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मुक्त रचना....
April 6, 2020 • सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता "

मुक्त रचना....

एक बार जो पर्दा हटा हिज़ाब^ का.      [घूँघट ]
मुखड़ा मुझे दिख गया शबाब^ का.   [सुंदरता ]

हुस्न तो उसका लगा जैसे गुलाब का.
उसपर था क़यामत अंदाज़े इताब^ का.[गुस्सा ]

उसे देख मन भंवरा हुआ पराग का.
सोचता हूँ पन्ना पलट लूं किताब का.

वैसे अपना अलग मज़ा है नक़ाब^ का. [घूँघट ]
क्योंकि कोई अंत नहीं है सराब^ का. [मृगतृष्णा ]

देखो वहाँ कमल खिला कोना तालाब का.
कैसा दृश्य लग रहा रात के मेहराब^ का. [अर्धचंद्र ].

अभी वक़्त नहीं किसी इंकलाब^ का.  [मुहीम ]
कोई भरोसा नहीं इस मौसम खराब का.

अच्छा लगता है गुलिस्तां^ शादाब^ का. [फूलों का बाग, हरा-भरा ]
"उड़ता "मुस्कुराना तो देख आफ़ताब^ का.[सूर्य ].

द्वारा - सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता "
झज्जर -124103 (हरियाणा ).