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मिट्टी ( कहानी)
March 17, 2020 • प्रशान्त 'बेबार' • Hindi literature/Hindi Kavita Etc.

ष्वाह मिश्रा जी वाह ! क्या गाना बनाया है !ष्ए सनी सोफ़े पर बैठा हुआ अचानक टीवी की तरफ़ झुककर ज़ोर से बोला । कमरे में बैठे बाक़ी सभी ने चौंक कर देखा ।टीवी पर किसी कार्यक्रम में गाना बज रहा हैए श्उजला ही उजला शहर होगाए जिसमें हम तुम बनायेंगे घरए दोनों रहेंगे कबूतर सेए जिसमें होगा न बाज़ों का डर।ष् पीछे से सनी के पिता महेश रैना चश्मा ख़ोल से निकालते हुए बोलेए ष्अर्रेए कुछ समाचार वैगैरह लगा देए देखें तो सही देश में चल क्या रहा हैष्
पास ही टीक की कुर्सी पे बैठे दादू ने अपने चश्मे में से आँखें उचकाईं और बड़बड़ाएए ष्जिस मुल्क का दम घुट रहा होए वो कैसा चलेगा भलाए हुँह !श् सनी ने बेमन से रिमोट में नंबर ढूंढे और लगा दिए समाचार । रोज़मर्रा की ख़बरें आईं और फिर मौसम के हाल चाल । नीचे चेन्नई से शुरू होते.होते जब तक समाचार पढ़ने वाला कश्मीर के मौसम तक पहुँचताए दादू अपनी छड़ी उठा अंदर कमरे की तरफ़ चल दिए। मौसम पसन्द नहीं आया या देश के हालातए मालूम नहीं । 

दिगम्बर लाल रैना यानी दादू अपने बेटे महेशए बहू राधा और पोते सनी के साथ ही दिल्ली के शास्त्री नगर में रहते हैं । सन 90 के शुरुआती सालों में जब लाखों कश्मीरी पंडितों ने वादी छोड़ी थीए उसी वक़्त दादू भी अपने बेटेए बहू और तीन महीने के पोते के साथ दिल्ली में आ गिरे थे । सन श्92 से अब तलक कुछ सनी बड़ा हुआए कुछ बड़े हुए खिड़की.दरवाज़े और घर के कमरे । फिर भी सनी की माँ राधाए अकायस ही कहती रहतीए ष्कश्मीर में हमारे घर में सत्रह दरवाज़े थेए अब लगालो कमरे कितने होंगे ।ष् शाम रोज़ इसी तरह बीता करती टीवीए गानेए मौसम और दादू ।

सुबह उठते ही सनी को काम पे जाने की जल्दी होती। अभी अभी कॉलेज पूरा हुआ ही था कि सनी ने काम पकड़ दिया। ष्आज भी इतनी सुबह बुलाया है घ् और ये क़मीज़ कैसी अजीब सी हैए कुछ सोबर सा पहनए सफ़ेद क़मीज़ पहन लेए अच्छी लगेगी ।ष्ए राधा कमरे में घुसते ही सनी से बोली।ष्सफ़ेद नहीं माँए बहुत श्बोरिंगश् लगता हैए जनाज़े का रंगष्ए सनी ने आईने में बाल सँवारते हुए जवाब दिया और फ़ौरन ही अपनी बाइक को रॉकेट बना घर से निकला ।
ष्कहाँ हो यार मेघाए जल्दी आओ। मैं गली के कोने पे ही खड़ा हूँष्ए सनी कान पे फ़ोन लगाए यहाँ वहाँ देखने लगा ।ष्वाह ! पंजाबनए क्या लग रही हो ! ऑफिस में सब देखते रह जाएंगे।ष्ए सनी मेघा के आते ही मुस्कुराकर बोला। मेघा और सनी दोनों कम ही वक़्त में एक दूसरे के क़रीब आ गए और एक दूजे के साथ वक़्त बिताने लगे । ष्यारए तुम न होती तो मेरा क्या होता !ष्ए कहकर बाइक में किक मारी सनी ने। मेघा ने सनी को कसकर पकड़ा और देखते ही देखते दोनों धुआँ हो गए ।

महेश और सनी के दफ़्तर जाने के बाद राधा घर का काम निपटाकर जो भी वक़्त मिलता कश्मीरी फिरन ;पैरहनद्ध बुनती रहती । कश्मीरी कढ़ाई में बड़ी माहिर थी। ष्अरे राधाए मेरा मफ़लर देना ज़राए यहाँ तो सर्दी कम धुंध ज़्यादा हैष्ए कहते कहते दादू हॉल में छड़ी टिकाकर दाख़िल हुए । राधा बुनाई सोफ़े पे पटककर फ़ौरन उठी और दादू का हाथ पकड़ कर कुर्सी पर बिठाने लगी।ष्पंडितजीए आप यहाँ बैठोए मैं लाती हूँ अंदर सेष्ए राधा ने तसल्ली देकर कहा।चूँकि महेश बचपन से ही अपने पिता को पंडितजी कहता था सो राधा भी कह निकली। महेश की ये आदत उसे उसके गाँव और अपनी माँ से मिली। पहले सभी घाटी में उन्हें पंडितजी ही कहते थेए वो तो एक दौर ही ऐसा आया कि सब बस श्पंडितश् कहने लगे। शायद इसीलिए महेश और राधा ने उन्हें कभी पंडितजी कहना नहीं छोड़ा। दादू ने मफ़लर लपेटा और बड़े इतरा के बाहर टहलने निकल गएए अक्सर शाम पाँच बजे इसी तरह निकला करते । फिर यूँ ही कई शामें ख़र्च हो गईं। एक रोज़ बड़ी बेचैनी में लौटे और बोलेए ष्ये घर के बाहर खड़िया से कैसा निशान बना है और जाने क्या क्या नंबर लिखे हैंए समझ नहीं आ रहा। राधाए देखना ज़रा। आओ जल्दी आओ। आने दो महेश कोए पूछता हूँ घर की किश्त दी कि नहींए कल को कोई आ धमका तोए हे भगवानए हे ईश्वर !ष् राधा थोड़ी सी चिड़चिड़ाकर बोलीए ष्एक मिनटए एक मिनट।श् गौर से दरवाज़े को देखाए फिर गहरी साँस लेकर बोलीए ष्कुछ नहीं है पंडितजीए पोलियो की दवा पिलाने वालों ने लगाया हैए कि कौन सा घर हो गया और कौन सा बाकी हैए बस। दिल्ली में होता है ऐसा । आप घबराइए मतए आइए अंदर आइए।ष् दादू दुर्गा.सप्तसती गुनगुनाते हुए घर के अंदर चले गए ।

रोज़ की तरह सात बजे जब दरवाज़े पे छोटी छोटी दो घंटियाँ बजी तो महेश के आने की आहट हुई। राधा ने दरवाज़ा खोलाए दादू बैठे टीवी देख रहे थे। चाबी रखते रखते महेश बोलाए ष्कमाल की मॅहगाई है भई दिल्ली शहर मेंए आज भट्ट साब की दुकान गया थाए वो श्कश्मीर प्रोडक्ट्सश् वाली। हैरान रह गया यहाँ के रेट सुनकरए केसर दस ग्राम हज़ारए अख़रोट बारह सौए काजू हज़ारए हद है। कहाँ मुट्ठियाँ भर.भर के यूँ ही उड़ाया करते थे। हैं न पंडितजी घ्ष् दादू ने टीवी की आवाज़ बन्द की और गर्दन घुमाकर बोलेए ष्कश्मीर की हर चीज़ महँगी हैए सिवाए इंसानी जान के।ष् महेश और राधा ने एक दूसरे को देखा और कुछ न बोले। टीवी की आवाज़ फिर से तेज़ हो गयी।

खाने के बाद राधा ने महेश को अकेले में ले जाकर बात बताई कि आज कैसे दादू इतने परेशान हो गए थे। महेश ने पूरी बात सुनी और राधा को समझाया कि ज़्यादा चिंता न करेए जिस इंसान ने रईसी के दिन जिये हों और अचानक सब उजड़ जाए तो हमेशा एक खौफ़ सा बना रहता है। एक गुम सा लम्हा बीता और महेश मुस्कुरा कर बोलाए ष्क्योंए तुम्हें याद नहीं है क्याए कैसे हम दोनों महाराज गंज बाज़ार में घंटों बिता दिया करते थे ऐश से ख़रीददारी करतेश् 
राधा भी मुस्कुराकर बोलीए ष्हाँ सब याद हैए और कैसे मेरे लिए पश्मीना लाये थे आप पंडितजी से छुपाकेए सब याद है। शादी के अगले ही दिन ऐसी चोरा.चोरी कौन करता है भला।ष् दोनों ठहाका मार के हँस दिए । महेश कुर्सी से उठने लगा तो अचानक पूछता हैए ष्ये सनी कहाँ हैए दिखाई नहीं दे रहा घ्श् राधा ने तसल्ली दी एष्बाहर गया है अपने दोस्तों के साथए देर होगी आने मेंष्
महेश ने थोड़ा रुककर एक लंबा सा श्अच्छाश् कहा और चला गया । कुछ घंटों बाद सनी कान पे फ़ोन लगाए दाख़िल हुआ ।ष्अच्छा सुनो नए अभी रात में बात कर पाओगी न प्लीज़ घ् मैं अपने कमरे में पहुँच के कॉल करता हूँष्ए सनी फुसफुसाया । इश्क़ में वक़्त सूखी रेत होता हैए फ़ौरन फिसलता है । घर की लाइटें बन्द हो चुकी थीं मग़र सनी के कमरे में जैसे हज़ार चराग़ रोशन थे। आज फ़ोन पर मेघा से शादी की बात जो करनी थी।
ष्हायष्
ष्हेल्लो जीष्
ष्यार मेघाए ऐसा लग रहा है अब भी झूले पर ही बैठा हूँए तुम्हारा हाथ पकड़ेष्एसनी तकिया गोद में दबाये बोला। मेघा खिलखिला पड़ीए ष्आज बहुत मज़ा आया ना !ष्
सनी गंभीरता से बोलाए ष्हाँए हमेशा की तरह। तुम्हारे साथ हमेशा ही अच्छा लगता हैए एक अलग सा सुकूँ मिलता हैए अलग साण्ण्ण्अम्म कैसे बताऊँ कैसा।ष् मेघा ने हिम्मत दिखाकर पूछाए ष्घर जैसा घ्ष्
सनी तकिया छटककर बोलाए ष्हाँए सही कहाए घर जैसा सुकूनए जैसे हम घर में होते हैं बेपरवाह बेख़ौफ़ए सब अपना साए कुछ भी कह सकोए कुछ भी सुन सको। और तो और तुम जब भी साथ बाहर जाती होए मेरे लिए पानी की बोतल संग लेके चलती हो। चलता फिरता घर ही तो हो तुम मेराए हाँ ! सच मेघाए यू आर माई होम डार्लिंगष्
ष्तुम भी तो मेरा कितना ध्यान रखते हो सनीष्
ष्मेघाए चलो ना जल्दी से शादी करते हैंए फिर साथ रहेंगेए और मज़े करेंगे ज़िन्दगी भरए अपने घर को घर लाना चाहता हूँ मैंष्ए सनी ने झिझकते हुए बात पूरी की। मेघा एक पल को ठहरकर बोलीए ष्पहले घर में बात तो करोए और उससे पहले जो जॉब बदलने की बात करनी हैए वो भी करोए हम ज़रूर साथ रहेंगे जान। तुम ज़रा भी फ़िक्र मत करो।ष्
ष्हम्मए कल छुट्टी है सोच रहा हूँ बात शुरू करूँ मौका देख करए ख़ैर कल देखता हूँ सुबहए तुम बिल्कुल चिंता न करो।ष्ए सनी ने भरोसा जताया। मेघा ने शरारत करके सनी का मूड ठीक किया और रोज़ की तरह दोनों दो बजे फ़ोन रखकर सो गए।

सुबह से ही घर पे हलचल मची थी। सनी नाश्ते के लिए आया और बोलाए ष्क्या हो रहा हैए कोई आ रहा है क्या घ्ष् अंदर से राधा की आवाज़ आयीए ष्हाँए जम्मू वाले तेरे पृथ्वी चाचाश्
ष्ओह्हए अच्छा ।ष् नाश्ता ख़त्म करते करते सनी किसी सोच विचार में पड़ गया था। राधा और महेश भी नाश्ता शुरू कर चुके थे। दादू अपने पीतल के छोटे गिलास में कहवा पीने में मशगूल थे।
ष्मम्मी मैं कुछ सोच रहा थाष्ए सनी ने हल्के स्वर में बात रखी।
ष्क्या हुआ घ्ष्
ष्एक नई जगह काम शुरू करने का सोचा हैए अच्छी कंपनी हैए अच्छा पैकेज हैए और फिर वीज़ा के लिए भी मान गए हैं तो अच्छा रहेगाष्ए सनी ने बात पूरी की ।
ष्वीज़ा घ्ष्ए दादू चश्मे में से झांककर बोले।
ष्हाँए यूण्एस कम्पनी हैए तो वहाँ का भी काम देखना होगा और यहाँ का भीण्ण्ण्कभीण्ण्ण्कभार।ष् राधा ने निवाला नीचे रखते हुए पूछाए ष्बेटा यहाँ दिल्ली वाली कंपनी में कोई दिक्कत है क्या घ्ष्
ष्नहीं मम्मीए बस आगे का भी तो देखना हैष्
दादू सख़्ती से बोल पड़ेए ष्और जो पीछे रह जायेगाए उसका क्या घ्ष्
ष्क्या पीछे दादू घ् इंसान आगे नहीं बढ़ेगा क्या घ् हमेशा घर से ही बंधके रहे बसष्ए सनी भी गरम हुआ। महेश ने बीच में ही बात काटीए ष्वो सब बात ठीक हैए लेकिन तुम्हारी शादी का भी तो देखना हैए कम से कम इंडिया में ही ऑप्शन देखलो। घर के पास भी रहोगे।श् सनी तमतमा गया। 
ष्पापाए होम इज़ ए फ़ीलिंग । जहाँ मान लोए वहीं घर है।श् अब दादू का पारा चढ़ गया। 
ष्अजी हाँ ! ज़रूर ! दुनिया पागल है जो अपनी ज़मींए अपनी मिट्टी से जुड़ी रहती है। घर क्या होता है ये उनसे पूछ जिसका कभी छूटा हो। तू तो अपनी माँ के पेट में था जब हम तीनों अपना एकड़ों में फैला घर और बगीचा छोड़कर जम्मू में आ छुपे थे। वो तो शुक्र है पृथ्वी लबरु का जो हमें पनाह दी और फिर महेश ने दिल्ली में पैर जमाये। तू क्या जाने क्या गँवाया है हम सबने ।ष् कहते कहते दादू की आँखों से आँसू फूट पड़े। 
सनी ने भी नाख़ुश होकर जवाब दियाए ष्ये अच्छा हैए जो बीत चुका बस उसी पर रोते रहेंए आगे बढ़ने का सोचें ही न। सब अपना घर छोड़ते हैंए लड़की शादी के लिएए लड़का नौकरी के लिएए इतनी बड़ी बात क्या है घ् व्हाट्स द बिग डील घ्ष्
दादू तपाक से बोलेए ष्बिग डील है. हालात । फ़र्क इस बात से पड़ता है कि घर किन हालातों में छोड़ा है।ष् सनी लाल चेहरा लिए कुर्सी से उठा और अपना फ़ोन और मोटरसाइकिल की चाबी लेकर बड़बड़ाता हुआ निकलाए ष्इस घर में किसी से बात करना ही बेकार है।ष् दरवाज़े की ज़ोर की धड़ाक ने हॉल में चुप्पी बिखेर दी। दादू के होंठ कंपकपाने लगे तो महेश ने फ़ौरन संभालाए राधा ने पानी दिया।महेश ने कंधे पे हाथ रखके समझायाए ष्पंडितजीए आप अपना दिल न दुखायेंए सनी तो बच्चा हैए नासमझ है। उसे कुछ पता ही नहीं है कि घर की एहमियत क्या है। आप ही के कहने पर हमने उसे कोई भी बात ज़्यादा गहराई से नहीं बताई कि कहीं गुस्से में आकर कोई ग़लत रास्ता न चुन लें।ष् दादू और राधा ख़ामोश थे। थोड़ी ही देर में दादू ने चुप्पी तोड़ी। 
ष्अपने बाप दादा के समय से उसी आँगन में पला था हम सबका बचपन। महेश का भीए बिट्टी का भी। जितना वहाँ जीने की ख़्वाईश थी उससे कहीं ज़्यादा वहाँ दम निकलने की।श् तीनों की आँखों में आँसू छलक उठे और यादें बहने लगीं। कब उन्नतीस साल पहले फिसल गिरे मालूम ही नहीं हुआ । 
......
मई 1991ए कश्मीर रू
आँगन में महेश पंडितजी के साथ बाड़ा.बंदी कर रहा था और बहन बिट्टी औऱ नई बहू राधा माँ के साथ काम में हाथ बँटा रही थीं। तभी बाहर से दौड़ते हुए पड़ोसी शम्भू नाथ आया। हाँफते हुए एक ही साँस में उफ़न पड़ाए ष्अरे पंडितजी गज़ब हो गया। कोहराम मचा है कोहराम । लाल चौक चौराहे पे सुबहण्ण्ण्वो नवीन भट कोण्ण्ण्वो३३ष्
ष्क्या हुआ लाल चौक पर शम्भू घ्ष्ए पंडितजी ने करीब आ गर्दन एक तरफ झुकाकर शम्भू के कंधे पे हाथ रखकर पूछा। महेश और बिट्टी ध्यान से सुन रहे थेए नवीन भट उनका कॉलेज सीनियर था और पड़ोसी भी। शम्भू ने बदहवासी में बताया कि चार उग्रवादियों ने सुबह लाल चौक पर नवीन को गोलियाँ मारी और हाथ पैर शरीर से अलग कर दिए। उसकी लाश उठायी नहींए बीनी गयी थी। उसके घरवाले तो ऐसे पागल हुए कि फ़ौरन ही चिता जलाने का इंतज़ाम किया गया। तभी बीच में किसी ने उसकी कटी उंगलियाँ लाकर दीए अँगूठी पहचानकर । वो भी जलती चिता में बीच में ही डाली गईं जैसे हवन में कोई लकड़ी डालता है बीच बीच में। किसी ने भीड़ में से पूछाए ष्नवीन का कोई झगड़ा हुआ था क्या आतंकियों से घ्ष्
एक दुकान वाला बोलाए ष्नहींए बस उसने कहा था कि वादी मेरी जन्मभूमि हैए मैं अपना घर क्यों छोड़ूँ भला!ष्
वाक्या सुनकर तीनों औरतें सिहर गईं। सभी वादी छोड़कर जम्मू जाने की ज़िद करने लगेए सिवाय पंडितजी के। जाने से पहले रुपयों पैसों के इन्तेज़ामात के लिए पंडितजी ने बगीचे बेचने की ठानी सो महेश को साथ लेकर पास ही के सोपोर कस्बे में चल दियेए किसी व्यापारी विशाल धर से मिलने। घर पर नई बहू राधाए बिट्टी और उसकी माँ को महफूज़ कर गएए एक पहलवान नौकर की रखवाली में। नौकर बाड़े में सेब तोड़ रहा थाए बिट्टी बोरी में भर रही थी। तभी तीन लोग मुँह पर काला कपड़ा बाँधके अंदर घुसने लगे। हाथ में एण्के.47 थी और बिट्टी की जानिब इशारा किया। नौकर रोकने के लिए लट्ठ लेकर आगे आया तो तीनों ने तीन तीन गोलियाँ मारी। पूरी गली गूँज उठीए पड़ोस की कोई खिड़कीए कोई दरवाज़ा न खुला। बिट्टी एक कोने में खड़ी काँपती रहीए माँ ने राधा को ऊपर अटरिया में छुपाया और ख़ुद रसोई से बड़ा चाकू लिए आँगन में दौड़ पड़ी। तीनों ने अपनी बंदूकें कंधे पे डाली और नौकर की लाश को खींचकर बीच में लाये। उसके माथे के बीचों.बीच एक एक गोली और मारी और फिर तीनों ने मिलकर उसपे पेशाब किया। 
बिट्टी और उसकी माँ सुन्न पड़ गए। तीनों में से एक दाढ़ी वाला आदमी कपड़ा हटाकर उनकी तरफ बढ़ने लगाए बाकी खड़े दोनों जिहादी ज़ोर ज़ोर से हँसने लगेए उनकी आँखों में वहशियत की झेलम तांडव कर रही थी। एक बिजली सी कौंधी और अचानक माँ ने चाकू से बिट्टी का गला रेंत दियाए ख़ून का फब्बारा फूटा और आँगन में सन्नाटा पसर गया। तीनों वापस लौट गए। उनकी जीप के पीछे पीछे बिट्टी की माँ बहुत दूर तक भागी और फिर कभी वापस नहीं आयी। 
........
जैसे ही पुरानी यादों की शिकस्त ढीली हुई तो वर्तमान ने जकड़ लिया। दादू और राधा को तो जैसे दौरा पड़ा हो। महेश ने समझाया कि वो सनी से बात करेगा कि अपनी मिट्टी से दूर न जाये। उस रात सनी घर नहीं आयाए बस फोन कर दिया कि दोस्त के घर रुकेगाए कुछ काम है। सनी टहलते हुए माथे पर हाथ फेरे बात करता हैए ष्नहीं नहीं यारए घर नहीं गया। प्रोजेक्ट का काम हैए सिन्हा के घर पे ही हूँ। प्लीज़ खाना खाके ज़रूर बात करनाए बहुत मन है।ष्
ष्सनी तुम ठीक से रहनाए किसी भी बात की चिंता मत करना। अच्छाए तुम अपने घर पर हमारे बारे में बात करो न। यहाँ मैं भी मौका देखके मम्मी से बात करूँगी।ष्ए मेघा ने समझाया। सनी ने गहरी साँस भरते हुए कहाए ष्हम्मए करता हूँ कल घर जाके।ष् एक लम्हा ठहरा और अलसायी सी आवाज़ में बोलाए ष्पता है मेघाए जब तुमसे बात कर लेता हूँ तो बड़ा चैन पड़ता हैए सुबह से अजीब सा लग रहा थाए अब सुकून है। थैंक यू मेघा ।ष्
ष्ओह्ह हो बाबाए कैसा थैंक यू। तुमने ही तो कहा था कि मैं तुम्हारी दुनिया हूँ जहाँ आकर तुम ठहर जाते होए घर जैसा सुकून मिलता है।ष्ए मेघा ने भी अलसायी सी आवाज़ में और ज़्यादा प्यार से जवाब दिया। 

अगले दिन जब सनी घर आया तो बात करने के बहाने तलाशने लगा। राधा समझ गयीए पूछ लिया कि माजरा क्या है।थोड़ा झेंपते हुए सनी ने दिल की बात बता दी। राधा ख़ुश हुई और महेश को मनाने की ज़िम्मेदारी भी ली। दादू को पता चला तो उन्हें भी जाने क्यूँ अजीब सी खुशी हुई। चेहरे पे राहत के निशान खिंच गए। महेश को बस एक ही बात खटकी कि लड़की भी तो अपने घर पर बात करे। सब सुलझने लगा। पूरा हफ़्ता मसरूफियत में गुज़रा । काम के चलते मेघा के फ़ोन का जवाब देना भी दुश्वार हो रहा था। सनी मेघा को खुश करने के लिए मिलने चला गया। सनी को बड़ी हैरानी हुई कि मेघा आने के लिए सहज ही तैयार नहीं हुई। 
ष्क्या हुआ यार ! क्या बात हैघ् फ़ोन भी नहीं उठाया। सब ठीक तो है घ्ष्ए सनी ने मेघा का हाथ पकड़ कर पूछा। अचानक मेघा ने हाथ छुड़ाया और मुहँ फेरकर बोलीए ष्सनीए मैं तुमसे अब नहीं मिल सकती बस। हम शादी नहीं कर सकते।ष्
सनी को कुछ समझ नहीं आयाए वो हड़बड़ाने लगाए ष्लेकिनण्ण्ण्ऐसे कैसे मेघाण्ण्ण्सुनो मेरी बात सुनो३ण्तुम ण्ण्ण्तुम मेरी दुनिया होए मेरा घर होण्ण्ण्तुम सब छीन रही हो ण्ण्मेरा प्यारण्ण् सब कुछ ।ष् सनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गईए वो रोयाए बिलखा और बात में बात बढ़ती चली गयीए झगड़ा बड़ा हो गया । दोनों पीठ फेरकर लौटने लगेए मेघा सपाट चेहरा लिए और सनी माथे पे लकीरें। सनी रात को बेसुध होकर घर लौटा और बिस्तर में समा गया। गहरी नींद में सो गया शायद।

ष्नहींण्ण्ण्नहीं ऐसा मत करोए मैं मर जाऊँगा। सुनो मेरी बात तो सुनो।ष् एक आदमी गिड़गिड़ाता है। हाथ जोड़कर कांपता है और ज़बाँ से बिलखता हैए ष्मेरी दुनियाए मेरा सुकूँए सब ख़त्मए सब बर्बाद हो गयाश् आँखों के आगे अँधेरा बढ़ता जाता है और किसी साये के कदम दूर जाते मालूम होते हैं।अचानक नींद टूटी। ष्उफ्फ !सपना था।श्

दादू घबराकर उठ बैठे। दादू का सफ़ेद कुर्ता पूरा पसीने से गीला था। बिस्तर पर बैठे बैठे ही सिसकने लगे। तभी बाहर हॉल के अंधेरे में बैठा सनी दादू के कमरे में दाख़िल हुआए दादू के बिल्कुल क़रीब जाकर बैठा। दादू के हाथ पर हाथ रखा और उनका सर अपने कंधे पे रख लियाए जैसे कभी दूर नहीं होगाए मगर ज़बाँ से कुछ न बोला। देर रात तलक दादू के आँसू सनी की सफ़ेद शर्ट भिगोते रहे।  

अगली सुबह नाश्ते पर सनी ने सबको बताया कि सभी अपने ज़हन से मेघा और उसके देश से बाहर जाने की बातए दोनों को निकाल दें। बाकी तीनों थोड़ा चौकें मग़र कोई कुछ न बोला। सनी पहले बेचैन रहाए फिर बेपरवाह और फिर धीरे धीरे रोज़मर्रा हो गया। मई गुज़रा जून आने वाला थाए दादू चौरासी साल के होने को थे और देश में भी नई सरकार ने जन्म लिया था। कुछ हालात बदलेए कुछ हुक्मरांए अब श्रीनगर और कश्मीर घूमने फिरने जाने वालों के लिए तो खुला ही था। सनी ने दादू को एक दफ़ा कश्मीर लेके जाने का फैसला किया। महेश और राधा ने भी कोई ऐतराज़ नहीं जताया। वैसे भी दादू आजकल ज़्यादा ही बेचैन रहने लगे थेए पहले की तरह शाम की सैर पे जाना भी बंद कर दिया था। दादू को सनी की कश्मीर जाने वाली बात का पता चला तो वह समझ नहीं पाए कि ख़ुश हों या दुखी। बहरहालए हफ़्ते भर बाद दिल्ली से फ्लाइट में बैठकर सीधा श्रीनगर आ गए। जब टैक्सी में बैठे तो बोलेए ष्अख़बार में पढ़ा था कि कश्मीर में अब पर्यटक सैलानी बढ़ गए हैंए मगर सबने फौजी वर्दी क्यूँ पहनी है यहाँ घ्श्

टैक्सी ड्राइवर ने बस पीछे मुड़कर देखा। घड़ी की लगभग आधी गिनतियाँ और पूरे चेकपोस्ट पार करके दादू अपने गाँव पहुँचे । सनी ने पहले ही महेश से सारी जानकारी इकट्ठा कर ली थी। थोड़ी सी तफ़्तीश के बाद आख़िरकार दादू ने अपना घर पहचान लियाए पड़ोस के कई घर आग लगने से काले पड़ गए थे। दादू ने घर क्या देखाए पलक तक न झपकी। वही नीला लोहे का फाँटकए अब बस किनारे की तीन पत्तियाँ उखड़ गई थीं। फाँटक से कमरे के बीच में फैली कच्ची ज़मीन मिट्टीए घास और वही सेब के पेड़। अब घर किसी अबु बक़र का मकान था। सनी ने मकान.मालिक को बताया कि वो पहले यहाँ रहा करते थे तो बस घर देखना चाहते हैंए ज़रा सी यादें ताज़ा करनी हैं। मकान.मालिक ने हिचकिचाते हुए हामी भरी। कमरे की दीवारों को छूते हुए दादू की आँखें छलक गईंए अब पुताई बदल गयी थी। मकान.मालिक की हिचकिचाहट बढ़ने लगीए सनी ने भांप लिया। पास ही रखी आराम कुर्सी को बाहर कच्चे में डालने की गुज़ारिश की और कुछ तस्वीरें खींचने की ख़्वाईश ज़ाहिर की। दादू बाहर घास मिट्टी के बगीचे में कुर्सी पर बैठ गए। सनी ने आँगन में देवदर लकड़ी से की गई बाड़ा.बंदी की तस्वीरें खींचींए कैमरा लेकर बाहर आया और एकाएक रुक गयाए पीछे से दादू को देखकर । दादू ने चमड़े की चप्पल उतारकर पैर घास में रखे हुए थे और सीधे हाथ की मुट्ठी में मिट्टी दबा रखी थी। सनी मुस्कुराकर आगे बढ़ा और कुर्सी पर बैठे दादू के कंधे पर हाथ रखा। 

देखा तो दादू की आँखें खुली रहीं और गर्दन एक तरफ लुढ़क गयी। मिट्टी के हाथों में से मिट्टी सरक रही थी। सालों गुज़र गएए सनी के पैरों से भी मिट्टी कभी नहीं छूटी। 
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