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लघुकथा
January 24, 2020 • किशोर कुमार कर्ण • Hindi literature/Hindi Kavita Etc.

आत्म-ग्लानि
अक्सर बाल बनाने के लिए पिताजी, मोहन नाई के दुकान पर ले जाते थे। वो कई सालों से बाल बनाता आ रहा है। पिताजी व्यवस्तत के कारण कभी- कभी नहीं ले जाते तो मैं स्वयं ही उसके दुकान पर चला जाता। 
मेरी बाल कट-कट कर नीचे गिर रही थी। एक ग्राहक अभी-अभी बाल बनवा कर उठा और बाल बनवाई के पैसे मोहन नाई के हाथ में दिया, उसने बचे हुए पैसे को दराज में से निकालकर देने लगा। मेरी नजर दराज में रखे पैसे पर पड़ी, मन ललच उठा। नजरें बचा कर उसमें से दो रूपया पचास पैसा निकाल लिया। खुशी में सोचने लगा कि इन पैसों का क्या-क्या करूॅंगा। दो पेंसिल लूंगा, एक रबड़ लूंगा, एक कॉपी लूंंगा और बाकी बचे एक रूपया उसका खेल का समान लूंगा। सोचते हुए घर आ गया। एक- दो घंटा बीता ही होगा कि नाई मेरे घर पहुॅंच गया। अब नाई मेरे पिताजी से कैसे कहे कि आपका बेटा पैसा चुराया है। उसने समय की नजाकत को देखते हुए मुझे बुलाया।- ’’रघु बेटा इधर आना तो!’’ मैं गया। उसने फिर पुछा- ’’दराज में कुछ पैसे थे, क्या तुमने उसे देखा है।’’ मैंने साफ इंकार कर दिया- ’’नहीं मैंने नहीं देखा।’’ नाई जोर - जबरदस्ती नहीं कर पाया। उसको पुरी तरह से यकीन था कि वो पैसा मैंने ही लिया है। मेरे साफ इंकार करने से वो आगे कुछ बोल नहीं सका। निराश होकर चला गया। मैं भी थोड़ी देर बाद दोस्तो के साथ खेलने चला गया। 
खेल, खेल में रमेश और दीपक उलझ गया। दोनों की नौबत मार-पीट तक पहुॅंच गई। दीपक मेरे पास आया- ’’अगर रघु बोल देगा तो मैं सच मान लूंगा।’’ ’’हॉं! रघु बोल देगा तो मैं भी मान लूंगा’’ -रमेश ने भी कहा। मुझे दोनों की बात सुनकर बहुत ग्लानी हुई। ये दोनों मुझको कितना सच्चा और इमानदार समझते हैं और मैं कितना नीच हॅूं। उस नाई की मेहनत से कमाई हुई पैसे को मैंने चुरा लिया। दोनों बार-बार रघु को झकझोड़ रहे थे। -’’बता ना क्या सही है। तुम जो फैसला करोगे वो हमदोनों मान लेगें।’’ उनकी बातों ने मुझे अन्दर तक झकझोड़ दिया। आत्म-ग्लानि होने लगी।
अगले दिन रघु उस नाई के दुकान पहुॅंचा। देखा उसका लड़का कटे हुए बाल को समेट रहा है। रघु ने पेंसिल, रबड़, कॉपी और बचा हुआ पैसा उसके हाथ में दे कर चला आया। मन का बोझ हल्का महसूस कर रहा था। नाई भी ये सब देखकर मुस्कुरा रहा था।
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भाई
दस-दस, पॉंच-पॉंच पैसा करके भाई साहब ने गुल्लक को भरे थे। लेकिन जब गुल्लक फोड़े तो मात्र एक रूपया पंद्रह पैसा ही निकला। गुस्सा सांतवें आसमान पर चढ़ गया। ’’आखिर सारा पैसा गया कहॉं? जरूर उस छोकरे का काम होगा। सारा पैसा इसमें से निकाल लिया। आज आने दो उसको, मार-मार कर चमड़ी उधेर न दी, तो मेरा नाम नहीं।’’ महेश अपनी पंतग उड़ाने की धुन में पंतग लेने आया था। भाई साहब देखते ही गरज पड़े- ’’महेश इधर आओ।’’ महेश सिटपिटाते हुए उनके सामने पहुॅंचा। चोर को पहले ही अंदेशा हो जाती है कि उसकी चोरी पकड़ी गई। सामने आकर खड़ा हो गया। भाई साहब कड़के- ’’पैसा तुने चुराई, बोल!’’ महेश कुछ बोल न सका। चुप्पी साधे रहा। जितना चुप था, भाई साहब का गुस्सा उतना ही बढ़ता जा रहा था। बेल्ट निकाली और तरातर दो-चार बेल्ट जड़ दी। फिर भी महेश कुछ नहीं बोला। इस बार भाई साहब रस्सी से खम्भा में उसको बांधे फिर तरातर बेल्ट से पिटाई करने लगे। कुछ देर तो मॉं देखती रही। फिर ममता जागते ही उसने रोकी - ’’क्या मार दोगे, इसको।’’ ’’हट जाओ बीच में से, इसे आज जान ही मार दुॅंगा।’’ मॉं के बीच- बचाव से मामला शांत हुआ। बहलाते - फुसलाते मॉं ने पूछा- ’’उस पैसे का क्या किया।’’ फिर महेश आहिस्ता से बोला।-’’कॉमिक्स खरीद ली।’’ मॉ ने आश्चर्य से पूछा- ’’सारे पैसे का कॉमिक्स खरीद लिया।’’ महेश ने हामी भर दी। 
धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ चुका था। सुबह से दोपहर हो गई। भाई साहब का भी मिजाज ठंडा हो गया था। उनको भी मारने का अफसोस हो रहा था। उन्होंने कहा-’’चलो मेरे साथ कहीं बाहर चलते हैं।’’ महेश सहमते हुए उनके पास आया। भाई साहब सिर पर हाथ फेरते बोले- ’’पैसा चुराया क्यों, मुझसे मांग लेता।’’ कह कर पुचकारने लगे। ’’चलो बाहर!’’ दोनों भाई बाजार गए। वहॉं महेश के मनपंसद की मिठाई खिलाई। चप्पल खरीद दी। भाई तो भाई ही होते हैं। छोटा भाई के लिए बड़ा भाई का प्यार उमर पड़ा। ’’देखो अगली बार से चोरी मत करना। जो जरूरत की चीज हो मुझसे मांग लेना।’’ दोनों भाई के ऑंख सजल हो चुकी थी। गले मिलकर महेश ने कहा- ’’जी भैया, अब से चोरी कभी नहीं करूॅंगा।’’ दिन भर बाजार में घूमते रहे, शाम को घर पहुॅंचे तो आसमान साफ हो चुका था। संध्या वेला की लालिमा गगन में छाई हुई थी।
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पुण्य कार्य
 शादी की तैयारी पुरी हो चुकी है। बारात द्वार पर आ गई है। सभी लोग इधर-उधर कर रहें है। बारातियों का स्वागत कैसे किया जाय, रामप्रसादजी इसके लिए बहुत चितिंत हैं। क्या करूॅं, क्या ना करूॅं। उनकी पत्नी परेशान देखकर बोली- ’’क्यों न महेन्द्रजी से कुछ पैसा उधार ले लेते हैं और लड़केवाले को जो वादा किए हैं, उसको पुरा कर देते। रामप्रसादजी-’’कितनी बार उनके आगे हाथ जोरा, पॉंव पड़ा, लेकिन वो कंजूस-मक्खीचूस टस से मस नहीं हुआ। ’’एक बार और प्रयास क्यों नहीं करते!’’-उनकी पत्नी बोली। ’’कहती हो तो एक बार और महेन्द्रजी के सामने जाकर हाथ फैलाता हूॅ, लेकिन उम्मीद कम है।’’
 हुआ भी वैसा ही, नहीं माने, कितनी ही रामप्रसादजी, महेन्द्रजी के सामने गिरगिराए लेकिन एक पाई भी उधार नहीं दिए। मायुश चेहरा लेकर वापस लौटना पड़ा। लड़केवाले भी जल्लाद निकले। अपनी पगड़ी उसके पैर के पास रख दिया, लेकिन लड़के के पिता ने पगड़ी को लात मार कर फेंक दी। पढ़ा-लिखा लड़का भी अपने बाप के आगे कुछ नहीं बोल पाया। बारात वापस चली गई। रामप्रसादजी की बेटी गीता की शादी नहीं हो पाई। पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी शादी के मंडप से बिन व्याही ही उठना पड़ा। समाज का कोई भी सदस्य मदद करने नहीं आया। खुशी का माहौल मातम में बदल गई। 
 समय बितता गया। तीन-चार माह बीत गया। रामप्रसादजी मंदिर बनवाने के नाम पर सभी से चंदा के रसीद काट रहे हैं। काफी लोग उत्साह से चंदा दे रहे हैं। गिरधारी लालजी तो पॉंच हजार रूपया अपने मन से रसीद काट कर दे दिए। अधकट्टी रसीद रामप्रसादजी, महेन्द्र बाबू को दिखाए- ’’देखिए, गिरधारी बाबू ने स्वयं पॉंच हजार की रसीद काटी है साथ ही पॉंच-पॉंच सौ के दस कड़क नोट संदूक से निकाल कर दिए हैं। उनका नाम मंदिर के शिलापट्ठ पर लिखा जाएगा। आप भी चंदा देकर पुण्य कमाइए ना!’’
 महेन्द्र प्रतापजी मुस्कुराते बोले- ’’कितना देना होगा। मेरा नाम भी बड़े अक्षरों में मंदिर के द्वार पर लिखा होना चाहिए।’’ ’’एक लाख इक्यावन हजार से कम क्या दिजिएगा। देनेवाले की तो कमी नहीं है फिर भी आपकी इच्छा, जितना चाहे दे सकते हैं।’’ ’’अच्छा! शाम को घर आइए।’’ शाम को महेन्द्र बाबू दो लाख इक्कीस हजार के चेक काट के दे दिए। देखकर रामप्रसादजी के ऑंख से ऑंसू छलक पड़े और पिछली बातें स्मरण होने लगी। उन्होंने नमी ऑंखों से चेक लिए और निकल गए। मन में कहा -’’पाप कम करने के लिए पुण्य कर रहा है, लेकिन वो भी पुण्य का ही कार्य था।’’  
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--किशोर कुमार कर्ण