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कहानी -महामारी 
April 6, 2020 •    संगीता गुप्ता
उनका घर सड़क किनारे शहर की सबसे व्यस्ततम सड़क पर था।अठारह मार्च से ही वाट्स एप के समूहों पर  जिलाधीश महोदय के आदेश पड़े हुये थे कि सभी कार्यालयों में आधा-आधा स्टाफ एक-एक दिन छोड़ -छोड़कर आये ताकि बैंक आदि से लोग नकदी निकाल सकें।बाईस मार्च के दिन का तो सरकार ने संपूर्ण बंद ही घोषित कर दिया।इसके बाद दो-चार घंटे को किराने की दुकानें व दवाईखाने खुले। शुरू में तो पति को निश्चिंतता ही रही कि कुछ नहीं होगा ।एक माह पहले ही ट्विटर पर टिप्पणियां थीं पर उस समय दुकान में जब पति ने ग्राहकों से बात की तो लोगों ने कहा हमारा देश तो शाकाहारी है ,हम हाथ नहीं मिलाते हैं और मंदिरों में हवन तो चलते ही रहते हैं सो हमारे यहां कुछ नहीं होगा। धीरे-धीरे पता लगा कि यह छुआछूत का रोग है वही छुआछूत जिसे लोगों ने घरों में मानना बंद कर दिया था।पति को याद आया उनकी मां घर के अंदर कितनी छुआछूत करती थीं।आजकल तो जादू की झप्पी देना फैशन बना दिया है।दीर्घशंका के बाद और अस्पताल से आने के बाद वे नहाकर ही किसी को छूती थीं और अस्पताल से लाया सामान धोती और कपड़े धोती फिर न धोने योग्य सामान पर नहाकर गंगाजल छिड़कती। उनके इन्हीं नियमों पर पत्नी चिढ़ती थी और सारे काम उल्टे ही करती अतः वो तंग आकर उसी मकान में अलग  हो गया।आज उसे लगा कि आश्चर्य उसकी अनपढ़ मां को भी पता था कि कपड़ों और सामानों में कैसे वायरस आ जाता  है।भीड़ बंदी के लिए संपूर्ण बंद हुआ तो शुरू के दिनों में पति ने बगीचे में पेड़ों को पानी दिया ।सुबह जागने ,घूमने या फिर अध्यात्म और ध्यान में उसकी कोई रुचि थी नहीं ।इसके अलावा बड़े ग्रंथ तो छोड़ो वह समाचार पत्र तक नहीं पढ़ता था।सच कहें तो उसकी रुचि सुनने और सुनाने में अधिक थी।गांव की चौपालों की तरह रोज दस -पंद्रह लोग उसकी दुकान पर हमेशा जमा ही रहते।उस चौपाल के हर समाचार पर सभी ऐसे विश्वास करते थे जैसे किसी सरकारी एजेंसी के द्वारा दिए गये समाचार पर करते हैं।यदि हम ये कहें तो ठीक होगा कि वह शुद्ध व्यवहारिक व्यक्ति था जो आंखों से दिखता था उसी को मानता था । भगवान और अगला या पिछला जन्म किसने देखा बस जमाने के साथ दौड़ो और दौड़ में आगे रहो और दूसरे के सामने मंहगे से मंहगा सामान जोड़कर इज्जत बना लो यही उसकी जिन्दगी का मकसद था। अब जब जमाने को दिखाना ही मकसद था और वह जमाना ही न मिले तो बैचेनी तो स्वाभाविक थी।
        दुकान नहीं खोली तो लगा घर की सफाई ही कर ले क्योंकि पत्नि भी नौकरी करती थी अतः सफाई नहीं हो पाती थी।अभी दो-तीन दिन बीते कि वे चारों मिलकर सबके कपड़े धो चुके थे और इस्त्री कर चुके थे इसके साथ ही घर की एक-एक चीज वे चमका चुके थे।बच्चे पढ़ने में ज्यादा रुचि लेते नहीं थे और करेला नीम चढ़ा ये था कि जब आपस में लड़कर वे थक जाते तो मोबाईल लेकर दिन -दिनभर फिल्में देखते।पति बच्चोंं के साथ नहीं बैठता था न ही खेलता था एक विशेष प्रकार की अकड़ के कारण वह दिन में कई बार बच्चों को और कभी-कभी पत्नी को गाली देता रहता था।पति को बैठे-बैठे बड़ी चिड़चिड़ाहट हो रही थी।सही ही था बारह घंटे सड़क पर सीधा प्रसारण देखने वाले आदमी के सामने एक चिड़िया तक न थी।उसे याद आया कि कब से उसने सड़क चलती लड़कियों को घूरकर नहीं देखा ।घर से बाहर निकल नहीं पा रहा था।इसके अलावा वह रो सकता नहीं था और हंस भी नहीं पा रहा था । इस दुख के कारण को न वह गाली दे पा रहा था न बुराई कर पा रहा था।फिर सोये भी तो कितना ?सफाई भी करे तो कितनी ?आधा घंटे की पूजा तो चंदन माथे पर लगाने के लालच में शुरू से ही करता था।न किसी को ठोक सकता था और यदि बच्चों को मारता तो पड़ौसी चढ़ बैठते क्योंकि आवाज कई गुनी होकर  सड़क पर गूंजती थी ।सड़क पर चलते ठेले और रेड़ी वाले भी गाली झेलने उपस्थित न थे सो बाजार में उसका अस्तित्व ही खतरे में था ।सड़क का सन्नाटा गोख से देखते-देखते जब वह बेचैन होता तो लंबी-गहरी निश्वास छोड़ता और विशेष लय में कहता-कोरोना....।इस दुख भरी आवाज को अपने घरों में बैठे लोग हंसने का सबब बना लेते फिर अज्ञात भय से एकदम दब जाते।
        वैसे भी साधारणतः भगवान  जब किसी व्यक्ति को आपदा देता है तब कोई कहां उसे सीधे-सीधे कोस पाता है कि आग लगे भगवान को।न भगवान की पीठ पीछे किसी अन्य से बुराई ही कर पाता है, बस अपनी बेबसी और मजबूरी पर  आहें भर पाता है।ऐसी बेचैनी में कई बार तो आंसू ही निकल पड़ते हैं ।ऐसी ही स्थिति अब पति की हो रही थी। जब वह आंसू रोकता था तो मुंह से बेबस ही दर्द सहित निकल ही पड़ता है- महामारी.....। इस प्रकार महामारी भगवान ही थी।
        उधर उसकी पत्नि भी हमेशा की तरह आजकल सुबह-सुबह पति के हाथ से बेड टी पी लेती  ।आजकल वह नौ की जगह ग्यारह बजे सोकर उठने लगी ।दोनों मिलकर खाना बना लेते 
 और बच्चों की सहायता से चार घंटे का काम दो घंटे में निपट जाता ।जब बैठे-बैठे बैचेनी होने लगती तो बिना एक भी गाली जुबां पर लायें आ़खों में नमी लाकर लंबी सांस छोड़ते हुए वह अक्सर बोलती -महामारी.....।
          उसे रह-रह कर पास के चौराहे के गोल-गप्पे और शहर के प्रसिद्ध होटल की काजू -करी याद आ रही थी ।वो सहेलियों के बीच बैठकर अपना साड़ी दिखाना ,वो फिल्मों की नायिका की तरह शर्माना और प्रशंसा होने पर गाल-गुलाल हो जाना सब कुछ खत्म हो गया। ये नाशपीटे ... फिर वह  जुबान काबू में करती कि वह गंवार नहीं है...वह खुद को डराती तभी मुंह से लंबी निश्वास के साथ विशेष लय में निकल  ही पड़ता - महामारी....।
       इधर बच्चे निश्चिंत थे वे मिलकर हंसते-चिढ़ाते और खेलते फिर कई बार लड़ते भी और हाथों की तलवार बनाकर कहते भाग महामारी भाग -भाग रे भाग महामारी भाग।
                             संगीता गुप्ता