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हिन्दी ग़ज़ल :शिल्प और संवेदना
January 28, 2020 • डॉ.रहमान मुसव्विर • Research article

डॉ.रहमान मुसव्विर
हिंदी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली-25

जब भी हिन्दी ग़ज़ल पर चर्चा होती है तो एक स्वाभाविक प्रश्न से सामना होता है कि क्या हिन्दी ग़ज़ल जैसी कोई चीज है या ग़ज़ल केवल ग़ज़ल है । इस विषय में ग़ज़ल के चाहने वालों में ही स्पष्ट रूप से दो ख़ेमे दिखाई देते हैं।  एक का मानना है कि ग़ज़ल केवल ग़ज़ल होती है । इसे हिन्दी उर्दू के दायरे में बाँधना उचित नहीं है । जबकि दूसरे ‘हिन्दी ग़ज़ल’ कहे जाने के पक्षधर हैं । इस बहस से पूर्व हिन्दी उर्दू भाषा के स्वरूप पर दृष्टिपात करना उचित रहेगा ।

एक भाषा दूसरी भाषा से व्याकरण के आधार पर भिन्न होती है । किसी भाषा का शब्द भंडार भी उसे दूसरी भाषा से अलग करता है । क्योंकि शब्द केवल ध्वनियों का समुच्च्य नहीं है बल्कि एक विशिष्ट संस्कृति और अवधारणा का वाहक भी होता है । व्याकरण की दृष्टि से हिन्दी और उर्दू  में कोई भेद नहीं है । मोटे तौर पर इन दोनों को दो बिंदुओं के आधार पर अलग किया जा सकता है । एक तो लिपि, दूसरे शब्दों का आयात । संस्कृतनिष्ठ और देशज शब्दों के बहुतायत वाली भाषा जो नागरी लिपि में लिखी जाए हिन्दी कहलाती है जबकि अरबी-फारसी शब्दों की अधिकता वाली भाषा जो अरबी लिपि   में लिखी जाए, उर्दू के नाम से जानी जाती है । (प्रायः उर्दू की लिपि को फ़ारसी लिपि कहा जाता है परंतु वह मूलतः अरबी लिपि है जिसमें भारतीय ध्वनियों के अनुसार कुछ परिवर्तन कर लिए गए हैं) यह एक सर्वमान्य सत्य है कि बहुत सारी समानताएं होते हुए भी हिन्दी और उर्दू दो भाषाओं के रूप में मान्यता प्राप्त हैं । इन दोनों भाषाओं की अपनी अपनी समृद्ध साहित्यिक परंपराएं हैं । अतः दोनों भाषाओं के मिले जुले रूप को अब हिन्दुस्तानी भाषा कहना भी उचित नहीं है । भाषा की मान्यता न केवल उसके बोलने वालों से बल्कि उसमें रचे गए साहित्य के आधार पर होती है । ‘हिन्दुस्तानी’ में कोई भी साहित्य अभी तक नहीं रचा गया है । गाँधी जी ने जिस ‘हिन्दुस्तानी’ की परिकल्पना की थी वह मात्र परिकल्पना ही रह गई । इसके क्या कारण रहे यह अलग बहस और शोध का विषय है । तो यह स्पष्ट है कि हिन्दी और उर्दू दो अलग अलग भाषाओं के रूप में स्वीकृत और स्थापित हैं । किन्तु दोनों के संबंध में यह भी रोचक तथ्य है कि दोनों भाषाओं के बीच आवाजाही के लिए कुछ सुरंगें भी हैं और पुल भी । इस आवाजाही से दोनों भाषाएं अपने अपने स्वरूप में समृद्ध तो होती रही हैं लेकिन एक हो जाना बहुत दूर की कौड़ी है । इसलिए इन दोनों भाषाओं में लिखी जा रही ग़ज़ल को एक ही मानने का क्या औचित्य है ? दोनों भाषाओं के स्वतंत्र अस्तित्व के आधार पर ‘हिन्दी ग़ज़ल’ का प्रयोग सर्वथा उपयुक्त है । उर्दू में भी ‘उर्दू ग़ज़ल’ शब्द प्रचलित है।
हिन्दी ग़ज़ल को उर्दू ग़ज़ल से अलग रखकर देखने के कई वाजिब कारण हो सकते हैं । उर्दू ग़ज़ल की परंपरा कई सौ साल पुरानी है । फारसी ग़ज़ल की भूमि में उसकी जड़ें अवश्य हैं लेकिन उसका विशाल वृक्ष अपने आप में हिन्दुस्तानी तहज़ीब को अंगीकार किए हुए है । दूसरी ओर हिन्दी ग़ज़ल की यात्रा मात्र पचास साल पुरानी है । प्रायः हिन्दी ग़ज़ल के उद्भव के सूत्र ढ़ूंढ़ते हुए अमीर खुसरो और कबीर तक से नाता जोड़ने की कोशिश की जाती है । किंतु सत्यता यही है कि हिन्दी ग़ज़ल अपेक्षाकृत नई विधा है । अतः हिन्दी ग़ज़ल का मुकाबला उर्दू से करना या उसके साथ रखना न तो तर्क संगत है न न्याय संगत ।
ग़ज़ल वस्तुतः अपने शिल्प और अनुशासन के वैशिष्ट्य के आधार पर ही ग़ज़ल है । हिन्दी ग़ज़ल ने यह शिल्प और अनुशासन उर्दू ग़ज़ल से लिया है । लेकिन संवेदना और अनुभव के स्तर पर हिन्दी ग़ज़ल उर्दू ग़ज़ल से पर्याप्त भिन्न है । इधर हिन्दी में ग़ज़ल लिखने वाले कुछ ग़ज़लकार उर्दू ग़ज़ल की शब्दावली, समास और रूढ़ियों का प्रयोग कर रहे हैं । (हालांकि नई उर्दू ग़ज़ल स्वयं इनसे काफ़ी हद तक मुक्त हो चुकी है ) उनके तेवर भी उर्दू वाले ही हैं । यहाँ संकट यह है कि उन्हें हिन्दी ग़ज़लकार कहें या उर्दू ग़ज़लकार । एक हिन्दी ग़ज़लकार मित्र ने एक चर्चा के दौरान कहा कि हम उसे हिन्दी ग़ज़ल मानते हैं जो नागरी लिपि में लिखी गई हो । तो क्या इस आधार पर मलिक मुहम्मद जायसी कृत ‘पद्मामत’ को अवधी काव्य न मानकर उर्दू काव्य माना जाए क्योंकि इसकी मूल प्रति उर्दू ( यानी अरबी लिपि) में है ।
विख्यात आलोचक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी अपनी पुस्तक ‘उर्दू ग़ज़ल के एहम मोड़’ में लिखते हैं कि  “क्लासिकी उर्दू ग़ज़ल की शे‘रयात जिन तसव्वुरात (अवधारणाओं) पर क़ायम हैं उन्हें मोटे तौर पर दो अन्वाअ (प्रकार) में तक़सीम किया जा सकता है । एक वो जिनकी नोइयत (प्रकार) इल्मियाती (ज्ञान संबंधी) है । यानी वो तसव्वुरात इस सवाल पर मब्नी हैं कि शे‘र से हमें क्या हासिल होता है । दूसरी नोअ (प्रकार) के तसव्वुरात वो हैं जिनका तआल्लुक़ इस सवाल से है कि शे’र का वजूद किन चीजों पर मुन्हसिर (निर्भर) है ।1 अर्थात शे’र की बाहरी संरचना के तत्व कौन कौन से हैं ।   फ़ारूक़ी साहब आगे चलकर ग़ज़ल के इन दो प्रमुख आधारों की विवेचना करते हुए इनके तत्वों के विषय में विस्तार से लिखते हैं । संरचनात्मक्ता के विषय में उन्होंने सार्थक शब्द, वज़्न और बहर, क़ाफ़िया और रब्त का उल्लेख किया है । अतःग़ज़ल में प्रयुक्त शब्द अपनी संपूर्ण अर्थवत्ता के साथ उपस्थित होने चाहिए । बहर ग़ज़ल की पहली शर्त है । रदीफ़ और क़ाफ़िए का निर्वाह ग़ज़ल को ग़ज़ल बनाता है । इस संबंध में अंतिम बात है रब्त या पूर्वापर संबंध । ग़ज़ल के दोनों मिसरों में कही गई बात या विचार परस्पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संबद्ध होने चाहिए । एक में कोई ख़याल हो तो दूसरे में उसकी दलील । ज्ञानात्मकता संबंधी अवधारणा के विषय में स्पष्ट करते हुए उन्होंने कथ्य की उत्कृष्टता, अर्थवत्ता, विचार गांभीर्य, प्रभावशीलता और गहनता को आवश्यक माना है । यह चर्चा उन्होंने उर्दू ग़ज़ल के संबंध में की है। हिन्दी ग़ज़ल पर विचार करते हुए उपरोक्त तत्वों को ध्यान में रखना आवश्यक है  क्योंकि ग़ज़ल उर्दू में लिखी (कही) जाए या हिन्दी में, उसका ‘ग़ज़ल’ होना पहली शर्त है । ग़ज़ल को ग़ज़ल बनाए रखने के लिए उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखना अनिवार्य होगा । ग़ज़ल-आलोचना की दृष्टि से मुख्यतः दो बातों पर ध्यान देना होगा। पहली; शे’र की बाहरी बनावट और बुनावट यानी शिल्प, तथा दूसरी; शे’र की विषय वस्तु या कथ्य।
हिन्दी ग़ज़ल के शिल्प के संबंध में अभी यह असमंजस बरकरार है कि बहर में मात्राओं की गणना का आधार क्या होना चाहिए । क्या उर्दू की भाँति आवश्यकतानुसार दीर्घ को ह््रस्व करके पढ़ा जाए या दीर्घ को दीर्घ ही रखा जाए । अनेक हिन्दी ग़ज़लकार दीर्घ को दीर्घ ही लिखने और पढ़ने के पक्षधर हैं तथा इसके निर्वाह का प्रयास भी कर रहे हैं । लेकिन अधिकांश हिन्दी ग़ज़लकार जहाँ जैसी ज़रूरत हो वहाँ वैसा कर लेते हैं । वस्तुतः यह ग़ज़ल के शिल्प और अनुशासन की मजबूरी है । ज़्यातर हिन्दी ग़ज़ल उर्दू ग़ज़ल की बहर और गणना पद्धति को ही अपनाकर चल रही है-
मेरी तो पोल पट्टी खोलता फिरता है तू जग में
बता ऐ वक़्त तूने मुझसे कितना धन कमाया है2

जिसके सम्मोहन में पागल धरती है आकाशभी है
एक पहेली सी दुनिया में गल्प भी है, इतिहास भी है3

इन शे’रों में मेरी के स्थान पर ‘मरी/मिरी’, मुझसे के स्थान पर ‘मुस्से’ और भी के स्थान पर ‘भि’ पढ़ने पर ही शे’र बहर में रहेगा अन्यथा बहर से ख़ारिज हो जाएगा।
हिन्दी ग़ज़ल की भाषा पर भी विचार करना परमावश्यक है ।भाषा केवल विचारों का वाहक मात्र नहीं होती है अपितु स्वयं भी एक विचार होती है । ग़ज़ल के संदर्भ में तो यह और भी महत्वपूर्ण है । कई बार केवल भाषा का खेल ही शे’र को ऊँचाई प्रदान कर देता है । डा. अनीसुन्निसा बेगम लिखती हैं कि “ग़ज़ल की ज़बान का भी ग़ज़ल के फ़न के साथ गहरा तआल्लुक होता है । ग़ज़ल की ज़बान में नर्मी, मिठास, सादगी और बेतकल्लुफ़ी का होना ज़रूरी है ।”4हिन्दी ग़ज़ल की भाषा की विवेचना करते हुए ही यह निश्चित हो जाता है कि हिन्दी ग़ज़ल क्या है । इसके लिए सावधानीपूर्वक अवलोकन आवश्यक है । हिन्दी ग़ज़ल मेंकिस भाषा के शब्द अधिक प्रयुक्त हुए है यह देखना भी रोचक हो सकता है । कभी कभी लिपि धोखा दे जाती है, भ्रम में डाल देती है । नागरी लिपि में लिखे हुए असंख्य शे’र मिल जाएंगे जो कहीं से भी हिन्दी ग़ज़ल के शे’र प्रतीत नहीं होते हैं-
एशियाई  हुस्न  की  तस्वीर  है   मेरी ग़ज़ल
मशरिक़ी  फ़न  में  नई तामीर है  मेरी ग़ज़ल
दिल लिए शीशे का देखो संग  से टकरा गई
बर्गे-गुल की शक्ल में शमशीर है मेरी ग़ज़ल5

ख़्वाब में मेरे न जाने क्या  फ़ुसूँ चलता  रहा
इक अजब सा शोर था मैं रातभर डरता रहा
तेरी  बातें  तेरे  क़िस्से,  और  तेरी   गुफ़्तगू
बज़्म में कल तू नहीं था पर तेरा  चर्चा रहा 6

उपर्युक्त शे’रों को पढ़ते समय तनिक भी यह एहसास नहीं होता है कि ये हिन्दी ग़ज़ल के शे’र हैं, भले ही ये नागरीलिपि में बद्ध हैं । मशरिक़ी फ़न, तामीर, संग, बर्गे-गुल, फुसूँ, बज़्म शब्द किसी दृष्टि से भी हिन्दी या हिन्दी की प्रकृति के नहीं हैं । बर्गे-गुल तो ख़ालिस फ़ारस़ी की तरकीब है । ‘चर्चा’ शब्द के विषय में तो सर्वविदित है कि यह उर्दू में पुल्लिंग और हिन्दी में स्त्रीलिंग है । प्रस्तुत शे’र में यह पुल्लिंग प्रयुक्त हुआ है । अतः इस शे’र को हिन्दी ग़ज़ल का शे’र कैसे कहा जाए ! हिन्दी ग़ज़ल में यह शब्द स्त्रीलिंग रूप में बहुत सुंदरता से प्रयुक्त हुआ है -
आग की चर्चा न हो अंगार की चर्चा न हो
और जहरीली नदी से प्यार की चर्चा  न हो 7

यह शे’र अपनी संपूर्णता के साथ हिन्दी ग़ज़ल का शे’र सिद्ध होता है । तात्पर्य यह है कि हिन्दी ग़ज़लकारों को उर्दू शब्दों के अनावश्यक मोह से बचना चाहिए । केवल नागरी लिपि में लिखे जाने से ही कोई ग़ज़ल हिन्दी ग़ज़ल नहीं मान ली जानी चाहिए । हिन्दी शब्दों का सहज प्रयोग और उसका अपना भाषायी संस्कार उसे हिन्दी ग़ज़ल बनाएगा । हिन्दी भाषा स्वयं इतनी आकर्षक, संप्रेषणीय और ‘खूबसूरत’ है कि अगर ग़ज़लकार की पकड़ उस पर है तो वह कमाल कर सकता है । कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं-
मुक्ति कामी  चेतना,  अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की8

दिलों  में  घाव  माथे  पर तिलक है 
वही जो कल तलक था आज तक है
अलंकृत दर्द  हैं  इस  जिंदगी  के 
कोईहै  श्लेष  तो  कोई  यमक  है9

बाहें  मिली  न नींद मिली, दर्द ही मिला
परिहास की तरह कभी उपहास की तरह10

कुछ दिनों से व्यक्त होने को  विकल थी वेदना
पीर को कल आसुँओं का रास्ता मिल ही गया 11

भाषा विचार का यह एक स्तर है। दूसरे स्तर पर भाषा अपने व्यापक स्वरूप का साक्षात्कार कराती है। ग़ज़ल की भाषा मुहावरों, प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से अर्थों के विस्तृत संसार को उद्घाटित करती है। शब्दमैत्री, पदबंधों की कसावट और प्रवाहमयता ग़ज़ल की भाषा को विशिष्ट बनाते हैं। हिन्दी ग़ज़ल का शिल्प उर्दू ग़ज़ल से अवश्य लिया गया है लेकिन भाषा का कलेवर उसका अपना है । उसमें एक ठसक है और खरापन है । उसमें माधुर्य भी है और प्रसाद भी। हिन्दी कविता की सुदीर्घ परंपरा से विकसित और पल्लवित भाषा ही हिन्दी ग़ज़ल की भाषा है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि उर्दू भाषा ( अरबी, फारसी, तुर्की आदि ) के शब्दों से परहेज़ किया जाए । आशय यह है कि अनावश्यक ठूसम ठांसी से बचा जाए । फ़ारसी इज़ाफ़त से बचते हुए हिन्दी सामासिक शब्दावली का प्रयोग हिन्दी ग़ज़ल की गरिमा में वृद्धि करेगा । हिन्दी ग़ज़लकार इस ओर पर्याप्त ध्यान दे रहे हैं । सुरेंद्र सिंघल, रामकुमार‘कृषक‘, बल्ली सिंह चीमा, कृष्ण शलभ, ज़हीर कुरेशी और विज्ञान व्रत ने इस ओर सावधानी बरती है।
ग़ज़ल के संदर्भ में भाषा पर मंथन करते समय शब्द चयन, भाव और विचार के साथ उसकी अन्विति तथा शब्द स्थिति स्वयं ही चर्चा के केन्द्र में आ जाते हैं । ग़ज़ल एक ऐसी काव्य विधा है जो एक भी अतिरिक्त शब्द का बोझ सहन नहीं कर पाती है । यदि उसके साथ ज़बरदस्ती की भी जाती है तो ग़ज़ल का शे’र लड़खड़ाने लगता है । न एक शब्द कम, न एक शब्द ज़्यादा । कौन सा शब्द कहाँ और किस शब्द के साथ आना है, यह भी महत्वपूर्ण है । हर शब्द अपने स्थान पर नगीने की तरह जड़ा होना चाहिए। शब्द जरा सा इधर उधर हुआ तो सारा सौंदर्य भरभरा कर गिर पड़ेगा। हिन्दी ग़ज़लकारों ने शब्द की इस मांग को पूरा करने का भरसक प्रयास किया है । लेकिन हिन्दी ग़ज़लों में शब्द चयन और उसकी स्थिति को लेकर प्रायः एक ढीलापन दिखाई देता है । भर्ती के शब्द भी एक समस्या है। ये ग़ज़ल की प्रभावोत्पादकता को न्यून करते हैं-
आकाश चुराऊँ तो चुराने नहीं देता
वो शख़्स पतंगों को उड़ाने नहीं देता12

उमीदों काये बादल दे रहा हूँ
तेरी आँखों को काजल दे रहा हूँ 13
तूफ़ान होंतो उनको भी कुछ आजमाइये
लेकिन किसी के सामने मत सर झुकाइये14

पहले शे’र में ‘को’ शब्द का चयन ठीक नहीं है । यह मिसरा किंचित परिवर्तन के साथ “वो शख़्स पतंगें ही उड़ाने नहीं देता” हो सकता था । दूसरे शे’र में ‘ये’ शब्द अतिरिक्त है । ग़ज़लकार कहना चाहता है कि मैं तुझे उम्मीदों का बादल दे रहा हूँ । एक अच्छा रूपक बनाने के प्रयास की प्रशंसा की जानी चाहिए लेकिन बहर की मजबूरी है कि ‘ये’ के वज़्न का शब्द दरकार है । परतु ‘ये’ का औचित्य नहीं बन रहा है क्योंकि जिसके लिए ‘ये’ है, वह है क्या ?  “मैं उम्मीदों का बादल दे रहा हूँ” कर लेते तो संभवतः यह दोष दूर हो जाता ।  तीसरे शे’र के दूसरे मिसरे में ‘मत’ और ‘सर’ शब्दों के परस्पर स्थान बदल देने से शे’र में प्रवाह और सहजता आ जाती । यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि हिन्दी में ‘सर’ का अर्थ तालाब (मंजन करि सर सखिन समेता : रामचरित मानस) और तीर/बाण (तब रघुपतिनिज सर संधाना : रामचरित मानस) होते हैं।15 हिन्दी ग़ज़ल में ‘सिर’ शब्द का प्रयोग अधिक उपयुक्त रहता। 
सांकेतिकता ग़ज़ल की विशिष्टता है। प्रतीकों का प्रयोग और नवीन बिंबों का सृजन हिन्दी ग़ज़लको अलग पहचान दे रहेहैं।प्रतीक ग़ज़ल के प्राण हैं। ग़ज़ल की विशेषता ही है कि उसमें कम से कम शब्दों का प्रयोग करके अधिकाधिक प्रभावशाली कथ्य  प्रस्तुत किया जाता है। यानी शब्दों की मितव्ययता ग़ज़ल की विशेषता है। प्रतीक यही कार्य करते हैं। प्रतीक में अर्थों की कई सतहें समाहित रहती हैं। प्रतीकों में संष्लिश्ट निहितार्थ सांस्कृतिक मूल्यों से निर्धारित होते हैं। ये मूल्य परंपरा से भी हो सकते हैं और आधुनिक बोध से भी। हिन्दी ग़ज़लकार अपने प्रतीक मिथकीय संदर्भों से भी चुन रहा है और दैनिक जीवन की विद्रूपताओं के जंगल से भी। कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं
लव-कुश का राम अंधा, सीता का राम पागल
दशरथ का राम भावुक किसकी समझ में आया 16

राधा भी उसकी चाह में पगलाई सी रही
मीरा भी बावली सी थी उसकी तलाश में 17

जिनके आकाश पेड़ से नीचे
उनके डैनों में बल नहीं होगा18

सभी  की  एक  दूजे  से ठनी है
सभी के पास कोई छावनी है
ये जो इक कील है जूते के अंदर
मेरे पाँव की अब इससे ठनी है19

ग़ज़ल की प्रभावशीलता का आवश्यक तत्व बिंब भी है।बिंब कविता को उत्कृष्ट और जीवंत बनाता है।  बिंब एक प्रकार का भाव चित्र होता है। भाव में चित्रात्मकता बिंब विधान द्वारा ही संभव है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि चित्र चाहे कितना भी सुन्दर क्यों न हो यदि वह समुचित और वांछित भाव संप्रेषित नहीं कर पा रहा है तो वह असफल ही माना जाएगा। बिंब निर्माण कवि की मानसिक संरचना और उसके रचनात्मक परिवेश पर भी निर्भर करता है। हिन्दी ग़ज़ल का बिंब विधान हिन्दी कविता के बिंब विधान का ही अनुसरण करता प्रतीत होता है-

दुर्दिन  बिना बुलाए आते, घर आँगन देहरी द्वारों पर
आँखों में किरकिरी सरीखे खटक रहे हैं जाने कब से20

फूल को देखा झुलसते धूप में जब ‘अश्वघोष’
तितलियों ने फूल पर पंखों की चादर तान ली 21

ग़ज़ल के शिल्प की चर्चा करते समय रब्त की ओर भी ध्यान जाता है। सुंदर शब्द चयन, बहर का निर्वाह और भावों की उत्कृष्टता के बावजूद यदि शे’र के मिसरों में रब्त अर्थात पूर्वापर संबंध नहीं है तो शे’र बे-मानी हो जाएगा। दोनों मिसरों में कुछ न कुछ संबंध अवश्य बनना चाहिए। निम्नलिखित शे’र रब्त के निर्वाह के अच्छे उदाहरण हैं-
उड़ा देती  हैं  छप्पर  जानता हूँ 
हवाओं को मैं बेहतर जानता हूँ 22

यूँ  तेरे  मेरे  बीच  कोई  दूरी तो नहीं ज़्यादा लेकिन
मैं प्यार की बातें करता हूँ,तू ज्ञान की बातें करता है 23

जब भी आकाश हो गया बहरा
ख़ुद में ख़ुद को पुकार कर देखा 24 

उपर्युक्त पहले शे’र में छप्पर और हवा का पारस्परिक संबंध बन रहा है । दूसरे शे’र में रब्त को बहुत कलात्मकता के साथ निबाहा गया है । दोनों लोगों के बीच एक दूरी है भी और नहीं भी । इस बात का संकेत दूसरे मिसरे में दे दिया गया है । “जब भी आकाश हो गया बहरा /ख़ुद में ख़ुद को पुकार कर देखा” शे’र में ‘बहरा होना’ और ‘खुद में पुकारना’ के मध्य जो रब्त कायम किया गया है वह प्रशंसनीय है । कलात्मक दृष्टि से यह एक बेहतरीन शे’र माना जाएगा ।  लेकिन हिन्दी की बहुत सी ग़ज़लों में इस रब्त का अभाव है। इसलिए बात बनते बनते रह जाती है-
जरा सा  मुस्कुराया और समूचा थरथराया है
वो अपनी सारी यादें मेरे भीतर छोड़ आया है 25

घेर कर आकाश उनको पर दिए होंगे 
राहतों पर दस्तखत यों कर दिए होंगे 26

पहले शे’र का दूसरा मिसरा ग़ौर करने लायक़ है । ‘वो अपनी सारी यादें मेरे भीतर छोड़ आया है’ में अगर उसने यादें मेरे भीतर छोड़ी हैं तो वह गया है या आया है ! अगर कोई अपनी यादें मेरे भीतर छोड़ रहा है तो वह जाएगा, न कि आएगा। अगर आया है तो यादें कहीं और छोड़ी होंगी। इस मिसरे में शब्द चयन और शाइर के आशय के बीच कोई रब्त नहीं बन पा रहा है। अतः शे’र में ऐब पैदा हो गया है। दूसरे शे’र का पहला मिसरा बहुत सुगठित और संभावनाओं से भरा हुआ है। आकाश को घेर कर ‘पर‘ बना देने की कल्पना बहुत उत्कृष्ट और उदात्त है। किन्तु दूसरा मिसरा ‘राहतों पर दस्तख़त यों कर दिए होंगे’ का आशय समझ से बाहर है। कौन सी राहतों पर दस्तख़त किए होंगे ? राहतों पर दस्तख़त होते हैं क्या? होते हैं तो उसका सुबूत क्या है? ‘यों’ शब्द का भी क्या औचित्य है? सबसे मुख्य बात यह कि दोनों मिसरों में दूर तक कुछ भी परस्पर संबंध दिखाई नहीं देता।
ग़ज़ल की एक विशेषता इब्हाम भी है। शे’र में बात को इस ढ़ंग से कहना कि  सीधे सीधे स्पष्ट न हो या अर्थों की अनेक छवियाँ का उद्भूत होना इब्हाम कहलाता है। ग़ालिब के शे’र “नक़्श फ़र्यादी है किसकी शोख़ि-ए-तहरीर का/काग़ज़ी है पैरहन हर पैकरे-तस्वीर का” से इसे समझा जा सकता है। इस शे’र से इतने अर्थों का बोध होता है कि निश्चित तौर पर कह पाना कठिन है कि वास्तव में शाइर का मंतव्य क्या है । शाइर इब्हाम की ओर तब बढ़ता है जब वह खुद भी असमंजस में होता है। बहुत कुछ उसकी कल्पना और विचार प्रक्रिया में उमड़ घुमड़ रहा है। वह स्वयं नहीं समझ पा रहा कि उसके भीतर क्या है। कई रंगों और चित्रों का एक कोलाज़ सा बन रहा है। हिन्दी ग़ज़लों में भी यह अस्पष्टता दिखाई देती है । एक शे’र में अर्थों की कई परतें खुलती जाती हैं-
कोई  बोला कोई है 
मैं ये समझा कोई है 27

ऐसे  जिया  अगर  तो, क्या  खाक  फिर  जिया  मैं
सोचा थाक्या, जिया क्या, ये क्या से क्या हुआ मैं 28

रात का वक़्त है और पैदल हूँ मैं, एक सुनसान रस्ता है क़दमों तले
एक भुतहा हवेली है जिसकी तरफ़ जा रहा हूँ मैं, कोई मुझे रोक ले29

ग़ज़ल का शाब्दिक अर्थ स्त्रियों से बातें करना है। सर्वविदित है कि आरंभ में ग़ज़ल  इश्क और हुस्न के दायरे में बंधी थी। समय के साथ इसका स्वरूप परिवर्तित होता गया। आज ग़ज़ल अपने समय के साथ आँखें दो चार कर रही है।लेकिन यह भी सत्य है कि उसने तग़ज़्ज़ुल का दामन अब भी नहीं छोड़ा है। “तग़ज़्ज़ुल को समुचित शब्द देना संभव नहीं है। एहसास की शिद्दत, दर्दमंदी, सोज़ो-गुदाज़, ख़लिश और कसक, एहसासे-जमाल, जज़्बाए-इश्क, लोच और घुलावट, नग़्मगी, हृदयस्पर्शी कैफ़ीयत, सौंदर्यात्मक रचाव” यह सब तग़ज़्ज़ुल है।30 हिन्दी ग़ज़ल का तग़ज़्ज़ुल उर्दू ग़ज़ल से तनिक भिन्न है। हिन्दी ग़ज़ल के तग़ज़्ज़ुल में हिन्दी कविता का सौंदर्य और ठेठपन उपस्थित है-
आँखों से उंगलियों की जिन्हें देखते थे हम
कपड़े पहन लिए तो उन्हें आ रही है लाज31

अजीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वोमेरी मेज पे  अपनी  किताब  छोड़ गया 32

धूप  आँगन में आ गई होगी
अब वो गेसू सुखा रही होगी 33

जब भी झरने में नहाती है पहाड़ी लड़की
सोये जंगल को जगाती है पहाड़ी लड़की 34

हिन्दी ग़ज़ल अपने समय से साक्षात्कार करती है। समाज में दिन प्रति दिन जो कुछ घटित हो रहा है उस पर हिन्दी ग़ज़लकारों की सूक्ष्म दृष्टि है। वे उन परिवर्तनों को भी देख लेते हैं जो सामान्यजन की नज़रों से ओझल रहता है। उन्होंने बदलते हुए समाज की छवियों और विसंगतियों को अपनी ग़ज़लों का कथ्य बनाया है-
बरगद की छाँव और ये करुणा के शिलालेख
कटकर खड़ा अतीत से अपना नया समाज35

खेतों सेकुछ दाने लेकर घर को दीना निकलेगा
लेकिन  बेचारे  का पहले खून पसीना निकलेगा 
तनखा तो  पूरी  की  पूरी सूद बही ने कब्जा ली
सोच  रहा हूँ  कैसे  पूरा  एक महीना  निकलेगा 36

जब से महानगर में आया,आकर ऐसा उलझा मैं
भूल गया हूँ घर ही अपना,घर की ज़िम्मेदारी में 37

घर के अंदर शोर था, हाँ इसलिए
साब जी दफ्तर में आकर सो गए 38

मनुष्य केवल सामाजिक ही नहीं राजनैतिक प्राणी भी है। जहाँ मनुष्य है, वहाँ राजनीति है। कोई रचनाकार, यदि वह वास्तव में सच्चा रचनाकार है, राजनीति से निरपेक्ष नहीं रह सकता है। साहित्य, समाज और राजनीति का बहुत गहरा संबंध है। साहित्य समाज और राजनीति का प्रतिबिंबन ही नहीं करता बल्कि उससे प्रश्न करने का साहस भी करता है। हिन्दी ग़ज़ल अपने बाह्य जगत से साक्षात्कार करती है। अतः वह राजनीति और उसकी विद्रूप चालों से उत्पन्न स्थितियों का चित्रांकन बड़ी कुशलता से करती है-
लोग जिंदा जल गए जिनकी लगाई आग में
वो बताते हैंहमेंअच्छा बुरा क्या चीज है39

मुफ़लिसों की हाथ ठेली और चक्का जाम है
आज भी ऐ करफ़्यू, ये दिन  तुम्हारे  नाम है 40

नापने थे यूँ तो सप्ताकाश उड़कर ही हमें
बाज़ की नज़रों में आए और फिर बेपर हुए 41

हमारा समय और समाज विचित्र विरोधाभासों की संधियों पर खड़ा है। अतीत, वर्तमान और भविष्य में कोई तर्क संगत संबंध शेष नहीं बचा है, लघुमानव महानगरीय कुंठाओं के संजाल में घिरा है, विसंगतियाँ और विड़म्बनाएं मनुष्य के आगे मुंह बाए खड़ी हैं।लेकिन तमाम तरह की निराशा और हताशा के बीच भी हिन्दी ग़ज़ल ने आशा का दामन नहीं छोड़ा है-
जिस सदी में लोग मिलते हों मशीनों की तरह
कोई मुझको भावनाओं की तरह मिल ही गया 42

कहीं  से  बीज  इमली के, कहीं  से पर उठा लाई
ये बच्ची है बहुत खुश, एक दुनिया घर उठा लाई43

कटे हैं पंख तो भीतर उड़ान जिं़दा है
मेरी ज़मीन मेराआसमान ज़िंदा है 44

हिन्दी ग़ज़ल अपनी प्रयोगधर्मिता के कारण अन्य काव्य विधाओं में दूर से पहचानी जाती है। ये प्रयोग भाषा, शब्द चयन, शिल्प, बिंब निर्माण तथा प्रतीक से लेकर कथ्य की नवीनता तक में दृष्टिगोचर होते हैं। छोटी बहर हिन्दी ग़ज़लकारों द्वारा विशेष रूप से अपनाई गई है। अधिकांश ग़ज़लकारों ने छोटी बहर में अपने हुनर दिखाए है । कुछ उदाहरण लिए जा सकते हैं-
मैं  सूरज  सा  जलता हूँ
पर क्या रौशन लगता हूँ 45

उसका चेहराअपना था
एक   बड़ी  दुर्घटना  था 46

लौटकर जा रहे गुफाओं में
दूर जाने  की  बात करते हैं 47

चेहरे पर चेहरा  मत रखना
तू ख़ुद को ऐसा मत रखना48

जता कर  प्यार करता  है 
अरेव्यापार करता  है
उसे  पीने  की ख़्वाहिश है
मगरइनकार करता है49

पीड़ा का अनुवाद हैं आँसू
एक मौन संवाद हैं आँसू 
इनकी भाषा पढ़ना ‘अंजुम‘ 
मुफ़लिस की फ़र्याद हैं आँसू50

छोटी बहर के इन शे’रों में जीवन के रंग भी हैं, बेतरतीब उलझ्र हुए पेंच भी, सादगी भी है जटिलता भी, नाद सौंदर्य भी है संगीतात्मकता भी। इन छोटी बहरों में जीवन का विराट फलक समाहित है।छोटी बहर बहुत साधना की माँग करती है। भाषा की कसावट के बिना छोटी बहर में शे’र कहना मुमकिन नहीं है वरना मात्राएं छिटक कर बेकाबू हो जाती हैं और मुँह चिढ़ाने लगती हैं। हिन्दी ग़ज़लकारों ने इस दिशा में प्रयाप्त सफलता अर्जित की है।
रामकुमार कृषक के शब्दों में “कोई भी अच्छी ग़ज़ल रूप और वस्तु के संतुलन का परिणाम है । इनमें अगर बेहतर संतुलन होगा तो ग़ज़ल मुग्ध भी करेगी और वैचारिक या भावनात्मक उद्वेलन तक भी ले जाएगी। कोई भी कला माध्यम अंततः अपने समय और समाज से जुड़कर ही संवाद करता है। उसके बग़ैर उसकी कोई गति नहीं। कोई भी रचना अगर अपने समय का पता नहीं देगी तो देर सवेर वह भी लापता हो जाएगी। दूसरे, कविता का काम, चाहे वह किसी भी विधा में लिखी गई हो, हमारे संवेदन और विचार को अमूर्त करना नहीं है बल्कि उन्हें अपने सहज संप्रेषण से देशकाल में घटित करना है।’’51हिन्दी ग़ज़ल अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद आमजन की परेशानी, संत्रास, कुंठा, संघर्ष और शोषण को स्वर दे रही है। आम आदमी की पीड़ा को संवेदनात्मक गहराई के साथ अभिव्यक्त करने में सक्षम, विशिष्ट चेतनासम्पन्न हिन्दी ग़ज़ल अपनी संघर्षशीलता और जिजीविषा के लिए जानी जाएगी।  

संदर्भः
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