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कविताएं
June 4, 2020 • नमिता गुप्ता "मनसी"

शीर्षक -   उस रोज़..

 
सहेज रही हूं..
एक-एक क्षण.. एक-एक पल
गुल्लक में 
सिक्कों की तरह !!
 
सुनों न..
अक्सर, सम्मोहित सी करती है
जब भी सुनती हूं
ये खनक !!
 
तुम..
जब कभी मिलोगे
अंतरालों के बाद ,
..हो सकता है
बीत जाएं सदियां भी !!
 
सुनों..
तुम कर सकते हो इंतजार ,
तय करनें दो मुझे भी
इंतज़ार की हदें ,
मैं ऐसे ही मिलूंगी
बिल्कुल, ठीक आज की तरह
और..
फोड़ दूंगी ये गुल्लक
उस रोज !!
 
 
शीर्षक -    आखिर क्यों..
 
कोई भी क्यों चिल्लाता है दिनभर
जागरूकता रैली के लिए ,
छोटी होती रहती हैं कतारें
और ऊ़ंघती रहती हैं ई. वी. एम. मशीनें ,
राजनीति सिर्फ बहस का मुद्दा बनीं रहती है
कान्फ्रेंस-रूम में ,
क्यों शिक्षा सिमटी रहती है 
मैरिट के लेबल में ,
क्यों किताबें परिभाषाएं हैं डिप्रेशन की..
आखिर क्या प्रमाणित करते है
ये सारे एसिड-अटैक ..
क्यों आस्थाएं बिकतीं हैं अब
चैरिटी के नाम पर ,
क्यों ईश्वर बैठा दिखता है
मंदिर सी दुकानों पर ,
और..
अब तो ये भी समझ से परे हुआ
कि क्यों लिखती हूं मैं "मन का"
तुमसे मन का कहने को !!
 
 
शीर्षक -   वो बाहर आई..
 
सभी आत्मिक दीवारों को लांघते हुए..
स्वयं के अवरोधों को झेलते हुए..
थोड़ा सकुचाते हुए
वो बाहर आई ,
अपने ही संशय और भ्रम को किनारे रख
प्रेम की निशब्दता को महसूस किया ,
मन की उफनती लहरों पर
चहलकदमी करने की कोशिश की ,
ओस की बूंदों को छुआ..
रेत पर लिख दिए
अनगिनत स्पर्श ,
.. उड़ने लगी आसमान में
पतंग सी ,
बादलों को समेंटा..
बारिशों से बात की..
सदियों से दबी आकांक्षाएं
फिर से लहराईं..
हां, सभी आत्मिक दीवारों को लांघते हुए
थोड़ा सकुचाते हुए
वो बाहर आई !!
 
शीर्षक -  कविता कभी 'जरूरत' नहीं होती..
 
कविता कभी "जरूरत" नहीं होती
ऐसा होंनें भी मत देना ,
मत जांचना-परखना उसे
डिग्रीयों के मानकों से !!
 
सुनों..
निकलतें हैं अनगिनत
थामें डिग्रीयों को ,
जरा पूछो तो..
कोई पास भी हुआ है
मन-अभिव्यक्ति के प्रैक्टिकल में !!
 
सुनों..
रटा-रटाया फोर्मूला नहीं है कविता
भावों की गहनता से गुजरना ही होता है ,
वैसे..
"शब्द" तो मिल ही जातें हैं कहीं-न-कहीं
पर, मिलती नहीं
"आत्म-अभिव्यक्ति" हर जगह !!
 
शीर्षक -    मेरे एकांत की जगहें..
 
अक्सर..
मैं नहीं होती हूं अपने "शब्दों" में भी ,
विचार-विमर्श सी करती रहतीं हैं
मेरी कविताएं
मुझसे ही ,
एक मौन आवरण
हमेशा ही ढके रहता है ,
पता नहीं कैसे टोह लिया तुमने मुझे..
देख लिया बिन देखे ही ,
और..
सोचते चले गए
मुझे बिन बताए ही !!
 
मुझसे मेरे एकांत की जगहें भी छिनती गईं !!
 
नमिता गुप्ता "मनसी"
 
 
आत्म परिचय -
नाम - नमिता गुप्ता
साहित्यिक नाम - नमिता गुप्ता "मनसी"
जन्म तिथि - 28 -4 -73
शिक्षा - एम.ए. अंग्रेजी