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मर्दवादी सोच को बेनकाब करती कहानी ‘दूसरा चेहरा’
January 13, 2020 •  सीमा देवी • Research article

हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है, जहाँ स्त्री को कभी भी समान अधिकार नहीं दिया जाता। उसे दासी, पाँव की जूती, भोग-विलास की सामग्री आदि संज्ञाओं से सम्बोधित किया जाता है। इसके अतिरिक्त स्त्री की अपनी कोई पहचान नहीं। पुरुष की वासनालोलुप दृष्टि स्त्री की देह के ऊपर नहीं उठ पाई। ”पुरुष ने स्त्री के खून में यह भावना संस्कार की तरह कूट-कूटकर भर दी है कि वह सिर्फ और सिर्फ शरीर है। वह शरीर के सिवा उसकी किसी और पहचान से इनकार  करता है।“1
यदि कोई पुरुष स्त्री से प्रेम करता है तो उसके केन्द्र में स्त्री की देह ही रहती है। स्त्री द्वारा पत्नी का अधिकार माँगने पर वह उसे ही लांछित कर स्वयं इस बंधन से बड़ी आसानी से मुक्ति पा लेता है। इससे स्पष्ट होेता है कि पुरुष का प्रेम केवल दिखावा ही होतेा है, जिसका मकसद केवल स्त्री देह तक पहुँचना होेता है और बात जब स्त्री-अधिकार की आती है तब उसका प्रेम खत्म हो जाता है। आधुनिक युग में पुरुष ने उन्मुक्त प्रेम अर्थात् दैहिक सम्बन्ध को अपनी स्वतन्त्र व आधुनिक सोच का पर्याय बना लिया है और स्त्री पर भी यही सोच थोपता है किन्तु प्रेम के मायने स्त्रीेे के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। स्त्री के लिए पे्रम वही मायने रखता है जो परम्परा से रखता आ रहा है। स्त्री प्रेम को विवाह का रूप देना चाहती है यद्यपि अधिकाषतः पुरुष इसे नकारते हैं क्योंकि उनके लिए प्रेम एक प्रैक्टिकल चीज है, खेेल है और इस खेल को खेलने में वे सिद्धहस्त है। न जाने पुरुष कितनी औरतों के साथ प्रेम के नाम पर उन्हें छलता रहा है और जब तक स्त्री पुरुष के असली चेहरे से परिचित होती है तब तक बहुत ही देर हो चुकी होतेी है। सिवाय आत्मपीड़ा, आत्मग्लानि, अपमान व लांछन के अतिरिक्त उसे कुछ हासिल नहीं होता।
नासिरा शर्मा द्वारा रचित कहानी ‘दूसरा चेहरा’ उनके कहानी संग्रह ‘बुतखाना’ में संकलित एक सषक्त कहानी हे।  जिसमें लेखिका ने पुरुष के उस चेहरे को बेनकाब किया है जो उसका दूसरा चेहरा है। यानी लेखिका ने पुरुष की सोच के दूसरे पहलू को दिखाया है जो स्त्री द्वारा पुरुष से माँगे जाने वाले अधिकार के बाद बेनकाब होता है। हर व्यक्ति अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए अपना असली चेहरा छिपाकर रखता है और उसके नकली चेहरे के पीछे उसका असली चेहरा दिखाना ही इस कहानी का उद्देष्य है।
इस कहानी के माध्यम से लेखिका ने पुरुष की घृणित मानसिकता को दर्षाया है तथा पितृसŸाात्मक समाज पर सवाल भी उठाए हैं। प्रस्तुत कहानी की नायिका अपने प्रेमी से बहुत प्रेम करती है यद्यपि उसका प्रेमी उससे छल कर रहा है। वह विवाहित है किन्तु उसनेे अपनी प्रेमिका से यह कहा हुआ है कि, ”उसको अपनी पत्नी से पहले दिन से कोई लगाव नहीं रहा। यह शादी उसकी मर्जी से नहीं हुई वगैरह-वगैरह।“2 
अक्सर विवाहित पुरुष अपनी पे्र्रमिका के सामने स्वयं को बेचारा, अकेला सिद्ध करने तथा सहानुभूति पाने के लिए ऐसा प्रेम जाल बिछाता है कि स्त्री भावुक होकर बड़ी आसानी से फंस जाती है। पुरुष के प्रति यह सम्वेदना ही स्त्री के लिए घातक सिद्ध होती है। वह उसकी बातों में आकर अपना सर्वस्व उसी पर लुटा देने को आतुर हो उठती है जैसे इस कहानी की नायिका भी अपने उस छली प्रेमी के प्रेम को सच्चा प्रेम समझकर उसके साथ सपनों की दुनिया मंें खोई रहती है, ”मुझे  उसकी बातें सुनकर लगता है कि हमारा यह सम्बन्ध जल्द ही पति पत्नी के धागे मंें बँध जायेगा। उसका व्यवहार देखकर मैं अपने भविष्य के प्रति इतनी संतुष्ट हो गई थी कि मैेंने अपने पुराने रिष्ते जीने बन्द कर दिये थे।“3 वस्तुतः प्रेमी के प्रति अंधविष्वास ही स्त्री की विडम्बनापूर्ण स्थिति का कारण है। यद्यपि वह यह नहीं समझ पाती कि जिसे वह प्रेम समझती है वह मात्र छलावा है, आँखो का धोखा और कुछ नहीं।
पुरुष के लिए स्त्री मात्र भोग्या ही रहती है। वह उसकी शारीरिक भूख और थकान मिटाने का जरिया मात्र है और यदि उसे प्रेम हो, तो भी वह मात्र एक अलग छोटा सा हिस्सा होती है यद्यपि स्त्री के लिए पुरुष अपनी जिन्दगी का सम्पूर्ण हिस्सा होता है। आखिर क्यों पुरुष के लिए स्त्री अपना अस्तित्व व स्वयं को विलीन कर लेती है? इस सन्दर्भ में विवेच्य कहानी की नायिका का मन आक्रोष से भरकर सवाल कर उठता है, ”आखिर उसकी बनावट में ऐसा क्या है जो अन्धी निष्ठा, सम्पूर्ण समर्पण में बदल जाता है और वही उसको सुख देता है? क्या यह उसकी बनावट की मजबूरी है? या फिर सामाजिक संरचना का दोष है या फिर लालन-पालन का योगदान है? अपनी इसी कमज़ोरी से वह हर जन्म, हर काल, हर सम्बन्ध में पीड़ा सहती है। आँसू और उदास उसका मुकद्दर बन गये हैं आखिर क्यों?“4
स्त्री को इस बात से भली-भान्ति परिचित होना चाहिए कि वे चाहे पुरुष के समक्ष अपना सर्वस्व समर्पित कर दे, उसके आगे गिड़गिड़ाये, खुषामद करे फिर भी पुरुष स्त्री के आगे कभी नहीं झुकता। वह स्त्री को कभी भी समानता का दर्जा नहीं देता। प्रस्तुत कहानी की नायिका जब अपने प्रेमी से विवाह करने की बात कहती है तो वह तिलमिला उठता है और आक्रोष भरे स्वर में कहता है कि, ”तुम मेरा शोषण करना चाहती हो? ब्लैकमेल करना चाह रही हो? मैं अपने विवाहित जीवन से खुष नहीं हूँ, मगर मैं उसको तलाक देने के हक में नही हूँ। तुमने कैसे सोच लिया कि मैं तुमसे विवाह करूँगा?“5
स्पष्टतः पुरुष की दृष्टि में स्त्री की हैसियत दोयम दर्जे की ही है।  वह उसे तुच्छ वस्तु की तरह समझता है। उसके लिए वह केवल उसके चरणों की धूल मात्र है। जब तक उसे स्त्री को भोगने की जरूरत होती है वह भोगता है अन्यथा उसे छोड़कर अन्य औरतों से सम्बन्ध बना लेता है। पुरुष की नजर में प्रेम, इन्सानियत कोई मायने नहीं रखती। लेखिका ने विवेच्य कहानी के पात्र के माध्यम से प्रेम के प्रति पुरुष के घृणित दृष्टिकोण को भी दर्षाया है, ”मैं प्रेम शब्द को नहीं जानता कि यह क्या है? दो लोगों के साथ उठना-बैठना अच्छा लगता है। वह रहते हैं। तुम तो पढ़ी-लिखी, मार्डन लड़की हो, फिर विवाह जैसी संस्था में अपने को क्यों बाँध रही हो? प्रेम जैसी भावुकता को क्यों खोज रही हो, जबकि जानती हो कि इस शब्द ने अपना विष्वास बहुत पहले खो दिया है।“6
इन शब्दों से यह सहज ही समझा जा सकता है कि पुरुष प्रेम को प्रैक्टिकल चीज समझता है और दूसरी बात यह सामने आती है कि क्या स्त्री का मार्डन होने का तात्पर्य यह मान लिया जाए कि वह विवाह जैसे पवित्र बंधन को जकड़न या अपनी आजादी मंें बाधक माने? पुरुष की रूग्ण मानसिकता स्पष्ट करती है कि प्रेम के प्रति उसकी सोच बड़ी ही तुच्छ व नन्दनीय है।
जो पुरुष स्त्री को प्रेम करने के लिए बाध्य करता है, वहीं पुरुष बाद में उसे लांछित भी करता है। प्रस्तुत कहानी का नायक नायिका पर तीखा प्रहार करते हुए कहता है कि, ”एक तरफ सारे बन्धन तोड़कर सारी मर्यादा भूलकर मुझसे खुलेआम मेरे ही शहर मुझसे मिलने आती रही। मेरी संवेदनाओं पसे खेलती रही यह जानकर कि मैं विवाहित हूँ तो भी तुम मेरे साथ एक कमरे में सोती रही और अब तुम मेरा शोषण करना चाहती हो?“6
घोर अपमान से भरे हुए यह शब्द किसी भी स्त्री के हृदय को जख्मी व लहुलूहान कर देते हैं। जिस प्रेम और दुलार से पुरुष अपने मोह पाष में बाँधता है। बाद में उसी स्त्री से पीछा छुड़ाने के लिए उसे कितना बदनाम करता है। सच है कि पितृसŸाात्मक समाज पुरुष को सब कुछ करने की आजादी देता है।  विवाहित पुरुष को भी प्रेम व भोग विलास करने की पूरी छूट देता है किन्तु यदि कोई स्त्री प्रेम करती है  या प्रेमी से अधिकार माँगती है तो पुरुष उसे चरित्रहीनता की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देता है। पितृसŸाात्मक समाज इस मामले मंें केवल पुरुष का ही साथ देता है। इसीलिए पुरुष द्वारा छली गई औरत को न्याय नहीं मिल पाता क्योंकि ब्याह्ता केे लिए तो कानून का दरवाजा खुला है लेकिन छली गई प्रेमिका के लिए नहीं। प्रस्तुुत कहानी में जब नायिका अपने प्रेमी द्वारा छली जाती है तब उसका मन विद्रोही हो उठता है। वह अपना पत्नी अधिकार चाहती है। लेकिन उसका दिमाग तेजी से उसकी बात काटते हुए उससे प्रष्न करता है, ”अधिकार? कैसा अधिकार? धर्म, समाज, कानून किसने दिया तुम्हें अधिकार? किससे माँगोगी अपना अधिकार? उस व्यक्ति से जिसके पास मानवीय रिष्तों का अपना दर्षन है जिसकी दस्तावेज़ पर तुम्हारी तरह कई नाम अब भी चमक रहे हैं? वहाँ ठहरना मुमकिन होगा? झेल पाओगी बिना रिष्ते का सम्बन्ध, बिना प्रेम की मित्रता?“7
पग-पग पर ऐसे छली प्रेमी से स्त्री को तिरस्कार एवं लांछन ही मिलेगा, सम्मान का दर्जा य पत्नी होने का हक कभी नहीं मिलता।
इस प्रकार ऐसी परिस्थितियों में यह स्त्री को ही समझना होगा कि वह पुरुष की मानसिकता को भली-भान्ति समझ सके। उसमें यह परख हो कि जो प्रेमी शुरू से ही उससे षादी करने से बचता है वह कभी भी स्त्री से प्रेम नहीं कर सकता। प्रेम और विवाह के लिए जिसके मानदण्ड अलग हो, जो मार्डन स्त्री को दैहिक पे्रेम का पक्षपाती मानने के लिए विवष करे, स्त्री द्वारा विवाह का अधिकार माँगने पर उसे लांछित व अपमानित करे। ऐसे व्यक्ति की मानसिकता निष्चित ही घृणित व कुत्सित है।
निष्कर्ष स्वरूप यही कहा जा सकता है कि प्रस्तुत कहानी मंें लेखिका ने पुरुष के असली चेहरे से परिचित कराया है। लेखिका चाहती है कि पुरुष की इस घृणित मानसिकता का स्त्री विरोध करे तथा ऐसे पुरुषों से बच कर रहे। कहानी के अन्त में लेखिका ने नायिका को अपने प्रेमी से अलविदा होते दिखाया है, ”ट्रेन खिसकने लगी थी। गुज़रते चेहरों के बीच उसका चेहरा अब दूसरा जैसा लग रहा था। मैंने चैंक कर हाथ हिलाना बंद कर मुँह मोड़ लिया।“8
नायिका द्वारा पे्रमी के दूसरा से परिचित होना तथा मुँह मोड़ लेना इसी ओर संकेत करता है कि वह अपने प्रेमी के वास्तविकता को अब पूरी तरह जान गई थी और अब उसने इस सम्बन्ध को पूर्ण विराम दे दिया था। अतः स्त्री को समय रहते पुरुष की असलियत जान उससे बचना चाहिए।
सन्दर्भ 
1. राजेन्द्र यादव, आदमी की निगाह में औरत, पृ. 15
2. नासिरा शर्मा, बुŸाखाना, पृ. 92
3. वही, पृ. 92
4. वही, पृ. 97
5. वही, पृ. 96
6. वही, पृ. 96
7. वही, पृ. 97
8. वही, पृ. 99


   सीमा देवी
   पीएच.डी. शोधार्थी
   हिन्दी विभाग
   जम्मू विष्वविद्यालय
   जम्मू - 180006