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नारी की व्यथा
December 10, 2019 • पंचमणी कुमारी  

नारियाँ अभिषप्त हैं, बेडिय़ो में जब्त हैं, 
कहीं पुरूषों से व्यथा, कहीं दहेज की प्रथा।
कहीं भू्रण हत्या,कहीं सत्तीत्व पर सवाल है।
कितने चिन्तको ने चिन्ता इस पर जताई है, 
फिर भी क्या नारी को मिल गई आज़ादी है़ं ? 
नारी तो आज भी लड़ रही लड़ाई है, 
जाने कितने दंश उसने समाज से पाई है।
फिर भी वह थकी नहीं बेडिय़ों के जब्त से,
तोड़ सारे बंधनों को उड़ चली आकाश में।
वह थकी न रूक सकी स्वत्व की तलाश में, 
कितनी सदी बीत गई पथ की तलाश में।
आज भी जब उसे मिल गई आजादी है, 
चारों तरफ फिर भी क्यों बंदीशें लगाई हैं।
नारी जो विनम्र है, सहती सारे दंभ है। 
यह नहीं, कि उसको इस बात का न ज्ञान है।
वह समझे व्यथा सभी, समाज की प्रथा सभी।
रावण के व्यभिचार का दण्ड क्यों सहे सीता सभी।
ऐसा नहीं नारी में ज्ञान का आभाव है,
वह अगर सहन करे तो भावना का भाव है।
इसकी भाव की परीक्षा अब लेना छोड दो,
भाव की यह बांध टूट जाए न अब यहीं।
बांध जो टूटा तो चण्डी बन कर आएगी, 
फिर बताओ सृष्टि में मातृत्व कहाँ पाओगे।
फिर कभी कोई भी सीता न बन पाएगी।
आज तो रावणों की लग रही कतार है,
कही बेटियाँ तो कहीं बहनें लाचार हैं।
चारो तरफ हवस और रावण की जय-जयकार है।
सृष्टि का है अंत या कलयुग का आधार है।
तब रावण एक था, एक ही थी सीता,
आज न जाने कितने रूपों में रावण जीता।
माँ के गर्भ में हो रही बेटियों की हत्या है।
बेटों के लिए आज भी मन्नतें आपार हैं।
एक बेटी कर रही समाज से ये प्रश्न है
बेटे और बेटियों में ऐसा क्या फर्क है।
नारी तो नदी है, जीवन की ये आधार है।
इसको न समझे कभी व्यर्थ या बेकार है। 
हाथ में बंधी चूड़ी, पायलों में पैर है।
मांग में सिंदूर और माथे पर चुनर लगी।
इसको न समझो कभी इनकी ये मजबूरियाँ।
हाथों की ये चूडियाँ तलवार जैसे शस्त्र हैं।
मांग की सिंदूर जैसे रक्त की पुकार है।
माथे पर लगी चुनर सृष्टि का ये भार है।
पैरों की ये पायलें अनहद कार्यभार हैं।
फिर भी इस समाज की कैसी ये विडम्बना।
प्रष्न के कटघरे में कैद खड़ी नारियाँ।
चारो तरफ प्रष्न से हो रहा प्रहार है
नारियाँ तो आज भी बेबस और लाचार है।
आज में कर रही समाज से यह प्रार्थना,
अब तो छोड़ दो इन्हे बंदिशों में जोडऩा।