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कश्मीर का लोकनाट्य : भांड़ पाथेर
October 20, 2020 • ललित कुमार सिंह

दुनिया की अधिकांश कलाएं उत्सवधर्मिता की स्निग्ध छाया में पनपी और पोषित हुई हैं । उत्सव सामूहिकता और सामाजिकता में ही फलीभूत होते हैं और इन्हीं उत्सवों में ख़ुशी जाहिर करने तथा मनोरंजन करने के लिए कलाओं को विकसित किया गया। कश्मीर प्राकृतिक सौंदर्य के लिए तो जाना ही जाता है कभी एक जमाने में कला और साहित्य का केंद्र भी था। कश्मीर की राग- रागनियों तथा कलाओं ने एक व्यापक जनसमुदाय का मनमोहित किया है। 'भांड़ पाथेर' कश्मीर का एक जनप्रिय लोक नाट्य रूप है जिसे कश्मीर का सबसे सौंदर्यवादी नृत्य भी माना जाता है। 'भांड़ ' शब्द संस्कृत रंगमंच के विदूषक या मसखरा से लिया गया है और पात्र शब्द संस्कृत रंगमंच के पात्र यानी नाटक के पात्र से लिया जाता है। कश्मीर में भांड़ पाथेर को मसखरे का नाटक भी कहा जाता है। यह एकालाप नहीं बल्कि सामाजिक नाटक है। इसमें पौराणिक कथाएं तथा सामाजिक व्यंग शामिल हैं। 'राधा कृष्ण ब्रारु' लिखते है कि "हो सकता है भांड़ पाथेर का जन्म उसी प्रकार धर्म की गोद में हुआ हो परंतु उसके वर्तमान स्वरूप को देखते हुए हम कह सकते हैं कि उसका दृष्टिकोण धार्मिक नहीं धर्मनिरपेक्ष है उसमें धार्मिक भावनाओं का नहीं सामाजिक समस्याओं का चित्रण पाया जाता है। भांड़ पाथर एक प्रकार से तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक आदि समस्याओं पर व्यंग है कटाक्ष है। इसी व्यंग और कटाक्ष के कारण ही यह कश्मीर के लोगों में सदा से इतना लोकप्रिय बना रहा है, क्योंकि उसमें उनके मनोभावों का यथार्थ चित्रण पाया जाता है।"1

( चित्र- गूगल से साभार )

भांड़ पाथेर कश्मीर की कला, संस्कृति और कश्मीरियत को अभिव्यक्त करने वाला एक सशक्त लोकनाट्य है। यह कश्मीर के जनोत्सव से जुड़ा है । कश्मीर में भांड पाथेर की परंपरा कब से है यह तो तय नहीं है लेकिन इसकी प्रदर्शन शैली के आधार पर कह सकते हैं कि इसकी एक समृद्ध परंपरा है जिसके सूत्र संस्कृत रंगमंच से मिलते हैं। रंगकर्मी 'रवि खेमू' बातचीत के दौरान कहते हैं कि भांड पाथेर की परंपरा भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के जमाने से ही प्रचलित है। इसके कई प्रदर्शन प्रयोग संस्कृत रंगमंच से मेल खाते हैं। इसमें परंपराशील नाट्य की तरह ही रामायण , महाभारत तथा सामाजिक संवाद के कथानकों को आधार बनाया जाता था। जगदीश चंद्र माथुर 'परम्पराशील नाट्य' में लिखते हैं कि " कश्मीर का भांड़जश्न संस्कृत -रूपक भाण की याद दिलाता है । किंतु , कश्मीरी भांड़ बहुपात्री और गीत तथा नृत्यों से भरपूर नाट्य है , जबकि  संस्कृत भाण एकपात्री गद्य प्रधान विधा है , जिसमें पात्र नेपथ्य की ओर उन्मुख होकर विभिन्न कल्पित पात्रों से वार्तालाप करता है।"2 कश्मीर में कई कला प्रिय और कला पारखी राजा हुए हैं जिनके शासन काल में कई कलाओं और कलाकारों को  राजाश्रय मिलता था । कश्मीर में 'ललितादित्य'  नाम के राजा का नाम विशेष उल्लेखनीय है जिनको नृत्य, संगीत और नाटक बहुत प्रिय थे । उनके शासनकाल में इन कलाओं को बहुत प्रोत्साहन मिला। कश्मीर में नृत्य, गीत - संगीत तथा नाट्यकलायें अपने पूर्ण विकसित अवस्था में थी इसके प्रमाण हमें 'कल्हण ' की राजतरंगिणी से मिलते हैं " प्रत्येक गांव में नाट्यशालायें हैं जहां नाट्य कला का प्रदर्शन होता है। वर्षा की बूंदें आने पर इन नाट्यशालाओं से दर्शकों की अपार भीड़ इस प्रकार चारों ओर बिखर जाती है जैसे राजा की सेना कहीं कूच करती हुई चारों ओर फैल रही हो ।"3 भांड़ पाथेर की कला अपने उत्कृष्टता की ओर बढ़ रही थी। कई कलाकारों को हिंदू राजाओं के दरबार में राजाश्रय भी मिलता था लेकिन इस्लाम शासकों के आने के बाद इसको कई जगह से बेदखल कर दिया गया फिर भी इसकी लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी जिससे वह  अपनी समृद्ध परंपरा को बचाए रख सका। कश्मीर में जैनुल आब्दीन, अली शाह और हसन शाह जैसे शासक भी हुए हैं जिनके शासनकाल में कलाओं को काफी प्रोत्साहन मिला है।  जैनुल आब्दीन (15वीं शताब्दी ) के दरबार में कला प्रिय माहौल होता था उसके दरबार में ही ईरान , तूरान , समरकंद ,काबुल, पंजाब तथा दिल्ली के कलाकार शिरकत करते थे। उसका दरबारी कवि 'श्री बराह' उच्च कोटि का संगीतज्ञ और कला प्रेमी था। श्री बराह ने लिखा है कि " उस समय के दर्शक और कलाकार दोनों ही साहित्य, काव्य,दर्शन आदि के पारखी थे। कलाकारों में  बहुत सी स्त्रियां भी थी जो संगीत में निपुण थीं।  उनमें कंठमाधुर्य अद्वितीय था। वे दरबार की शोभा मानी जाती थीं। प्रसिद्ध अभिनेत्री तारा और उसके अन्य साथी नृत्य और संगीत की एक - एक  ताल और लय पर गा सकते थे। उनमें उत्सवा नाम की एक सुंदर नायिका भी थी।"4 " यूं तो 14 वीं शताब्दी ही में उदरह्र्दय और रसमर्मज्ञ मुसलमान राजा जैनुल आब्दीन ने अपने दरबार में संगीतज्ञों और नटों को विशेष प्रोत्साहन दिया , किन्तु काश्मीर की विशेष नाट्य विधा 'भांड़ पथ्र ' का विकास परवर्ती राजाओं अलीशाह और हसनशाह की राज्यावधि के बाद हुआ जान पड़ता है। अलीशाह और हसनशाह ने कर्नाटक से कुछ गायकों को अपने दरबार में बुलाया और इसके फलस्वरूप अनेक कर्नाटक राग - रागनियां कश्मीर की 'मुकाम' - पद्धति में सम्मिलित कर दी गईं।"5

      

    ( चित्र- गूगल से साभार )

                                             कश्मीर में सूफी दरगाहों पर मेला लगता था जहां पर भांड पाथेर के कलाकार अपनी छिटपुट प्रस्तुतियां करते थे। वहां सूफी दरगाह पर भाड़ पाथेर  के धार्मिक कथानकों को छोड़कर उसके सामाजिक  कथानकों को संरक्षण प्राप्त हुआ जिस कारण भांड पाथेर को प्रोत्साहन तो मिला लेकिन उसके कथानकों में बदलाव आ गया। भाड़ पाथेर में दो तरह के कथानक प्रस्तुत किए जाने लगे। पहला चरित्र प्रधान ( जिसमें संरक्षण देने वाले तथा चरित नायकों ) का बखान होता था दूसरा सामाजिक प्रहसनों का। ऐसे में भांड़ पाथेर किसी धर्म विशेष का न होकर धर्मनिरपेक्ष हो गया जो सर्व धर्म सम्भाव की बात करने लगा । नाट्य निर्देशक  'एम .के रैना ' जिन्होंने कश्मीर में भांड़ पाथेर के कलाकारों के साथ कार्यशाला की है उनका मानना है कि "भांडों का धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण उनके गतिशील लोक रूप में परिलक्षित होता है , जिसमें शास्त्रीय संस्कृत थियेटर के साथ - साथ भारत के अन्य पारम्परिक लोक रूपों  के तत्व शामिल हैं । लेकिन कई वर्षों में कई पहलू खो गए हैं और अन्य में नाटकीय बदलाव आया है । हिन्दू पैदा हुए भांड इस्लाम में परिवर्तित हो गए लेकिन अपने दृष्टिकोण में धर्मनिरपेक्ष  बने रहे ।"6 कश्मीर के अनंतनाग जिले की पहाड़ियों के बीच एक भगवती का मंदिर है जहाँ पर भांड़ पाथेर के कलाकार जो कि मुस्लिम हैं एक अनुष्ठानिक नृत्य करते हैं । यह नृत्य भक्ति और विश्वास से पूर्ण होता है। इस नृत्य को 'छोक' कहते हैं। यह नृत्य मुस्लिम तीर्थ स्थलों सूफी दरगाहों पर भी प्रस्तुत किया जाता है। 

                            ऐसे कला प्रिय माहौल में ही भांड़ पाथेर  पल्ल्वित - पोषित और विकसित हुआ लेकिन एक समय अंतराल में उसमें कई तरह के बदलाव आ गए। कश्मीर में मुगल,पठान, सिख और डोंगरा शासकों ने शासन किया जिसमें से अधिकांश  शासकों ने कलाओं को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जिस कारण भांड़ पाथेर की समृद्ध परंपरा क्षीण होने लगी।  एम.के रैना बताते हैं कि 10 वीं शताब्दी के बाद का समय एक ऐसा समय रहा है जब घाटी में विदेशी आक्रमण हुए थे, सामाजिक जीवन परेशान था और कश्मीरी अपनी ही भूमि में एक गुलाम की ज़िंदगी जीने के लिए  विवश थे। जहां उन्हें विदेशी संस्कृतियों, धार्मिक और सामाजिक-राजनीतिक प्रणालियों का सामना करते हुए रहना पड़ा। यह क्रॉस एक्सचेंज राज्य की लोक परंपरा में भी आता है। लोगों के साथ होने वाले अन्याय को बेतुके या विनम्र के रूप में नाटकों में व्यक्त किया गया था, चाहे वह 'डारजा पाथर' में राजा हो या 'शिकारा' में शाही सैनिक, जो फ़ारसी में गरीब और अनपढ़ कश्मीरी से बात करते हैं और उनसे एक विदेशी ज़बान समझने की उम्मीद करते हैं जवाब न देने पर कोड़े से प्रहार करते हैं। या 'अंगरेज पाथेर' में अंग्रेजी दंपति जो शिकार पर निकलते समय रेस्टहाउस गार्ड को भाषा का उल्लसित संस्करण बोलते हैं। कश्मीर की राजनीतिक अस्थिरता युद्ध के माहौल और विस्थापन के दौर ने वहां की सामाजिक संरचना और कलाओं को बहुत प्रभावित किया। ऐसे में भांड़ पाथेर की  सामाजिक स्वीकार्यता और लोकप्रियता ही थी जिसने  जनसाधारण के बीच इसको बहुत सीमित क्षेत्रों में ही सही लेकिन जीवित बचाये रखा। भाड़ पाथेर आमतौर पर पंच सोपोर, राजौरी, पहलगाम और किश्तवार  जैसे क्षेत्रों में किया जाता है यह कश्मीर के प्रसिद्ध क्षेत्र हैं जहां कई वर्षों से इस पारंपरिक लोक नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। रवि केमू बताते हैं कि जब  पहले राजवंशो का शासन था तो भांड पाथेर के कलाकार शासकों को पूरे क्षेत्र की जानकारी देते थे , दरबारों में प्रदर्शन करते थे , शासकों के लिए आशीर्वचन बोलते तथा उनका गुणगान करते थे जिससे प्रसन्न होकर उनको बहुत सारी बख्शीस   मिलती थी। फिर जब राजवंश नहीं रहे तो उनके बाद जमींदारों के यहां भांड पाथेर के कलाकार जाते थे। उनके यहां फसलों की सुरक्षा , मानसून के संतुलन और समृद्धि के लिए प्रार्थनाएं करते थे जिससे वहाँ भी उनको बख्शीस मिलती थी। कश्मीर के भांड़ लोग गाँव से गाँव तक भटकते रहते थे और लोगों द्वारा दी जाने वाले खुद के लिए भोजन , पैसा और कपड़ा इकठ्ठा करते थे, जो उनकी आय और अस्तित्व का एकमात्र स्त्रोत था।

                  भांड़ पाथेर अभिनय , नृत्य और संगीत से परिपूर्ण पारम्परिक रंगमंच है इसकी प्रदर्शन शैली में कई ऐसे तत्व हैं जो संस्कृत रंगमंच की परंपरा से सम्बद्ध हैं। जैसे की इसका पूर्वरंग जो  संस्कृत रंगमंच की तरह अनुष्ठानिक होता है तथा इसमें परदे का प्रयोग 'यवनिका' की तरह किया जाता है। जो कहीं न कहीं कुड़ियाट्टम तथा यक्षगान की तरह लगता है। भांड़ पाथेर के कलाकार अभिनय , नृत्य तथा गीत - संगीत में निपुण होते हैं। मण्डली के नेता को 'महागुनी' कहा जाता है जो सभी कलाओं में प्रतिभा सम्पन्न होता है। भांड़ पाथेर की प्रस्तुतियां आमतौर पर खुले मंच पर की जाती हैं जिसमें सबसे पहले नगाड़े को बजाता हुआ एक कलाकार आता है और ऐलान करता है। जिससे लोगों को पता चल जाये कि यहां पर आज भांड़ पाथेर की प्रस्तुति होनी है। फिर महागुनी के पीछे सभी कलाकार कतार में आते हैं और दर्शकों का अभिवादन करते हैं। इसका प्रदर्शन मंच नुक्कड़ नाटकों की तरह होता है जिसमें चारों ओर दर्शक होते हैं और बीच में प्रदर्शन स्थल। प्रत्येक नाटक में 15 से 20 कलाकार होते हैं। इनकी पोशाकें पारम्परिक तथा पात्र के अनुकूल होती हैं। 'रवि खेमू' बताते हैं कि मंचन के दौरान अभिनेता दर्शकों के बीच से होकर आता है और वह दर्शकों से बहुत ज़्यादा इंटरेक्शन करता है। मंचन के दौरान भावों में ज़्यादा गहनता लाने के लिए कई तरह के  मुखौटों और कठपुतलियों का प्रयोग किया जाता है। 'शिकारगाह' जो एक सामाजिक प्रहसन है जिसमें जंगली जानवरों, पशु- पक्षियों को शिकारियों से बचाने की कोशिश में एक सामाजिक व्यंग है। इस नाटक में जंगली जानवरों को मंच पर दिखाने के लिए अभिनेता शेर , भालू , हिरन , बन्दर आदि कई जानवरों के  मुखौटे धारण करते हैं तथा आंगिक अभिनय द्वारा उनको मंच पर साकार करते हैं। ऐसे ही एक नाटक 'गोसाईं पाथेर' के बारे में एम. के रैना कहते हैं कि "गोसाईं पाथेर शिव और कश्मीर के शैवियों के बारे में है इसमें अभिनेता  राजाओं  या चुड़ैल के पात्रों के माध्यम से उत्पीड़न की भावना को पेश करने के लिए मुखौटे के साथ बड़े - बड़े कठपुतलियों का प्रयोग करते हैं।"7 भांड़ पाथेर के कलाकार कश्मीर से अन्य जगहों पर भी अपनी प्रस्तुतियां  देने जाते थे और वहां की कला और संस्कृति से प्रभावित होकर अपने भांड़ पाथेर में कुछ नई प्रदर्शन शैली तथा कथानकों को जोड़ते थे। जैसे कि 'ऊँट पाथर' इसमें एक पात्र को ऊँट की सवारी करते हुए मंच पर दिखाया जाता हैं। ऊँट को मंच पर लाने के लिए कुछ अभिनेता ऊँट के आकार  के बने कपड़े  के अंदर घुस जाते हैं और ऊंट का मुँह के लिये मुखौटा लगा दिया जाता है।

 (चित्र- गूगल से साभार )

"संस्कृत नाटकों में सूत्रधार प्रस्तावक का काम करता है , किन्तु आंचलिक नाट्य में सूत्रधार प्रस्तावक भी है और वाचक भी।"8 भांड़ पाथेर में मसखरे की महत्वपूर्ण भूमिका होती है उसके पास संस्कृत रंगमंच के विदूषक की तरह एक छड़ी सदैव हाथ में रहती है। वह उससे कई तरह के कार्यव्यापार करता है। इसमें एक कोड़े का भी प्रयोग किया जाता है जिसके बारे में 'रवि केमू' बताते हैं कि वह सत्ता की ज्यादतियों का प्रतीक है। इसमें 'सुरनाई' जैसे संगीत वाद्ययंत्र का प्रयोग किया जाता है जो पेशावर , ढ़ोल और नगाड़ा के साथ भारतीय शहनाई का कश्मीरी संस्करण है। भांड़ पाथेर का संगीत काफी हद तक सूफियाना संगीत से भी प्रभावित है। भांड़ पाथेर की प्रमुख भाषा कश्मीरी है लेकिन इसमें डोंगरी , पंजाबी , फ़ारसी और कभी - कभी नाटकीयता लाने के लिए अन्य भाषाओं का भी प्रयोग किया जाता है। भांड़ पाथेर के कुछ कथानक तो पारम्परिक हैं लेकिन कुछ में विकृतियां आ गई हैं। लोक कलाओं के कथानक प्रायः मौखिक होते हैं और वह इसी परंपरा में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित भी होती हैं। पीढियां अपने जीवनबोध कथानकों में जोड़ती जाती है जिससे कला परिमार्जित होती जाती है। लेकिन कश्मीर के कलाप्रिय माहौल को वहाँ की राजनीतिक अस्थिरता और तथाकथित आतंकवाद ने अशांति से भर दिया। जिस कारण एक बहुत बड़ी संख्या में भांड पाथेर के पारंपरिक कलाकार और कला रसिक विस्थापन का शिकार हुए । देश के विभिन्न क्षेत्रों में उन्हें जिंदगी की जद्दोजहद से जूझना पड़ा । जिस कारण वो अपनी कला को छोड़ कर  जीवनयापन के लिए कुछ अन्य कार्य करने लगे। लखनऊ में एक कश्मीरी कॉलोनी है  जहाँ विस्थापित कलाकारों ने बहुत पहले कुछ प्रस्तुतियां की थी। " 1904 ई० में प्रकाशित लखनऊ के गजेटियर में लखनऊ में खेलनेवाली एक कश्मीरी मण्डली का विवरण दिया गया है। यह मण्डली अपने प्रहसनों में अंग्रेजी राज की कचहरियों , पुलिस के अफसरों और गोरे साहबों के कुत्सित घरेलू  और सामाजिक जीवन का धड़ल्ले से खाका खींचती थी "9 लेकिन आज देश के कई क्षेत्रों में कश्मीरी हैं पर उनकी समृद्ध भांड़ पाथेर की परंपरा पीढ़ियों की स्मृतियों में ही है।

                                  कश्मीर के मुश्किल दौर में भी  बहुत सी पीढियां अंधेरे से लड़ते-जूझते अपने को और अपनी कला को विस्थापित होने तथा  समाज को कला विहीन होने से बचा लिया। कश्मीर की  मरणासन्न भांड़ पाथेर की कला को सक्रिय करने और संवर्धन करने में पद्मश्री 'मोतीलाल खेमू' का नाम विशेष उल्लेखनीय है। जिन्होंने भांड़ पाथेर के पारंपरिक कलाकारों  ( जो कि अपने साज - समान बन्द कमरों में रख कर किसी अन्य कामों में लग गए थे ) से बातचीत की और फिर से कला प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित किया। मृत पड़ी कला मंडलियाँ मोतीलाल खेमू की कला सक्रियता और प्रोत्साहन से प्रभावित होकर फिर से सक्रिय हो गईं। मोतीलाल खेमू ने भांड़ पाथेर के कथानकों में भी सुधार किया तथा नए सामाजिक प्रहसनों की रचना की। जिसमें कई सामाजिक पक्षों तथा समुदायों पर व्यंग है। कश्मीर में आतंकवाद और साम्प्रदायिक माहौल के चलते चलते जो अशांति हुई है उसके स्थान पर सौहार्दपूर्ण माहौल बनाने में भांड़ पाथेर के कलाकारों की महत्वपूर्ण भूमिका है। वो अपने नाटकों के माध्यम से इन पर व्यंग करते थे। जिस कारण मण्डलियों और कलाकारों को इस कला को बंद करने की धमकी भी मिलती थी। कुछ वर्ष पहले 5 भांड़ पाथेर कलाकरों की आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी। रवि खेमू बताते हैं कि इस घटना के बाद भांड़ पाथेर की मण्डलियां 4 - 5 वर्ष के लिए मृतप्राय सी हो गईं थीं। कोई प्रस्तुति नहीं हुई चारों तरफ डर का माहौल हो गया था। लेकिन जब लोगों ने अपने डर को जीतकर प्रस्तुतियां की तो 5-6 लाख लोगों ने एक साथ भांड़ पाथेर की प्रस्तुति देखी। भीड़ इतनी थी कि बमुश्किल से अभिनेताओं को मंचन के लिए जगह बची थी। ये लोगों का अपनी कला के प्रति अगाध प्रेम और लोकप्रियता थी। भांड़ पाथेर आज भी सक्रिय है लेकिन इसकी लोकप्रियता धीरे - धीरे कम हो रही है। इसका बहुत बड़ा कारण है रफ़्तार से भागती हुई ज़िन्दगी , सो कॉल्ड लोगों द्वारा इस कला को हीन भावना से देखना , पुराने कथानकों में नवाचार की कमी। भांड़ पाथेर अब कुछ अवसर विशेष तक ही सीमित होकर रह गया है। दिनों -दिन इसके दर्शकों की संख्या कम होती जा रही है। जिस कारण कलाकारों को आर्थिक सहयोग या बख्शीस बहुत कम मिल पाती है। जिससे जीवनयापन कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कई पारम्परिक कलाकार अपनी कला को छोड़कर अन्य कामों में लग गए हैं। भांड़ पाथेर में जो भी कलाकार अभी बचे हुए हैं वो ज्यादातर पुरानी पीढ़ी के हैं नयी पीढ़ी जैसे परहेज ही कर रही है। पिछले कुछ वर्षों से नई पीढ़ी के कलाकार भांड़  पाथेर की कला को प्रस्तुत कर रहे हैं लेकिन व्यापक स्तर पर अभी भी प्रदर्शन नहीं हो रहे हैं। रवि खेमू , एम.के रैना जैसे उत्साही रंगकर्मी जिन्होंने पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के कलाकारों के साथ मिलकर भांड़ पाथेर की कार्यशालाओं का आयोजन किया, जिससे उम्मीद जगती है कि इस समृद्ध परंपरा को काल कवलित होने से बचाया जा सकता है। यह कला अपने सामाजिक संदर्भों और कटाक्षों के माध्यम से एक सामुदायिक भावना विकसित करती है और एक व्यापक जनसमुदाय का दिग्दर्शन करती है।

 

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सन्दर्भ ग्रन्थ -

  1. ब्रारु'राधा कृष्ण' 'कश्मीर का लोक नाट्य भांड़ पाथर' नटरंग (अंक - 8, अक्टूबर -दिसम्बर 1968) पृष्ठ संख्या - 54
  2. माथुर 'जगदीश चंद्र' 'परम्पराशील नाट्य' बिहार राष्टभाषा परिषद , पटना, वर्ष 2000,पृष्ठ संख्या - 8
  3. ब्रारु'राधा कृष्ण' 'कश्मीर का लोक नाट्य भांड़ पाथर' नटरंग (अंक - 8, अक्टूबर -दिसम्बर 1968) पृष्ठ संख्या - 55
  4. " " " पृष्ठ संख्या - 56

5.ब्रारु'राधा कृष्ण' 'नाट्य' संगीत नाटक अकादमी - 1962

  1. www.koausa.org › BhandPather

Web results

The Bhand Pather of Kashmir - Kashmiri Overseas Association

  1. " " " "

8.माथुर 'जगदीश चंद्र' 'परम्पराशील नाट्य' बिहार राष्टभाषा परिषद , पटना, वर्ष 2000,पृष्ठ संख्या - 8

  1. माथुर 'जगदीश चंद्र' 'परम्पराशील नाट्य' बिहार राष्टभाषा परिषद , पटना, वर्ष 2000,पृष्ठ संख्या - 44

◆ साक्षात्कार-

1.रवि खेमू

.2. एम.के रैना

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परिचय - ललित कुमार सिंह

            शोधार्थी/ रंगकर्मी - हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय