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लौहपुरुष पुरुष से महका हिंदुस्तान : सरदार पटेल
April 19, 2020 • श्रीमती आशा रानी पटनायक • literature News

किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का सही तथा पूर्ण रूप से आंकलन उसकी बाहरी आकृति को देखकर नहीं किया जा सकता, बल्कि सही आंकलन हेतु आंतरिक गुणों की समुचित जानकारी होना आवश्यक है। बाहरी रूप से देखने पर उन्हें प्रतीत होता था कि सरदार पटेलह्रदय विहीनहै और मानवीय भावनाओं से उनका कोई ताल्लुक नहीं है। किंतु वे स्वभाव से निर्भय वीर और दृढ़ निश्चय थे।वे कम बोलते थे और कार्य अधिक करते थे।“पुरुषोत्तम दास टंडन के अनुसार जो उनको जानते थे बताते हैं किवह बहुत दयावान थे और मौका पड़ने पर बहुत कोमलता प्रदर्शित करते थे। उन से बढ़कर अधिक मित्र कोई नहीं है अब भरोसा करने वाला साथी पाना मुश्किल था। “1 सरदार बल्लभ भाई पटेल का व्यक्तित्व ऐसा थाजैसे गंगा नदी।जिसने जीवन भर गंगा नदी की तरह संघर्ष किया अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए गंगा की भांति पावन जल धारा में करुणा प्रेम कोमलता व जनकल्याण की भावना भरी हुई रहती है।जिस तरह गंगा अपने गंतव्य की दूरी को जल्द से जल्द पार करने के लिए उतावली रहती है उसका गंतव्य ही उसकी बेचैनी थी ठीक उसी तरह सरदार जी भी अपने गंतव्य की दूरी को जल्द से जल्द पार करने के लिए हमेशा उतावले रहते थे। अपने उद्देश्य की पवित्रता से परिपूर्ण सरदार पटेल का व्यक्तित्व भारत के करोड़ों दर्शकों और मजदूरों को गंगा की व धारा बना दिया जिसने अपने प्रवाहित जीवन में ना केवल उन्हें सुख संतोष और पुरस्कार दिया अपितु बंधन मुक्त का आत्म संतोष भी प्रदान किया।

व्यक्तित्व के निष्पक्ष के कारण यश और प्रसिद्धि के चरमोत्कर्ष को छूने पर भी वे लोकप्रियता के चरम बिंदु पर नहीं पहुंच सके जहां नेहरू जी पहुंचे थे।“2सरदार वल्लभभाई पटेल कृषक थेउनमें कृषक के जन्मजात गुण सहनशक्ति परिश्रम लगन सच्चाई और स्वाभिमान जैसे सभी गुण मौजूद थे। सेनापति बने।अनुशासन उनका आचरण था इसी कारण वे सरदारथे। अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठा लगन और उन्हें मूर्त रूप देने की तत्परता उनके व्यक्तित्व का एक उज्जवल पक्ष था जो उसकी पवित्रता और प्रतिष्ठा को बनाए रखना उसके बहुमुखी व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष था।सरदार पटेल एक दूरदर्शी व्यक्ति थे तथा आशा उनकी संगिनी रही।अपने मार्ग के औरतों को हटाने में वह एक ऐसे आक्रमणकारी थे जिनके ह्रदय में लेश मात्र भी दया भाव नहीं रहता था। फिर अपने निर्णय मत के संबंध में तर्क वितर्कशंंकाऔर संदेश को को उन्होंने कभी कोई स्थान नहीं दिया।सरदार बल्लभ भाई पटेल की पूर्ण रूप से ईश्वर में आस्था थी।वे कहा करते थे”ईश्वरी नियम अपरिवर्तनीय है। मृत्यु के संबंध में उनका विश्वास था कि मृत्यु निश्चित है।  पुण्यात्मा मनुष्य कभी नहीं मरता।राम और कृष्ण के नाम उनके कार्यों से ही अमर हैं।मौततो जन्म के साथ है और मरने के बाद दुख भी क्या होगा। इसलिए मौत का भय तो छोड़ ही दीजिए। हिम्मत होगी तो भगवान ही मदद करेगा।3अशोक मेहता ने सरदार को एक ऐसा व्यक्ति बताया जिसमें चट्टान की तरह आत्मविश्वास था।4महापुरुषों का जीवन कभी समतल रास्ते की तरह सीधा नहीं होता है। अपना मार्ग प्रशस्त करने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ता है। संघर्ष की घटनाओं में उन्होंने स्व का सर्वनाश कर दियाऔर वे सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक कल्याण की चेतना से भव्य और दिव्य बने।उन्होंने अपने निजी स्वार्थ को छोड़कर समाज देश तथा मानवता के कल्याण और सेवा के लिए लगाया।ऐसे महापुरुष पूजनीय होने के साथ-साथ जनमानस के आराध्य देवता बन जाते हैं। ऐसे महापुरुषों के सत्कर्म कभी मरते नहीं उन्हें ना कभी समय मिटा सकता है ना शस्त्र कभी काट सकता है और ना अग्नि कभी उन्हें भस्म कर सकती है।ऐसे महापुरुषों में सरदार बल्लभ भाई पटेल एवं डॉक्टर बी आर अंबेडकर अग्रणी पुरुष रहे हैं।

सरदार बल्लभ भाई पटेल देशभक्तों में एक अमूल्य रत्न थेवे भारत के अदम्य  शक्ति स्तंभ का लगातार सेवा तथा दूसरों को दिव्य शक्ति चेतना देने वाला उनका जीवन सदैव प्रकाश स्तंभ की अमर ज्योति की भांति है।उनका भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में विवादास्पद योगदान रहा है वह मितभाषी अनुशासन प्रिय और कर्मठ व्यक्ति के कठोर वस्तु में विस्तारक   जैसी संगठित कुशलता कौटिल्य की भांति राजनीतिक तथा राष्ट्रीय एकता के प्रतीक अब्राहम लिंकन जैसे अटूट निष्ठा रखते थे।इनकी तुलना मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य से की जा सकती है।इन दोनों में अंतर बस यही है कि चाणक्य ने साम्राज्य की स्थापना कीऔर पटेल ने साम्राज्यवादी सामंतवादी शासन को समाप्त कर लोक वादी बना दिया। उनके नाम से ही लोगों के मन में अनुशासन और नियंत्रण के भाव जागृत हो जाते हैं।किंतु अपने कठोर व्यक्तित्व के साथ  अपने अंतर्मन में ही कोमल भाव छुपाए हुए थे।किंतु इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को थी वह उस नारियल की तरह थे।जो ऊपर से कड़ा किंतु अंदर से नरम ।सरदार जी का व्यक्तित्व प्रेरणादायक था।वे सदा से ही चुस्त और दुरुस्त रहते तथा सूचनाओं को ग्रहण कर अपने मन में संजोकर रखते। जिस प्रकार मधुमक्खी अपने शहद को विशेष रूप से जमा करती है और तब तक जमा कर रखती है जब तक उसे उसका उपयोग करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। सरदार पटेल धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। ईश्वर के प्रति उनकी आस्था पूर्ण श्रद्धा एवं भक्ति भाव पूर्ण थी । “अशोक मेहता ने सरदार को इस बात का व्यक्ति बताया जिसमें चट्टान की तरह आत्मविश्वास था।शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता उनमें थी।कठोरता पूर्वक विधिवत उसे क्रियान्वित करने के कारण सरदार लौह पुरुष कहलाए।उनके जीवन में अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं जब छोटे थे तो उनके बगल में फोड़ा निकल गया था नाई के अलावा उसे कोई दूसरा व्यक्ति फोड़ नहीं सकता था। जब नाई सलाख को गर्म करके  फोड़े पर चीरा लगाया तो तभी सरदार बालक ने कहा देर क्यों करते होसलाख ठंडी हो रही है। उन्होंने नाई की हाथ में से सलाख  को लेकर खुद से चारों ओर घुमा कर मवाद बाहर निकाल लिया उसी समय बायोवृद ग्रामीण ने कहा अरे भाई यह कोई साधारण पुरुष नहीं यह तो विलक्षण लौह पुरुष है। 5

एक लौह पुरुष के रूप में प्रतिकूल परिस्थिति में भी साहस बुद्धि एवं दृढ़ निश्चय द्वारा ईमानदारी से अपने लक्ष्य को पूरा करने की अद्भुत क्षमता उनमें थी। तर्क वितर्क शंका   आदि को वह कभी अपने पास आने नहीं देते थे। उन्होंने स्वयं कहा है कि जो शूरवीर होते हैं वह ईमानदार भी बन सकते हैं कायर समझदार होने पर भी मेरे मन में उनके प्रति प्रेम प्रकट नहीं होता क्योंकि वह भरे पूरे समुद्र में जहाज डूबाने वाले होते हैं। कांग्रेस पार्टी के संगठन को शक्तिशाली बनाने व उसे बनाए रखने तथा उसकी छवि को सुधारने में सरदार पटेल ने लौह पुरुष के व्यक्तित्व का परिचय दिया अपने स्वास्थ्य की बिना चिंता किए वे जीवन पर्यंत कांग्रेस संगठन कोएक बनाए रखने का सतत प्रयास किया।पार्टी की नीति के विरुद्ध अनुशासनहीनता को कभी भी बर्दाश्त नहीं किया।इसी कारण डॉक्टर खरे नरीमन तथा सुभाष चंद्र बोस के कोप भोजन का शिकार हुए। श्रीमन नारायण अग्रवाल लिखते हैं कि”यदि वे पार्लियामेंट्री बोर्ड के चेयरमैन ना होतेतो कांग्रेस के कितने ही मिनिस्टर पथभ्रष्ट हो गए होते । सरदार का निर्णय कितना ठोस होता था इसके प्रमाण के लिए नरीमन और खरे उदाहरण स्वरूप हैं उनके जीवन मेंअनेक उदाहरण उनकी दूरदर्शिता का सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हैं। कश्मीर में पाकिस्तान के आक्रमण से लॉर्ड माउंटबेटन चिंतित थे परंतु सरदार ने आशा भरे शब्दों में कहा कश्मीर बचकर रहेगा। उनकी राजनीति नैतिक स्तर पर आधारित थी। उनकी नैतिकता का सबसे बड़ा प्रमाण नेहरू के संबंध में गांधी जी को दिया गया वह वचन था जिसके आधार पर उन्होंने नेहरू जी को जीवन भर अपना नेता स्वीकार किया।अपना पक्ष को रखते हुए शत्रु से भी सहज काम ले लेते थे उस समय भारतीय स्वतंत्रता के साथ देशी राजाओं को दोनों भारत पाकिस्तान से अलग रखने की छूट से अनेक देसी राजा सरदार जी के शत्रु बन गए। परंतु सरदार जी उनके दिलों को जीतकर देशी राजाओं को भारतीय संघ में शामिल करके इतिहास में एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी मृत्यु पर अनेक राजा अपने मित्र व रक्षक के ना होने से अत्यंत दुखी थे  सरदार पटेल की आर्थिक चिंतनजबरदस्त थी। उनका आर्थिक क्षेत्र में दृष्टिकोण उदार एवं यथार्थवादी था सरदार जी ने स्वयं कबूल किया कि मुझे सदैव बिरला जैसे पूंजी पतियों का मित्र होने का आरोप लगाया गया है लेकिन मैंने गांधीजी से सीखा है कि अमीर या गरीब बड़ा या छोटा सब के प्रति सहानुभूति रखो आज मैं श्रमिक उद्योगपति राजा किसान तथा जमींदार से मित्रता रखता हूं और उन्हें सही कार्य करने हेतु प्रेम पूर्वक प्रेरित कर सकता हूं।6  21 नवंबर सन 1949 को उद्योग एवं केंद्रीय सलाहकार परिषद को संबोधित करते हुए एक कुशल व्यवहारवादी अर्थशास्त्री के रूप में पटेल ने कहा”अर्थशास्त्र व्यावहारिक विज्ञान है अतः मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप समस्या के व्यवहारिक पक्ष को निकटता से देखें तथा उन उपायों की खोज करें जिनके द्वारा उपलब्ध साधनों का राष्ट्रीय विकास में उद्देश्य पूर्ण सहयोग हो सके। 7

 

सरदार जी लगभग 3 वर्षों तक औद्योगिक शांति के पक्ष में थे उन्होंने हड़ताल करने के बजाय परस्पर समझौते तथा पंच फैसले की पद्धति पर अधिक बल दिया। 1949 में पटेल ने इंडियन नेशनल यूनियन कांग्रेस को एक संदेश में कहा कि देश में जो लोग आज के संकट काल में ऐसी कार्यप्रणाली का आश्रय देते हैं जो उत्पाद को रोकते हैं वह मजदूरों और देश को हानि पहुंचाते हैं। 8

पटेल का सामाजिक न्याय संबंधी दृष्टिकोण ऐसा था कि जिन में गरीबों के रहन-सहन के स्तर को उठाने की व्यवस्था हो । इसी कारण वे भूमि सुधारों में बिनाउचित मुआवजा करने के विरुद्ध थे। सरदार पटेल को जन्मजात संगठनकर्ताकहा जा सकता है जिनका क्षेत्र सीमित था पर अपनी छोटी सी परिधि के अंदर उनकी शक्ति प्रचंड एवं व्यापक थी।उनमें हारे हुए मैदानों को विजय में परिणित करने की क्षमता थी।9अर्थात यह कहा जा सकता है कि मनुष्य उस सीमा तक शक्ति रखता है जहां तक दूसरों के व्यवहार को अपनी इच्छा अनुसार प्रभावित करने के लिए । इस प्रकार शक्तिप्रभाव का पर्यायवाची माना गया है शक्ति की पहचान के लिए हमें विशिष्ट स्थिति और उस व्यक्ति विशेष की भूमिका पर ध्यान रखना होगा शक्ति स्थिति परख होती है। सरदार पटेल का सामाजिक चिंतन गांधीवादी का पूरक है उन्होंने अस्पृश्यता को हिंदू धर्म का कलंक बताया।सरदार पटेल स्त्रियों को आत्मनिर्भर बनाने तथा पुरुषों के समान अधिकार दिलाने के पक्ष में थे। 1929 में अपनी बिहार यात्रा में किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि आपको शर्म नहीं आती आप अपनी स्त्रियों को पर्दे में रखकर खुद ही पीड़ित हैं यह स्त्रियां कौन है आपकी मां आपकी बहन और आपकी पत्नी। उन्हें पर्दे में रखकर क्या आप यह मानते हैं कि आप उसके सतीत्व की रक्षा कर सकेंगे ।उन पर इतना विश्वास क्यों आप इसलिए डरते हैं कि वह बाहर जाकर आप की गुलामी को देख लेंगे। आपने उन्हें गुलाम पशुओं की तरह ही रखा है इसलिए उनकी औलाद आज भी गुलाम पशुओं की तरह हो गए हैं मेरी माने तो मैं बहनों से कह दूं कि ऐसे डरपोक और नामर्द की स्त्रियां बनने से तो उन्हें तलाक दे देना अच्छा है10

सरदार पटेल एक धर्मनिरपेक्ष समाज के पक्षपाती थे उनका मत था कि ईश्वर एक है तथा सभी उसके हैं। धर्म ईश्वर तक पहुंचने के अलग-अलग मार्ग हैं लेकिन सबसे श्रेष्ठ मानवता है। वे अक्सर कहा करते थे कि ईश्वर ने सबको समान बनाया है तो की मालिक व दास का अंतर क्यों ? जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के समान हैं तो यही समानता की भावना समाज में व्याप्त होनी चाहिए इस तरह सरदार पटेल ने हिंदू-मुस्लिम को एक कोमल पौधा बताया जिससे आने वाले समय में अत्यंत सावधानी से पालना पड़ेगा।

अतः उपरोक्त कई कारणों से सरदार पटेल लौह पुरुष के रूप में जाने जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत वर्ष गुजरात के नर्मदा जिले में पटेल के स्मारक का उद्घाटन किया इसका नाम एकता की मूर्ति स्टैचू आफ यूनिटी रखा गया।मूर्ति स्टैचू आफ लिबर्टी से दोगुनी ऊंचाई यानी 182 मीटर ऊंची बनाई गई है। इस प्रतिमा को एक छोटे सेचट्टानीद्वीप पर स्थापित किया गया है। सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है। सरदार वल्लभ भाई पटेल को मुंबई में हुआ था उनकी मृत्यु के उपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया जो उन्हें बहुत पहले मिलना चाहिए था वर्ष 2014 में केंद्र की मोदी सरकार ने सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती 30 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाना शुरू किया। वास्तव में सरदार पटेलएकता की मूर्ति थे।

संदर्भ ग्रंथ सूची

  1. सरदारपटेलकोनेहरूकेपत्र 4 नवंबर 1947 वही नंबर 75
  2. आजाद को पटेल के तार 25 अक्टूबर 1945 26 अक्टूबर 1945
  3. 26 अक्टूबर 1945 आजाद को पटेल का तार वही नंबर 30 31
  4. आजाद पटेल को पत्र 30 अक्टूबर 1945
  5. पटेल का कामराज को पत्र 26 दिसंबर 1945 पृष्ठ 204
  6. पटेल का गांधी जी को पत्र 2 जुलाई 1946 पृष्ठ पीस
  7. बैनर्जी एंड बोस द कैबिनेट मिशन इन इंडिया पृष्ठ 167
  8. आरडी शंकर दास बल्लभ भाई पटेल पृष्ठ 251
  9. डीएन पांडे मैकमिलन 1949 पृष्ठ 195
  10. मौलाना अबुल कलाम आजाद आजादी की कहानी पृष्ठ 185

श्रीमती आशा रानी पटनायक शोधार्थी

शोध निर्देशक:डॉक्टर आरके टंडन

बस्तर विश्वविद्यालय जगदलपुर जिला बस्तर छत्तीसगढ़