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कहानी ‘‘ग्राहक देवता’’
April 21, 2020 • राम नगीना मौर्य

         
‘ग्राहक देवता’,
          पता नहीं मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है, जब भी किसी दुकान पर कोई सौदा-सुलुफ आदि खरीदने जाता हंूॅ, उस समय तो कोई ग्राहक नहीं दिखेगा। अमूमन...दुकानदार मक्खी मारता ही नजर आयेगा, लेकिन मेरे वहांॅ पहुंॅचते ही अगले चार-पांॅच मिनट में पता नहीं कहांॅ से ग्राहकों का ऐसा रेला सा उमड़ पड़ता है कि मुझे अपना सामान आदि खरीदने में दिक्कत तो होती ही है, दुकानदार भी मुझे छोड़कर अन्य ग्राहकों से निबटने में लग जाता है, जिससे कभी-कभी तो मिनटों के काम में घण्टों लग जाते हैं।
          भले ही मुझे आधा-आधा किलो ही फल खरीदना था, पर त्यौहारी पूजा-पाठ की वजह से पत्नी की तरफ से पांॅच प्रकार के फल खरीदने की हिदायत दी गयी थी। झोला मैं घर से ही लेकर चला था। खरीदारी की लिस्ट निकालकर याद करते हुए ‘शकूर भाई फल वाले’ की दुकान पर जब मैं पहुंॅचा तो वहांॅ कोई ग्राहक नहीं था। बताता चलंूॅ...शकूर भाई पूर्व में फलों के थोक व्यापारी थे, पर इधर कुछ वर्षों से स्वास्थ्य कारणों से, हमारी कालोनी से आगे चैराहे पर, फलों की ये छोटी सी दुकान ही चलाते हैं। हांॅ, मिजाज से थोड़ा अक्खड़ भी हैं। शायद उम्र का असर हो। शकूर भाई अपनी दुकान में फलों के अलावा टाफियांॅ, बिस्किट, ब्रेड, मक्खन और दूध आदि भी रखते हैं, जिससे उनकी दुकान पर लगभग हरवक्त खरीदारों की खासी भींड़ रहती है। परन्तु आज दुकान में कोई ग्राहक न देखकर इत्मिनान हुआ कि चलो...आराम से एक-एक फल छांॅट-छांॅट कर निकाल लंूॅगा, ताकि हड़बड़ी में वो कोई सड़ा-गला फल आदि न तौल दें, या मुझसे ही कोई सड़ा-गला फल आदि देखने में चूक न हो जाये।
         शकूर भाई, जिनकी उम्र लगभग सत्तर साल के आसपास होगी, के साथ आज उनकी बेगम भी दुकान में बैठी दिखीं। मैंने अन्दाजा लगाया, शायद त्यौहारी सीजन होने के कारण वो उनकी मदद के लिए आयी होंगी। दुकान में उनकी बेगम का काम अमूमन ये होता है कि खाली समय में वो अलग-अलग टोकरियों में अलग-अलग फलों, जैसे...किन्नू, बेर, शरीफा, सन्तरे, मौसम्मी, नाशपाती, सेव, अनार और कुछ अन्य विदेशी फलों आदि को करीने से सजाकर लगाती रहतीं हैं। जिस कारण दुकान में फलों की सजावट देखते ही बनती है। शकूर भाई का मानना है कि टोकरे में रखे सजे-धजे फलों को देखकर ग्राहक आकर्षित होते हैं। शायद...इसी कारण वो बाजदफे फलों से सजे-धजे टोकरों को हाथ लगाने पर ग्राहकों को रोकते-टोकते भी रहते हैं। कहते हैं...‘ज्यादातर ग्राहकों के छांॅटने-बीनने से फलों की ढ़ेरी तो खराब होती ही है, उन्हें दुबारा से लगाने में वक्त भी जाया होता है।’ 
          बहरहाल...मेरी उपरोक्त मान्यता कि किसी भी दुकान पर जाते ही ग्राहकों का तांता सा लग जाता है, यहांॅ भी भंग नहीं हुई। शकूर भाई से मैं अभी आधा किलो सन्तरों के बाद, आधा किलो सेव तौलवा ही रहा था कि दो मोटर-साइकिलें उनकी दुकान के सामने आकर रूकीं।
          ‘‘हांॅ, भई! अनार कैसे दिये?’’ बिलकुल दुकान से सटकर अपनी मोटर-साइकिल लगाते, सीट पर बैठे-बैठे ही उस मोटर-साइकिल सवार युवक ने शकूर भाई से अनार के भाव पूछे।
          ‘‘अरे, चाचा! ये सन्तरे कैसे दिये?’’ शकूर भाई पहले वाले ग्राहक को कुछ बताते, कि उसी मध्य दूसरा मोटर-साइकिल सवार, जिसने अपनी मोटर-साइकिल, दुकान से थोड़ा हटकर खड़ी की थी, ने उनसे सन्तरों के भाव पूछे।
          ‘‘मुझे आधा-आधा किलो नाशपाती और अनार भी दे दीजिएगा। क्या भाव दिये हैं?’’ उन ग्राहकों द्वारा अनार और सन्तरों की मांॅग करते सुन, जैसे मुझे भी बाकी फलों की याद आयी। 
          ‘‘क्यों, मियां! ये पपीते कैसे दिये?’’ शकूर भाई मेरे लिए अनार तौल ही रहे थे कि तभी दुकान के सामने एक सफेद रंग की कार आकर रूकी। उसमें से दो औरतें और एक अधेड़ सज्जन बाहर निकले। अधेड़ सज्जन ने दुकान के सामने आकर, शकूर भाई से पपीतों के भाव पूछे।
          ‘‘चालीस रूपये किलो।’’ शकूर भाई ने उन्हें पपीतों के भाव बताये।
          ‘‘ठीक है, दो किलो दे दीजिए।’’ कहते वो अधेड़ सज्जन सामने की टोकरी से पपीते छांॅटने लगे। कार से उतरी दोनों महिलाओं में से एक, कार से पीठ टिकाए अपने मोबाॅयल पर बतियाने में मशगूल हो गयी, और दूसरी महिला शकूर भाई की दुकान के बगल स्थित स्टेशनरी की दुकान पर चली गयी। 
          ‘‘अरे चाचा! हम तो इनसे पहले आये हैं। पहले हमें अनार दे दो, देर हो रही है।’’ सामने खड़े मोटर-साइकिल पर आये युवक ने कुछ-कुछ शिकायती लहजे में कहा।
          ‘‘हांॅ-हांॅ, आप ही को पहले दंूॅगा भाई साहब। लेकिन ये भी तो बताइये, कितना तौलना है? आपने तो पिछले पांॅच मिनट में लगभग तीन किलो अनार छांॅट लिये हैं। चाहिए कितना, ये तो बताइये? और हांॅ, मिले-जुले साइज के अनार लेने होंगे। हम इस तरह छांॅट-छांॅट कर अनार नहीं बेच पायेंगे।’’ शकूर भाई ने उस ग्राहक से तनिक तल्ख स्वर में कहा।
          ‘‘मुझे बस्स...एक किलो ही तो लेना है।’’ उस ग्राहक ने इत्मिनान से कहा। 
          ‘‘वाह! भाई साहब। लेना एक किलो है, और आपने छांॅट लिये लगभग तीन किलो। आप जैसे दो-चार ग्राहक और आ जायें, तब तो हो गयी हमारी दुकानदारी। ऊपर से टोकरी में रखी अनार की मेरी सारी ढ़ेरी भी खराब कर दी आपने।’’
          ‘‘तो क्या हुआ? इसमें से एक किलो दे दीजिए। ढे़रियांॅ फिर से बना लीजियेगा।’’ इस बार उस ग्राहक ने अपने दोनों कण्धे उचकाते हुए अत्यन्त लापरवाही से जवाब दिया। 
          ‘‘अच्छा, आप अपना झोला लेकर इधर आइये। मैं आपके लिए एक किलो अनार तौल रहा हंूॅ।’’ शकूर भाई ने उस युवक से तनिक नाराजगी भरे स्वर में, अनार की टोकरी के सामने से हटकर अपने बगल में आने के लिए कहा।
          ‘‘अरे मियां, हमें टेªन पकड़ना है, प्लीज जरा हमारे लिये ये दो किलो पपीते तौल दीजिए। हमें बस्स...ये पपीते ही खरीदने हैं।’’ कार से उतरे उस अधेड़ सज्जन ने अनुनयपूर्वक कहा।
          ‘‘अरे चाचा! तो हम्मैं कउन सी दुकान खरीदनी है?’’ युवा ग्राहक, उन अधेड़ सज्जन से लगभग उलझने की मुद्रा में मुखातिब हुआ। 
          ‘‘ठीक है भाई, आप ही पहले ले लीजिए। अरे मियां! पहले इन्हीं सज्जन को दे दीजिए।’’ अधेड़ सज्जन ने मानो असमय का बवाल टालने की गरजवश, समस्या का समाधान किया हो।
          ‘‘अरे, चाचा! आपने हमें अभी सिर्फ दो फल ही दिये हैं। हमें तीन फल और चाहिए।’’ मैंने उसी बीच हस्तक्षेप किया।
          ‘‘बाउ जी, आप तो रोज वाले हैं, इसी कालोनी में रहते हैं। थोड़ा इत्मिनान रखिये। अभी सबको सौदा मिला जाता है। पहले इन सज्जन को पपीते तौल दंूॅ। इन्हें टेªन पकड़नी है।’’ शकूर भाई ने मुझसे निवेदन किया।
         ‘‘और हांॅ, मुझे इस केले की घौद में से एक-एक दर्जन केले भी दो जगह दे दीजिएगा।’’ अब उस  मोटर-साइकिल सवार युवक ने अपनी नई मांॅग बतायी।
         ‘‘देता हंूॅ भाई जरा इत्मिनान रखिये। केला देने में कुछ समस्या है। मेरा चाकू नहीं मिल रहा। अब इन बूढ़ी हड्डियों में इतनी जान नहीं है, जो केले को घौद हाथों से तोड़ सकंूॅं। इन्हें काटना पड़ेगा।’’  शकूर भाई ने उससे यंूॅ अनुरोध किया।
         ‘‘चाचा, हमें भी इसी घौद से एक दर्जन केला दे दीजिए।’’ इस बार मोटर-साइकिल सवार दूसरे युवक ने फरमाइश की।
         ‘‘अरे भाई, तुम तो घर के आदमी हो। तुम्हें काहे की जल्दी पड़ी है? देता हंूॅ। थोड़ा सबर करो। यहीं तो...मेरा चाकू रखा था। बेगम जरा देखो तो...चाकू कहांॅ रख दिया? केले की घौद से एक-एक दर्जन केले काटने हैं।’’ शकूर भाई ने उस युवक को धैर्य रखने का आश्वासन देते, दुकान में अन्दर टोकरियों में फलों की ढ़ेरी सजाती हुई, अपनी बेगम से कहा। 
         ‘‘चाकू आपने हमें दिये थे, जो हमसे पूछ रहे हैं? हांॅ, नही ंतो...?’’ फलों की ढ़ेरी सजाना छोड़ते, उनकी बेगम ने लगभग झल्लाते हुए उत्तर दिया।
          ‘‘अरी बेगम, तुम भी गजब बतियाती हो। तुम्हें नहीं दिये थे। यहीं रखा था। मिल नहीं रहा। जरा चाकू ढंूॅ़ढ़ने में मेरी मदद कर दो। तब-तक मैं इन भाई साहब लोगों को अनार, सेव और पपीते आदि तौल देता हंूॅ।’’ शकूर भाई ने अपनी बेगम को लगभग समझाते हुए अनुनयपूर्वक कहा। 
          ‘‘चाचा, मुझे सेव, संतरा, अनार और नाशपाती के अलावा केले भी चाहिए।’’ मैंने फिर हस्तक्षेप करना चाहा।
          ‘‘अरे बाउ जी, आप तो आधा-आधा किलो वाले हैं न? हें-हें-हें...फिर काहे माठा किये हैं? ये एक-एक, दो-दो किलो वालों को निबट तो जाने दीजिए।’’ शकूर भाई ने मुझसे ये जुमले ऐसे मुस्कुराते हुए कहे, मानो प्यार से डांॅटा हो। 
          ‘‘वहांॅ अन्दर कहांॅ ढंूॅ़ढ़ रही हो? यहीं रखा था। अभी कुछ देर पहले एक साहब को इसी घौद से आधा-दर्जन केले काटकर दिया है, फिर यहीं रख दिया था। वहांॅ बैठी खींसे मत निपोरो। जरा ठीक से देखो।’’ मैंने ध्यान दिया इस बीच शकूर भाई, उस चाकू को लेकर कुछ परेशान से भी दिखे। दो-तीन बार अपनी बेगम को डांॅटा भी। उनकी बेगम भी गजब थीं। इधर शकूर भाई परेशान से दिख रहे थे, और उधर उनकी बेगम के चेहरे पर शिकन तक न था। बल्कि वो तो मन्द-मन्द मुस्कुराते चाकू खोजने में मगन थीं।
          ‘‘चाचा, ये सेव कैसे दिये?’’ तभी एक यू. वी. गाड़ी उनकी दुकान के सामने आकर खड़ी हुई। उसमें से ड्राइविंग-सीट पर बैठा, दाढ़ी-मंूॅछों वाला एक युवक उतरा और गाड़ी को स्टाॅर्ट अवस्था में ही छोड़कर, दुकान पर आकर सेव के भाव पूछे।
          ‘‘एक सौ चालीस रूपये किलो।’’ शकूर भाई ने उसे अनमने से जवाब दिया।
          ‘‘अच्छा, आधा किलो दे दीजिए। लेकिन जल्दी। मैंने गाड़ी स्टाॅर्ट ही रखी है। बन्द कर दंूॅगा तो दोबारा बिना धक्के के स्टाॅर्ट नहीं होगी।’’ उस युवक ने अपनी मजबूरी बतायी।
          ‘‘भई, यहांॅ सब जल्दी वाले ही हैं। आपको थोड़ा सबर करना होगा। बस्स...ये जो लोग पहले से खड़े हैं, इन्हें निबटा दंूॅ, फिर आपके सेव भी तौल देता हंूॅू।’’ शकूर भाई ने जीप वाले युवक से अपनी समस्या बतानी चाही।
          ‘‘फिर तो आपको देर लगेगी, मैं चलता हंूॅ।’’ कहते, बिना शकूर भाई के अगले उत्तर की प्रतीक्षा किये वो युवक ड्राइविंग-सीट पर जा बैठा, और गाड़ी आगे बढ़ा दी।
          ‘‘किसी को भी एक मिनट का सबर नहीं। जिसको देखो, वही जल्दी में है। अरे! क्या हुआ चाकू मिला...? जरा ठीक से देखो। उधर पीछे खलवतखाने में बैठी क्या कर रही हो? उस अदने से चाकू की वजह से ग्राहक निकले जा रहे हैं।’’ इस बार तनिक जोर से चिल्लाते हुए शकूर भाई ने अपनी बेगम से पूछा, जो चाकू खोजते हुए दुकान के पिछले हिस्से में चली गयीं थीं।
          ‘‘खोज तो रही हंूॅ। आगे-पीछे, कहीं भी तो नहीं मिल रहा, आपका चाकू।’’ बेगम ने लगभग नाराजगी भरे स्वर में कहा।
          ‘‘खोज क्या खाक रही हो? वहांॅ बैठे-बैठे इल्हाम हो जायेगा कि चाकू कहांॅ है? तुम्हीं ने कहीं इधर-उधर कर दिया होगा। तुमसे जब कुछ सधता नहीं, तो दुकान पर आती ही क्यों हो? तुम्हारे, दुकान में आने से कहांॅ तो मदद मिलनी चाहिए, मेरी मुसीबत और भी बढ़ जाती है।’’ शकूर भाई ने लगभग खींझते हुए गुस्से में अपनी बेगम से कहा।
          ‘‘मेरी दवाइयांॅ खत्म हो गयी थीं, इसीलिए दुकान पर चली आयी कि आपका हाथ बंटा दंूॅगी, और शाम को लौटते वक्त अपनी दवाइयांॅ भी लेती आऊॅगी। पर आप तो मुझे ही कोसने लगे। अगर ज्यादा गुस्सा दिखायेंगे, तो जाइये मैं नहीं खोजती।’’ उनकी बेगम ने भी लगभग तुनकते हुए कहा।
          ‘‘ओफ्फो...खुदा के लिए मुझ पर रहम करो। मैं तुम्हें कोस नहीं रहा। अभी तो तुम उस चाकू को जल्दी से ढंूॅढ़ो, नही ंतो ये केले की घौद बिना बिके ही रह जायेंगी। दो ग्राहक पहले ही लौट चुके हैं।’’ मैंने ध्यान दिया...अपनी देह-भाषा से तो इस बार शकूर भाई लगभग बैक-फुट पर ही आ गये थे।
          ‘‘ठीक है, मैं कोशिश करती हंूॅ।’’ मैंने कनखियों देखा कि ये कहते, उनकी बेगम के चेहरे पर हल्की मुस्कान बिखर गयी थी।
           ‘‘अच्छा, अब तुम चाकू खोजने के लिए रहने दो। देखो एक किलो का बाट किधर चला गया है? उसे खोजो। पता नहीं आज क्या हो रहा है? यहीं सामने रखा सामान, गुम हुआ जा रहा है।’’ शकूर भाई अजीब पशोपेश में थे।
          ‘‘ये लीजिए। आप किसी ग्राहक के लिए फल निकालने आये होंगे, तभी इस टोकरी के पीछे रख दिया होगा।’’ उनकी बेगम ने फलों की टोकरी के पीछे से एक किलो का बाट ढंूॅ़ढ़कर निकालते, शकूर भाई को पकड़ाते हुए कहा।
           ‘‘अच्छा थोड़ी और मेहनत कर लो। वो चाकू ढंूॅढ़ दो। केले की घौद मुझसे टूटेगी नहीं। चाकू न होने से बिना केला खरीदे, ग्राहक लोग लौटे जा रहे हैं।’’ शकूर भाई ने अपना रूख तनिक नरम रखते हुए बेगम से इल्तिजा की।
          ‘‘चाचा, तब तक मेरे अनार ही तौल दीजिए। केले बाद में दे दीजियेगा’’ मैंने कहना चाहा।
          ‘‘मियां, मेरे पपीते का हिसाब कर दीजिए। मेरी टेªन छूट जायेगी।’’ उस अधेड़ सज्जन ने पांॅच सौ का एक नोट, शकूर भाई की तरफ बढ़ाते हुए कहा।
          ‘‘अजीब मुसीबत है। किसी को भी दो मिनट धैर्य नहीं है। भाई जी, आप के पास अगर छुट्टे पैसे हों तो दे दीजिए। मेरे गल्ले में सौ-सौ के सिर्फ दो नोट ही हैं।’’
          ‘‘चाचा, अभी कितनी देर लगेगी...केले में?’’ तभी उस युवा ग्राहक ने तनिक तल्ख लहजे में शकूर भाई से पूछा।
          ‘‘भाई, बिना चाकू मिले तो नहीं दे पाऊंॅगा। अगर आपसे ये केले की घौद टूट सके तो छः केले तोड़ लीजिए। मुझसे तो टूटने से रहा।’’ शकूर भाई ने उन्हें सीधा-सपाट सा जवाब दे दिया।
          ‘‘अरे चाचा, आप भी अजीब बात कह रहे हैं। छोड़िये रहने दीजिए। आप मेरे सेव का ही हिसाब कर दीजिए।’’ उस युवा ग्राहक ने नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहा।
          ‘‘अंकल जी, वो ऊपर से दो चाकलेट दे दीजिए। एक छोटा वाला और एक बड़ा वाला।’’ उसी बीच वहांॅ लगभग दस से बारह वर्ष की उम्र के दो बच्चे आये, और दुकान में फ्रिज के ऊपरी खाने में रखे चाकलेट के पैकेट्स की ओर इशारा करते चाकलेट की मांॅग की।
          ‘‘बच्चों, अभी चलो। अभी टाइम नहीं है। एक घण्टे बाद आना।’’ शकूर भाई ने बिना एक पल भी गंवाये, उन बच्चों को वहांॅ से चलता करना चाहा।
         ‘‘अंकल जी, हमारे पास छुट्टे पैसे हैं। चाकलेट दे दीजिए न...।’’ उन बच्चों ने मानो शकूर भाई की समस्या को समझते, दस और बीस के दो नोट उनकी ओर बढ़ाये।
         ‘‘अच्छा, ले आओ। ये लो तुम्हारे चाकलेट।’’ शकूर भाई ने उन बच्चों से पैसे लेकर उन्हें चाकलेट देकर चलता किया। उसी बीच एक और ग्राहक ने संतरे खरीदने के उपरान्त उन्हें पैसे दिये। जिससे शकूर भाई के गल्ले में पर्याप्त फुटकर रूपये हो गये।
         खैर...अन्ततः मैं भी बिना केला लिए ही, खरीदे गये चारों फलों के पैसे चुकाते, अपना झोला उठाये जैसे ही वहांॅ से चलने को हुआ, पीछे से शकूर भाई की आवाज कानों में पड़ी।
        ‘‘ये लो देखो। केले काटने वाला चाकू, इन बाउ जी के झोले के नीचे ही दबा था। मैंने जब उन्हें सेव और सन्तरे दिये थे, तभी उन्होंने अपना झोला यहांॅ रख दिया था। अब चाकू इसी के नीचे दबा रह गया, और हमने पूरी दुकान छान मारी। इस चाकू की वजह से तीन ग्राहक बिना केले खरीदे ही चले गये। न मुझे ध्यान रहा, न ये बाउ जी ही देख पाये, और मैं तुम पर खामखाह ही नाराज हो रहा था।’’ शकूर भाई अपनी बेगम से कह रहे थे।
         ‘‘ओ...हो...माफी चाहंूॅगा शकूर भाई, मैंने भी ध्यान नहीं दिया।’’ मेरे कानों में जैसे ही उनकी ये बातें पड़ीं, मैंने पलट कर अफसोस जताना चाहा।
         ‘‘छोड़िये जाने दीजिए बाउ जी, लेकिन आपकी वजह से मेरे तीन ग्राहक बिना केले खरीदे ही चले गये।’’ शकूर भाई के चेहरे पर ग्राहकों के लौटने की टीस साफ-साफ महसूस की जा सकती थी।
         ‘‘लेकिन मैंने ऐसा जानबूझ कर नहीं किया। ऐसा अनजाने में ही हो गया।’’ मैंने अपना पक्ष रखना चाहा।
         ‘‘अरे! आप इन जनाब पर खामखाह ही बिगड़ रहे हैं। तीन ग्राहक चले गये तो क्या हुआ? ये जनाब तो इसी कालोनी में रहते हैं। रोज वाले ग्राहक हैं। आप ऐसी बातें करके इनकी ग्राहकी से भी हाथ धो बैठेंगे। आखिर, ग्राहक देवता होता है, क्यों नहीं समझते?’’ शकूर भाई की बेगम ने उन्हें समझाते, तत्काल हस्तक्षेप किया।
         ‘‘बाउ जी, अब आप तो केले लेते जाइये।’’ मैं शकूर भाई के बेगम की बातों को सुनी-अनसुनी करते, अफसुर्दगी भरा चेहरा लिये वहांॅ से लौटने को हुआ कि शकूर भाई ने मुझे ये कहते रोका।
         ‘‘जी बिलकुल, दे दीजिए।’’ मानो मेरी जान में जान आयी।
          ‘‘कितने दे दंूॅ?’’ शकूर भाई ने मुझसे जानना चाहा।
          ‘‘दो दर्जन दे दीजिए। अभी ये काफी सख्त हैं। हफ्ते-भर तो रखे ही जा सकते हैं।’’ मैं, शायद शकूर भाई के बिना केले खरीदे लौट चुके ग्राहकों से हुए नुकसान की भरपाई करना चाह रहा था।
          ‘‘लेकिन...आपको तो आधा दर्जन ही चाहिए थे न? फिर इतना क्या करेंगे?’’ शकूर भाई ने तनिक आश्चर्य से पूछा।
          ‘‘तो क्या हुआ? घर में रखे रहेंगे। कल की पूजा-पाठ के अलावा, खाने के भी काम आ जायेंगे...हें-हें-हें।’’ मैंने चेहरे पर बनावटी हंॅसी लाते हुए कहा था। 
         ‘‘अरे बाउ जी! न आप कहीं गये हैं, न मैं। जितनी जरूरत हो उतनी ही ले जाइये। खामखाह ही ये केले रखे-रखे गलकर खराब हो जायेंगे।’’ शकूर भाई ने मानो मेरे चेहरे पर छाये अफसुर्दगी के भाव को पढ़ लिया हो। ग्लानिबोध से उबरने की मेरी कोशिश को वो साफ-साफ समझ रहे थे।
          ‘‘ठीक है फिर...एक दर्जन ही दे दीजिए। पर अब और जिद मत करियेगा।’’ मैंने भी अपना पक्ष रखते फैसला सुनाया।
          ‘‘जैसी आपकी मर्जी...हें-हें-हें।’’ जाहिर है...हमने अपने-अपने हिसाब से माहौल को भरसक खुशगवार बनाने की कोशिश की थी।

                   राम नगीना मौर्य,
                    5/348, विराज खण्ड, गोमती नगर
               लखनऊ - 226010, उत्तर प्रदेश,