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मध्यकालीन कृष्ण- काव्य में संगीतात्मकता                
December 10, 2019 •  डॉ. भवानी प्रधान  

सारांश :- भारतीय संगीत का जन्म ईसा से 8 लाख 1000 वर्ष पूर्व हो चुका था। भारतीय संगीत की नींव द्रविड़ों के संगीत पर आधारित है। द्रविड़ों को संगीत के वैज्ञानिक रूप का ज्ञान था। गायक, वादक व नर्तक तीनों प्रकार के कलाकार के मिलने से संगीत उत्पन्न होता है। संगीत की अनेक नृत्य-मुद्राओं को दक्षिण तथा ओडि़सा के अनेक मंदिरों, गुफाओं में उत्कीर्ण प्रतिमाओं के बीच तथा विभिन्न स्तूपों में स्पष्टता से देखा जा सकता है। संगीत-कला में स्वर, ताल और लय के माध्यम से गायन और वादन के द्वारा विभिन्न भाव- भंगिमाओं को नृत्य के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। संगीत हमारी आत्मा में भक्तिमय अनुभूतियाँ भर देता है।
 प्रस्तावना:-मध्यकालीन भक्ति-आंदोलन ने समस्त भक्ति-साहित्य के लिए एक भावभूमि प्रस्तुत की। इस काल में सूरदास, परमानंद दास, मीराबाई जैसे कई प्रसिद्ध गीतकार हुए। भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णिम काल है। कला, संस्कृति, दर्शन, काव्य सभी दृृष्टिकोणों से यह उत्कृष्ट है। कृष्ण-भक्ति शाखा ने तो इस माध्यम से दिग्विजय हासिल कर ली। एक समृद्ध पृष्ठभूमि पर सूरदास व मीरा के गीत अंकित हैं। मीरा-पदावली का संगीत-तत्व ही उसकी जीवन-शक्ति व सामथ्र्य का परिचायक है। संगीत-तत्व की प्रभावशीलता व सरलता के कारण मीरा के पद अनेक भक्त-गायकों, साधु-संतों के द्वारा आज भी अनेक रूप में गाए जाते हैं। मीरा का प्रत्येक पद संगीतशास्त्र की दृष्टि से वरदान है। भजन व कीर्तन परंपरा की अमूल्य निधि है। भक्ति-काव्य और संगीत की त्रिवेणी को प्रवाहित करने वाले अष्टछाप के कवियों में सूर, सिरमौर आदि थे। 
 सूरदास के भ्रमर-गीत:- सूर का भ्रमर-गीत नाना विशेषताओं से युक्त, भावमय, व्यापक और गहन विस्तृत तथ्य रागोत्प्रेरक है। भ्रमर-गीत, संगीत भावनाओं की गहनता, आत्माभिव्यक्ति तथा संक्षिप्तता की कसौटी पर पूर्णतया खरा उतरता है। उसका प्रत्येक पद गुलदस्ते के समान आनंददायक है। भ्रमरगीत सूर की उत्कृष्ट कृति है। संगीतात्मकता अनुपम विशेषता है। पदों को विविध रागों एवं तालों के अनुसार लिखा है। अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है-
 ''नहि श्रुति शेष महेश प्रजापति जोरस गोपिन गायौ।   कथा गंग लाजी मोहि तेरी उन रस सिंधु उमड़ायौ।   तुमरी अकथ कथा तुम जानौ हमें निज नाथ बिसरायौ।   सूर श्याम सुन्दर यह सुनि सुनि नैनन नीर बहायौ।।ÓÓ1
  कृष्ण-वियोग से व्यथित गोपियों के नाना भाव इसमें दृष्टिगत होते हैं। कृष्ण के विरह में केवल गोपियाँ ही दु:खी नहीं, बल्कि नंद, यशोदा, ग्वाल-बाल, पशु-पक्षी सभी भ्रमरगीत में दु:खी दिखाए गए हैं। 
सूर के लोकगीत
  कृष्ण-भक्ति शाखा के कवियों के द्वारा गीति-काव्य स्वर्ण युग के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। कृष्ण-भक्त कवि अपनी कविताओं का पाठ संगीत के माध्यम से करते थे। सूरदास के पदों में संगीत की विभिन्न राग-रागिनियों में गाया जाता है। सूरदास के लोकगीत भी प्रसिद्ध हुए हैं। कुछ अवसरों पर लोकगीत भी अनिवार्य रूप से गाए जाते हैं, जैसे- जन्म के गीत, पालना, सोहिलौ, ज्यौनार, मंगल-गीत आदि। 
 ''पालनौ अति सुंदर गढि़ ल्याउ रे बढ़ैया।    सीतल चंदन कटाऊ, धरि खराद रंग लाउ।।    बिबिध चौकरी बनाउ, धाउ रे बनैया।।    पंचरंग रेसम लगाउ, हीरा मोतिन मढ़ाउ।।ÓÓ2
  इन पदों में लोकगीत और साहित्यिक शैलियों का समन्वय संगीत के साथ रहा है। भक्ति-आंदोलन की भावभूमि में जितने भी गीति संबंधी प्रयोग हुए, वे सभी सूरदास में एक साथ मिल जाते हैं। एक समृद्ध पृष्ठभूमि पर सूरदास के गीत अंकित हैं। भक्ति-आंदोलन में लोक-जीवन के स्पंदनों और लोक-मानस के भावोद्रेकों का स्वागत हुआ हैै।
मीरा का संगीत समुच्चय
  मीरा का युग गीतिकाव्य की धारा से परिपूर्ण था, उस समय लोकगीत और लोक-संगीत की परंपरा भी विद्यमान थी। मध्यकाल में विशुद्ध शास्त्रीय स्तर पर भी संगीत का प्रचार-प्रसार हो रहा था। उस समय ज़्यादातर भजन और गीतों के रूप में संतो ंके गायन, वादन, नृत्य व भाव-प्रदर्शन बड़े पैमाने पर हो रहे थे। मीरा की संगीतात्मकता भी इसी व्यापक संगीत धारा की स्वतंत्र लहरी थी। 
 ''माई सांवरे रंग रांची।     साज सिंगार बांध पग घुंघरू, लोक लाज तज गायी।   गयां कुमत लयां साधां शंगत, स्याम प्रति जग शांची।   गाया गायां हरि गुण जिस दिण काल व्याल री बांची।    स्याम बिणा जंग खारां लागां जग री बातां कांची।   मीरा सिरी गिरधर नटनागर, भगत रसीली जांची।।ÓÓ3
  इसी प्रकार मीरा कृष्ण के अनन्य प्रेम से सराबोर होकर पैरों में घुंघरू बाँधकर नृत्य-संगीत में मग्न रहती थी। मीरा के काव्य का संगीत हृदय की गहराई से प्रवाहित हुआ है। अत: उनका संगीत आत्मध्वनि का द्योतक है। ''मीरा के पद गेय और कीर्तन प्रधान हैं, अत: उनमें स्वर, ताल, लय, गति, राग-रागिनी आदि संगीतात्मक उपादानों की सिद्धि पाई जाती है। साथ ही उनमें छंद-विधान की अपेक्षा राग-विधान मुख्य रूप में पाया जाता है। इसके परिणामस्वरूप मीरा के पद भक्तों के कष्टहार तो हैं ही, किंतु वे संगीतज्ञों के लिए विविध रागों का पावन धरोहर के रूप में सर्वमान्य और स्वीकृत भी है।ÓÓ4 मीरा के प्रत्येक पद मर्मस्पर्शी भाव, सरल भाषा, मधुर संगीत और हृदयहारी भक्ति-भावना के कारण अद्वितीय बन गई है। सूरदास व मीरा के पद मानवीय आत्मा की सृष्टि है। भक्त उसे दुहराते हैं, संगीतज्ञ गाते हैं। जन-जीवन उसमें आकंठ निमग्न होकर रसास्वादन करता है। इनके काव्य कृष्णोपासकों की पुनीत संपश्रि, संगीतज्ञों की वाणी का शृंगार और जन-जन का प्रिय काव्य है। 
 ''म्हां गिरधर आगां नाच्यां री।     गाय गाय म्हा रसिक रिझाावां प्रीत पुरातन जांच्यां री।   स्याम प्रीत से बांध धूधरया मोहण म्हारो सांच्यां री।   लोक लाज कुल रा मरज्यादां जग मां नेकणा राख्यां री।   प्रीतम पल छणणा बिसरावां मीरा हरि रंग राच्यां री।ÓÓ5
  मीरा ने अपने मधुर, कोमल, सरस अनुभूतियों को मुखर कर प्रेम-भक्ति प्रेरित पदों से संपूर्ण भारतीय समाज और विविध संप्रदायों को भी प्रभावित किया है।
 निष्कर्ष :- भारतीय साहित्य में ही नहीं बल्कि विश्व साहित्य में भी सूरदास और मीराबाई का महत्वपूर्ण स्थान है। उसी समय (अष्टछाप के कवि) वीणा के आठों तार झंकृत हो चुके थे, जिसके परिणामस्वरूप संपूर्ण ब्रजमंडल में भक्तिपूर्ण पदावली के कीर्तन से जन-मानस पर सुधा-रस की अजस्र धारा वृष्टि हो रही थी। सूर व मीरा का संगीत-तत्व जितना शास्त्रीय है, उतना ही सुगम भी है। उनमें भक्तों के लिए भक्तिपूर्ण भजन बनने की क्षमता है, तो सरस गायकों और श्रोताओं के लिए संगीत की राग-रागिनियों का रस-स्रोत प्रवाहित करने का अपूर्व सामथ्र्य भी है। इस प्रकार मध्यकाल के कृष्ण-भक्ति आंदोलन ने समस्त भक्ति साहित्य के लिए एक भावभूमि प्रस्तुत की। 

संदर्भ सूची:-
1. रावत, चंद्रभान. सूर साहित्य: नव मूल्यांकन. मथुरा: जवाहर   पुस्तकालय, संस्करण 1966, पृ. 305.
2. वही. पृ. 41.
3. तिवारी, भगवानदास. मीरा की भक्ति और उनकी काव्य साधना का  अनुशीलन. इलाहाबाद:साहित्य भवन, संस्करण 1964, पृ. 200.
4. वही, पृ. 331.
5. वही; 182.