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कमलेश्वर की कहानियों में सामाजिक चेतना
June 4, 2020 •   विजयलक्ष्मी यादव • Research article

कमलेश्वर की कहानियों में सामाजिक चेतना

                                                                                                                                 विजयलक्ष्मी यादव

                                                                                                                                  शोधकर्त्री हिंदी

                                                                                                           राजस्थान विश्वविद्यालविद्यालय, जयपुर

                                                                                                                               मो.9799964305

शोधपत्र-सारांश:

 

कोई भी रचनाकार एवं रचना विधा समाज से विलग हो ही नहीं सकती। समाज की रीति - नीति, परंपराओं, आदर्शों, मूल्यों, सिद्धांतों आदि रचना की संपत्ति हैं। इस दृष्टि से कमलेश्वर की कहानियों के मूल्यांकन के फलस्वरूप यह स्पष्ट हो जाता है कि वह समाज चेता एवं युग दृष्टा कहानीकार हैं। उनकी कहानियों में न केवल तत्कालीन समाज का चित्रण है बल्कि एक ऐसे समाज के निर्माण की ओर इशारा भी है जो वे बनाना चाहते थे। समाज, सामाजिक संबंध एवं सामाजिक समस्याओं तथा उन समस्याओं के निराकरण के उपायों पर विचार किया गया है।

 संकेताक्षर : नई कहानी, समांतर कहानी , यथार्थ,  भोगा हुआ यथार्थ,  काल्पनिक दुनिया,  समाज,  समाज चेतना, युग चेतना,  युगधर्म

 

कमलेश्वर स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्यकारों में प्रमुख हस्ताक्षर हैं। कमलेश्वर की स्वतंत्रता की संधि स्थल के प्रमुख कथाकारों में अपनी सक्रिय एवं सार्थक उपस्थिति दर्ज है।  स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय क्रांतिकारियों के साथ रहकर अपनी सक्रिय एवं सार्थक उपस्थिति, सहभागिता रखने वाले एवं उन समस्त गतिविधियों में  सम्मिलित रहकर देश प्रेम, समाज सेवा आदि के पुनीत यज्ञ में आहूति देने वाले बहुत कम साहित्यकार होंगे। उन विरले साहित्यकारों में से एक हैं -  कमलेश्वर। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के समय 1940 से 1950 के दशक के मध्य अनेक राजनीतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक क्षेत्र में परिवर्तन स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं। इस समय हिंदी कहानी साहित्य में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलते हैं। अब कहानी केवल मनोरंजन का साधन न रहकर सामाजिक संदेश, आम आदमी के दु:ख-दर्द, पीड़ा, हताशा, कुंठा, सत्रांस को प्रकट करती है। अब तक यथार्थ जीवन के साथ काल्पनिक दुनिया की कहानियों को तरजीह दी जाती थी। 1940 के दशक बाद हिंदी कहानी साहित्य में 'नयी कहानी' का जन्म हुआ। इस 'नयी कहानी'  आंदोलन के प्रमुख त्रयी थी - कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और एक मित्र थे दुष्यंत कुमार। इस त्रयी ने हिंदी साहित्य में एक जबरदस्त हलचल पैदा कर दी। उन्होंने कहानी विधा में रोचकता, शैलीगत, प्रयोग तथा विषयवस्तु की नवीनता से पाठकों, आलोचकों और साहित्य के अलम्बरदारों को आईना दिखाया। तीनों ही प्रमुख नाम न केवल युवा थे, बल्कि अच्छे दोस्त भी थे। इन तीनों में कमलेश्वर सबसे अधिक सक्रिय एवं मंचों एवं बहसों में करारा जवाब देने वाले थे। कमलेश्वर ने साहित्यिक मंचों पर अपनी 'नयी कहानी'  की प्रमुख 'थीम'  को न केवल समझाया बल्कि 'नयी कहानी की भूमिका'  नामक आलोचना पुस्तक लिखकर 'नयी कहानी' की संवैधानिक पृष्ठभूमि भी तैयार की।

कमलेश्वर ने लगभग सैकड़ोंं लघु लंबी, कहानी लिखकर हिंदी साहित्य में अपनी गुरु गंभीर उपस्थिति दर्ज करवायी। पहले 'नयी कहानी' और तत्पश्चात् 'समांतर कहानी' के माध्यम से मध्यमवर्गीय आम आदमी की जीवन शैली, रीति-नीति, परंपराएं तथा सामाजिक समस्याओं को रखकर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। कमलेश्वर ने अनेक कालजयी कहानियों की सृजना की। मसलन - राजा निरबंसिया, मांस का दरिया, चप्पलें, देवा की मां, सुबह का सपना, दिल्ली में एक मौत, दिल्ली में एक और मौत, बयान, आजादी मुबारक, जार्ज पंचम की नाम, इतने अच्छे दिन, खोई हुई दिशाएं, तलाश, नागमणि, बदनाम बस्ती, कोहरा, कस्बे का आदमी, उस रात वह मुझे ब्रीच कैण्डी मिली थी, इतिहास कथा, कितने पाकिस्तान आदि।

कमलेश्वर की इन तमाम कहानियों में कस्बाई, नगरीय एवं महानगरीय जीवन की तमाम गतिविधियों, लोगों के सहज मनोविज्ञान को देखा जा सकता है। कमलेश्वर मूलत: मैनपुरी (उत्तरप्रदेश) में जन्में होने के कारण और बाद में नौकरी के सिलसिले में दिल्ली बंबई में रहने से उनकी कहानियों में कस्बाई जीवन का चित्रण अधिक है।

समाज

 

समाज शब्द सम् उपसर्ग पूर्वक अज् धातु से बना है। अर्थात् अकर्तरिच कारके संज्ञायाम। सम्यक् अजन्ति जन: अस्मिन् इति समाज:। इस प्रकार जहाँ सभी लोग अच्छी तरह से रहें, वह समाज हैं।1 अनेक समाज शास्त्रियों ने समाज की परिभाषाएं दी है। मैकाइवर के अनुसार 'समाज'  शब्द में हर तरह का तथा हर अंग का वह संबंध आ जाता है, जो दूसरे मनुष्यों तथा किन्हीं भी अन्य सामाजिक प्राणियों द्वारा एक-दूसरे के साथ स्थापित किए जाते हैं।2 प्रसिद्ध पाश्चात्य विचारक राइट के अनुसार 'समाज का अर्थ केवल व्यक्तियों का समूह नहीं है, समूह में रहने वाले व्यक्तियों के आपस में जो संबंध है, उन संबंधों के संगठित रूप को समाज कहते हैं।"3 भारतीय समाजशास्त्री सत्यकेतु विद्यालंकार लिखते हैं कि - ''मनुष्यों के जीवन में एक दूसरे के साथ संबंधों का जाल सा बिछा हुआ है, समाजशास्त्र में उसी को समाज कहा जाता है।"4

समाज को विभिन्न विद्वानों द्वारा परिभाषित किया है। इन समस्त परिभाषाओं से यह देखने को मिला की समाज एक ऐसा समूह है जिसमें लोग अपने सामाजिक, पारिवारिक आदि संबंधों के चलते संगठित है, समाज में व्यक्ति की प्रतिभा का पूर्ण विकास होता है। उसकी बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमता एवं सौष्ठव का विकास होता है। 

सामाजिक चेतना

 

समाज चेतना से तात्पर्य है - समाज के लोगों में चेतना। अर्थात् व्यक्ति के चारों तरफ फैले हुए जन-जीवन के यथार्थ, रीति-नीति, परंपराएं आदि से परिचित होना और उसे आत्मसात् करके सबके प्रति संवेदनशील बनना। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज के सुख-दुख, हर्ष-विषाद, विभिन्न समस्याओं, कुंठाओं, सत्रांस आदि को लेकर अलग नही कर सकता। तमाम तरह के बदलावों को महसूस करना तथा अनुभूति के साथ अभिव्यक्ति के धरातल पर इन बदलावों को रेखांकित करना समाज के प्रत्येक नागरिक का कत्र्तव्य है। यह एक सामान्य सी अनुभूति एवं सोच है। अब एक साहित्यकार की सोच क्या हो सकती है। यह देख लेना अत्यावश्यक है।

समाज चेतना संबंध उपर्युक्त अनुभूति के पश्चात् यह कहना जरूरी है कि एक साहित्यकार की समाज चेतना क्या हो सकती है। एक साहित्यकार समाज के प्रति जो सोचता है, चिंतन करता है, बदलावों को महसूस करता है आदि को अभिव्यक्ति देता है, वह उसकी सामाजिक चेतना मानी जाती है। इस सामाजिक चेतना के आलोक में कमलेश्वर की कहानियों का अध्ययन करना हमारा अभीष्ट है। कमलेश्वर स्वतंत्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य में एक क्रांतिकारी बदलाव के फलस्वरूप उपजी 'नयी कहानी'के न केवल प्रवर्तक हैं, बल्कि पुरोधा भी हैं। कमलेश्वर की समस्त कहानियां स्वातंत्र्योत्तर सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, समस्याएं, कुंठाएं, सत्रांस, पराजित मानसिकता के साथ नयी परिस्थितियों के मध्य उपजा जीवन राग हैं। मध्यमवर्गीय हताशा, निराशा, बैचेनी, व्याकुलता, आकुलता, टीस, दुरभिसंधियां, संबंधों की टूटन, संबंधों के निवर्हण, रूढिय़ों- रीतियों दूषित परंपराओं को देखा जा सकता है। कोई भी साहित्यकार समाज से कटकर साहित्य सृजन कर ही नहीं सकता। ठीक ही कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है। इस कथन की सार्थकता एवं व्यावहारिकता कमलेश्वर की कहानियों में स्पष्टत: परिलक्षित होता है। कमलेश्वर की कहानियों में मध्यमवर्गीय समाज ठाठे मारता नजर आता है।

कमलेश्वर एक समाजचेता कहानीकार हैं, तो भला उनकी कहानियाँ समाज की गतिविधियों से कैसे वंचित रह सकती हैं। कमलेश्वर ने जहां समाज में एक तरफ सामाजिक विषमता को देखा, दूसरी तरफ उस वैषम्य स्थिति को भोगा भी। 'कस्बे का आदमी' कहानी में सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति है, तो 'देवी की  मां' कहानी में एक स्त्री के आत्म सम्मान एवं दयनीयता को देखा जा सकता है। यह आत्म सम्मान की कहानी है जिसमें देवा युवाओं को एक आदर्श रूप दिखाता है। यह देवा की सामाजिक सक्रियता तथा बलिदान की कहानी है। 'खोई हुई दिशाएँ' कहानी में महानगरीय जीवन के अकेलेपन, अजनबीयता, सत्रांस तथा विवशता, खोखलेपन को चित्रित करती है। सीधे, ईमानदार तथा दयनीय व्यक्ति का शोषण किन-किन स्तरों पर होता है, यह इस कहानी में स्पष्ट दिखाया हैं।

कमलेश्वर की कहानियों में मध्यमवर्गीय आम आदमी को अभिव्यक्त किया है। आम आदमी को परिभाषित करते हुए कमलेश्वर लिखते हैं ''यह आदमी न जैन संशयवाद का शिकार है, न बौद्ध दु:खवाद, का न हिंदू भाग्यवाद का, वह चाहे अतिशय अकिंचन और अति सा धारण हो, चाहे नितांत भौतिक आवश्यकताओं का मारा हुआ, पर है वह मात्र आदमी। अपने यथार्थ परिवेश में साँस लेता, जिजीविषा से सम्पन्न व्यक्ति।5 इस आदमी का कोई धर्म, संप्रदाय, जाति नहीं होती। यह सभी धर्मों, समुदायों, जातियों में मिलता है। इस आम आदमी की अभिव्यक्ति कमलेश्वर की अनेक कहानियों में दिखलायी पड़ती है। मसलन - बेकार आदमी, युद्ध, दिल्ली में एक मौत, पराया शहर, खोई हुई दिशाएँ, दु:खभरी दुनिया, एक थी विमला, मांस का दरिया, चप्पलें आदि। 'जार्ज पंचम की नाक' कहानी में आम आदमी की इज्जत से बड़ी है मूर्ति की हिफाजत। यहां दिखाया है कि भले एक व्यक्ति की नाक कटी पर देश की नाक कटने से बच गयी। स्पष्ट है कि आम आदमी का कोई महत्व नहीं। कमलेश्वर ने 'अपने-अपने अजनबी' लोक सेवकों की 'लोकसेवा' शब्द के माध्यम से गंभीर, तीक्ष्ण व्यंग्य किया है। लोकसेवा के उद्देश्य से इन लोकसेवकों की शोषण एवं विलासिता की प्रवृति पर गहरा व्यंग्य किया है। कहानीकार लिखते हैं - ''हिंदुस्तान में दो ही तरह के तबके हैं - अमीरों के और गरीबों के सोचने वालो और काम करने वालो के। और यह अच्छी बात है कि सोच रहा है, वह काम नहीं कर रहा है और जो काम कर रहा है, वह सोच नहीं रहा है।6

सामाजिक संबंध

 

समाज निर्माण के साथ समाज के विभिन्न स्तरों पर संबंधों की निर्मित हो जाती है। जिनको सामाजिक संबंध कहते हैं। इसमें पारिवारिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय संबंधों का मिश्रित रूप सामाजिक संबंधों के अभिधान से जाना जाता है। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय परिवार एवं समाज के निरंतर परिवर्तन के फलस्वरूप संबंधों में दरार, बिखराव, टूटन आदि देखने को मिलता है। एक समाज चेता साहित्यकार इस बदलते परिवेश को अपनी कलम से देश एवं समाज के पाठकों को परिचित कराता है। कमलेश्वर ऐसे कलमजीवी हैं, जिनका साहित्य समाज के सूक्ष्म बदलाव को भी चित्रित करता है। कमलेश्वर की कहानी 'शोक समारोह' में प्रियजनों की मृत्यु को दु:ख की बेला को अपने बड़प्पन दिखाने हेतु आधुनिक सभ्य लोगों द्वारा बाह्य खोखले सामाजिक संबंधों का व्यंग्यपूर्ण चित्रण उपलब्ध है- ''बित्रा की विधवा दीपा और बहु मृत्यु पर आने वाले तार पर आत्म गौरव का अनुभव करती हैं और उन्हें उनकी संख्या की जानकारी भी है। साथ ही शोक प्रकट करने आने वाले लोगों की अधिकता से सतर्क रहने की बात करती है। - ''तार पर तार' मैं तो देखते - देखते थक गई। डेथवाले दिन के तार से आलमारी भरी पड़ी हैं।7

कमलेश्वर की कहानी 'दिल्ली में एक मौत'आधुनिक सामाजिक संबंधों की विलक्षणता एवं गैर मानवीय स्थिति को रूपायित करती है। नगरीय जीवन शैली एवं दिखावे की प्रवृति को उजागर किया है। नगरों में सामाजिक, मानवीय संबंधों की क्रूरता मानवीयता का चित्रण किया गया है। कहानी के मुख्य नायक सेठ दीवानचंद की अंत्येष्टि के माध्यम से नगर के लोगों की संवेदनहीनता, स्वार्थपरकता तथा अमानवीय औपचारिकता को प्रकट करती है। अपनी व्यवस्तता के बीच दीवानचंद की अंत्येष्टि में लोग कपड़ों के आयरन करके सीधे शमसान घाट पहुंचते हैं। यानी किसी को पैदल चलने की फुर्सत और हिम्मत नहीं। सज धज कर, बूट पॉलिस, कोट पेंट, टाई आदि लगाकर, महिलाएं सज संवरकर घर पहुंचती है। एक बार कोरा दिखावा करके वापस अपने कार्यस्थल पहुंचकर अपने कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं जिस सेठ दीवानचंद ने अपने जीवन में सभी की मदद, सहायता की उनकी अंत्येष्टि में कुछ समय निकालकर पैदल चलने में गुरेज हैं। यह है आज का नागर जीवन। जब तक सेठ दीवानचन्द जीवित थे, उनके आगे-पीछे लोग घूम रहे थे। आज उनकी अंतिम क्रिया कर्म पर महज औपचारिकता की जा रही है। ''सामने बारजे पर मुझे मिसेज वासवानी दिखाई पड़ती है। उनके खूबसूरत चेहरे पर अजीब - सी सफेदी है। और होठों पर पिछली शाम की लिपस्टिक की हल्की लाली अभी भी मौजूद है। गाउन पहने हुए ही वह निकली है और अपना जूड़ा बांध रही है। उनकी आवाज सुनाई पड़ती है, डार्लिंग जरा मुझे पेस्ट देना प्लीज।8

बदलते सामाजिक संबंधों का चित्रण

 

आधुनिक कहानीकार अपने परिवेश के प्रति सजग तथा विशेष रूप से जागरूक है। वह भोगा यथार्थ को रेखांकित करता है। अनुभूति की सच्चाई आज के कहानीकार की प्रमुख विशेषता है। किसी भी कहानी की श्रेष्ठता के पीछे उसके परिवेश से जुड़े होना बहुत अधिक महत्व रखता है। इस परिवेश या वातावरण के सभी प्रमुख पक्षों को उद्घाटित करना आवश्यक हो जाता है। मसलन - राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक पक्ष अंतनिर्हित होते हैं।

भारत में सामाजिक, पारिवारिक संबंधों में बदलाव या विघटन के अनेक प्रमुख कारण हैं। इनमें प्रमुख हैं - बेकारी, गरीबी, स्वार्थता, खेती का स्रास, मूल्यों में गिरावट, भौतिकता, आधुनिकता की अंधी दौड़ एकल परिवार व्यवस्था। डॉ. ज्ञानवती अरोड़ा इनके ह्रास के प्रमुख कारण मानती है - ''आठवें दशक तक आते-आते महानगरीय जीवन में परिवार की संस्था नहीं के बराबर है। आधुनिकीकरण, नगरीकरण एवं औद्योगिकीकरण मात्र परिवार के आपसी संबंधों में ही परिवर्तन नहीं लाए किंतु परिवर्तन समाज के सभी सदस्यों के जीवन में प्रतिबिंबित हुआ। बल्कि दूसरा तीव्रतम प्रभाव पारिवारिक संबंधों पर ही पड़ा लक्षित होता है।"9

कमलेश्वर ने इस पारिवारिक, सामाजिक बदलाव और विघटन को अपनी कहानियों में उद्घाटित किया है। मेरी प्रेमिका, आत्मा की आवाज, दु:खों के रास्ते, जो लिखा नहीं जाता, अपना एकांत, तलाश, आदि कहानियों में स्त्री-पुरुष संबंधों के साथ बदलते सामाजिक रिश्तों को चित्रित किया है। 'मेरी प्रेमिका'  कहानी में प्रेम के वास्तविक रूप पर व्यंग्य किया है। प्रेम की अमरता और जान देने का दावा करने वाली कमला बड़े भाई की एक डाट पर उस प्यार से इंकार कर देती है और भाई को सूचना देने वाले रतन के पत्र में अपने प्रेमी विरेन्द्र को भला बुरा कहकर उससे नफरत करने की बात कहने लगती है। मैं बहुत परेशान हो गई। मेरा चैन मुझसे छिन गया। मैं क्या थी और क्या घबराकर शादी कर ली। और क्या कर सकती थी, यह उस समय समझ के बाहर था। यह मेरे जीवन की कितनी भयानक बिडंबना थी।10

सामाजिक समस्याएँ

 

समाज निर्माण के साथ-साथ नीति नियंताओं की कमजोर नीतियों के चलते कुछ समस्याएँ भी घर कर जाती हैं। आधुनिक काल में सबसे अधिक समस्याएँ उभरकर सामने आयी है। इनमें प्रमुख हैं - बेरोजगारी, भूखमरी, अकाल, गरीबी, आवास, नारी के प्रति दृष्टिकोण आदि। आजादी के बाद भारतीय लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के पश्चात् कुछ तो हमें पहले ही से मिली समस्याएँ थी और कुछ आधुनिकीकरण, औद्योगिकीकरण के चलते मजदूरों, किसानों, कामगारों के सामने आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इन सबको साहित्यकारों ने समय-समय पर उजागर किया है और समाज निर्माण का कार्य करने में अहम भूमिका अदा की है।

कमलेश्वर आधुनिककालीन उन कहानीकारों में से एक है, जिन्होंने अपने समय के समाज की समस्याओं को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। इन समस्याओं के उद्घाटन में कही उन्होंने सपाटबयानी का प्रयोग किया है, तो कहीं व्यंग्य एवं विडंबना की भाषा को चुना है। आजादी के पश्चात् शिक्षित बेरोजगारों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती ही गयी। कमलेश्वर ने अपनी कहानी 'दूसरे' की सुनीता के माध्यम से शिक्षित बेकारी की समस्या को उद्घाटित किया है - ''जिन दिनों कोई काम उनके हाथ में नहीं होता, तब न जाने क्यों घर पराया - सा लगने लगता है। इसलिए नहीं कि घर में कोई कुछ रहता है, बल्कि इसलिए कि इस संबंध में कोई कुछ नहीं कहता।11 'राजा निरबंसिया'  कहानी के जगपति के माध्यम से एक मनुष्य अपने मन में यह सोच बैठता है कि यह बेकारी उसके अस्तित्व को ही समाप्त कर बैठेगी। यहां मानव मन की अभिव्यक्ति है - ''उसे लग रहा था कि अब वह पंगु हो गया है, बिल्कुल लंगड़ा है। एक रेंगता हुआ कीड़ा जिसके न आँख है, न कान, न मन, न इच्छा।12

शिक्षित बेरोजगारी के साथ निर्धनता, गरीबी भी सभ्य समाज के लिए एक फोड़ा है। एक सामाजिक कोढ़ है, जो समाज में बहुत जल्दी पैर पसारता है, औद्योगिक क्रांति का सबसे बड़ा दुष्परिणाम जो सामने आया वह है - गरीबी। अनेक कामगार, कारीगर, मजदूर इससे न केवल बेरोजगार हुए बल्कि गरीबी के दल-दल में डूबते चले गए। 'देवा की माँ' कहानी में एक परित्यक्ता स्त्री की व्यथा-कथा है, जो सभ्य समाज के मुंह पर जोरदार तमाचा है। एक स्त्री स्वयं एवं अपने पुत्र की जिंदगी बसर करने के लिए दरी-पट्टी बुनकर गरीबी से संघर्ष करती है। यह गरीबी का तांडव है, जिससे गरीब व्यक्ति और अधिक गरीब बनता चला गया। अब भला गरीब व्यक्ति समाज के निर्माण में अपना क्या योगदान दें सकता है। उसका जीवन तो दो समय के भोजन जुटाने में व्यतीत हो जाता है।

बरोजगारी, गरीबी के साथ आवास की समस्या भी बहुत बड़ी समस्या है। अधिकांश लोग बिना आवास के अपनी पूरी जिंदगी व्यतीत कर देते हैं। आवास के अभाव में खानाबदोश जीवन व्यतीत करने पर अभिशप्त हैं। गाडिय़ा लुहार, झोंपड़ पट्टी में रहने वाले लोग, गंदी बस्तियों, सड़क किनारे खुले आसमान के नीचे जिंदगी बसर करने वाले अपने दिल में एक आवास का सपना लिये मर जाते हैं। यह सिलसिला निरंतर चलता रहता हैं, परंतु एक मकान नहीं बना सकते। अस्पतालों, राशन डिपो, सिनेमाघरों, यातायात के साधनों आदि में अत्यधिक जनसंख्या के चलते मकान का सपना पूर्ण नहीं हो पाता । महानगरों के विस्तार, कस्बो की तंग गलियों के चलते ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन से शहरों पर बहुत दबाव बढ़ता गया।  शुद्ध पेयजल, खाद्य पदार्थ आदि पर ध्यान नहीं गया। नतीजन गरीबों की संख्या दिनों दिन वृद्धि करती गयी। कमलेश्वर ने अपनी कहानियों में आवास की समस्या को भी आकार दिया है। 'राजा निरबंसिया'  कहानी का नायक जागपति काम की तलाश में भटकता है। जगपति मानसिक उत्पीडऩ का शिकार होता है और अंत में मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

कमलेश्वर समाजचेत्ता कहानीकार हैं। उनकी प्रत्येक कहानियों में सामाजिक सत्य का उद्घाटन हुआ है। सामाजिक समस्याओं, संबंधों तथा समाज निर्माण के प्रमुख घटकों को मद्देनजर रखते हुए आकार दिया है। समाज कमलेश्वर की कहानियों में हिलौरे लेता नजर आता है। कमलेश्वर का संपूर्ण कथा साहित्य इस बात का सबूत हैं। नयी कहानी, समांतर कहानी आंदोलन के पुरोधा कमलेश्वर सार्वजनिक भूमिका में एक कुशल शिल्पकार साबित होते हैं। समाज की रीति, नीतियों, परंपराओं की सूक्ष्म पड़ताल करने में कुशलता हासिल करते हैं।

संदर्भ:—

  1. डॉ. सीताराम 'झा' श्याम - भारतीय समाज का स्वरूप, पृ. 76
  2. मेकाइवर एण्ड पेज - सोसाइटी (ए टेक्स्ट बुक ऑफ सोशियोलॉजी) पृ. 6
  3. राइट - एैलिमैण्ट ऑफ दा सोसाइटी, पृ. 21
  4. सत्यकेतु विद्यालंकार - समाजशास्त्र, पृ. 36
  5. कमलेश्वर और कमलेश्वर- पृ. 171-172
  6. कमलेश्वर - समग्र कहानियां, पृ. 643, 664
  7. वही, पृ. 282
  8. वही, पृ. 385
  9. डॉ. ज्ञानवती अरोड़ा - समसामयिक हिंदी कहानी के बदलते पारिवारिक संबंध, पृ. 109
  10. कमलेश्वर - समग्र कहानियाँ, पृ. 325-326
  11. वही, पृ. 276-277
  12. वही, पृ. 143