, तो कौन चाहेगा कि वह हिन्दी माध्यम से पढ़कर विधि स्नातक की डिग्री ले। आज भी सब कुछ अंग्रेजों की परम्परा के हिसाब से चल रहा हैं सारे कानून अधिकांशतः वही के वही।
7. प्राइमरी, उच्च प्राइमरी और उच्चतर माध्यमिक हिन्दी माध्यम के राजकीय और गैर-राजकीय विद्यालयों में पढ़ाई का स्तर सुधारा जाए। अंग्रेजी की शिक्षा भी वहाँ दी जाए, वैसे वहाँ दी भी जाती हैं, लेकिन और सुधार करा जाए, जिससे लोग अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की ओर न भागें। किसी भी भाषा का ज्ञान बुरा नही हैं। अन्य प्रान्तों की भाषाएं भी सिखाई जा सकती हैं, वहाँ का साहित्य पढ़ाया जा सकता हैं।


डाॅ.विभा खरे 
जी-9, सूर्यपुरम्, नन्दनपुरा, झाँसी-284003