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नए भारत का नया राष्ट्रवाद: रचनात्मक हस्तक्षेप व अपेक्षाएँ रपट :- कथाक्रम 2019  
December 10, 2019 • Dr.Mohan Bairagi

हिंदी कथा साहित्य पर केन्द्रित अखिल भारतीय आयोजन कथाक्रम श्रृंखला का सताइसवां आयोजन 'कथाक्रम 2019Ó दिनंाक 10 नवम्बर 2019 को लखनऊ में सम्पन्न हुआ। संयोजक कथाक्रम, शैलेन्द्र सागर नेे सभी आमंत्रित रचनाकारों, स्थानीय लेखकों, साहित्य प्रमियों, मीडिया बंधुओं का स्वागत करते हुए अपने पिता श्री आनंद सागर की जन्म तिथि होने के कारण उन्हें स्मरण करते हुए उनकी रचनाशीलता पर प्रकाश डाला। इस वर्ष के आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान से समादृत चर्चित लेखक एस आर हरनोट के कृतित्व पर जानी मानी आलोचक रोहिणी अग्रवाल के वक्तव्य का चर्चित लेखिका रजनी गुप्त ने पाठ किया। कथाक्रम सहयोगी मीनू अवस्थी ने सम्मान पत्र का वाचन किया। सम्मानित लेखक हरनोट ने सम्मान के प्रति आभार व्यक्त करते हुए अपने लेखकीय संघर्षों को व्यक्त किया। सत्र की मुख्य अतिथि वरिष्ठ कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि हरनोट की रचनाओं में जमीनी जुड़ाव, आम आदमी के सरोकार और यायावरी है, इसलिए महत्वपूर्ण है। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ लेखक रवीन्द्र वर्मा ने कहा कि हरनोट का रचना संसार रेणु के निकट है और उनकी कहानियों में प्रतिरोध है।  
 सम्मान सत्र के बाद 'नए भारत का नया राष्ट्रवाद: रचनात्मक हस्तक्षेप व अपेक्षाएंÓ विषय पर संगोष्ठी आरम्भ हुई जिसका संचालन युवा आलोचक डॉ0 रविकांत ने किया। इस सत्र के अध्यक्ष मंडल में वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव, प्रो0 चंद्रकला त्रिपाठी, दलित चिंतक व लेखक कंवल भारती, युवा आलोचक वैभव सिंह व कथाकार संजय कुंदन थे। विषय प्रवर्तन करते हुए वीरेन्द्र यादव ने कहा कि आज धर्म निरपेक्ष परम्परा की हत्या हुई है तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उदय हुआ है। लेखकों के सामने गंभीर चुनाती है। हमारी प्रतिरोध की परंपरा है और हमें अपनी सार्वजनिक भूमिका को समझना होगा। चर्चित कवयित्री कात्यायनी ने कहा कि आज नए राष्ट्रवाद में स्त्री नहीं है। यह पुरुषवादी सवर्ण राष्ट्रवाद है। 
 युवा आलोचक वैभव ंिसह का कहना था कि आज फेक राष्ट्रवाद फेक न्यूज फैला रहा है। राष्ट्रवाद में धर्मनिरपेक्षता प्राथमिक मूल्य है। उन्होंने राष्ट्रवाद को समझने पर बल दिया और कहा कि राष्ट्रवाद वस्तुत: संवादधर्मी होता है और असहमतियों का आदर करता है। दलित चिंतक कंवल भारती ने कहा कि राष्ट्रवाद वर्णव्यवस्था, जातिवाद आदि से जुड़ा है। अम्बेडकर पहले चिंतक हैं जिन्होंने हिंदुत्व को गहराई से समझा है। कथाकार संजय कुंदन ने कहा कि राष्ट्रवाद हिंदुओं तक सीमित नहीं है। यह उदारीकरण के प्रतिरोध की घटना है। युवा लेखक तरुण निशांत ने असहमत होते हुए कहा कि राष्ट्रवाद नया या पुराना नहीं होता। हम बुद्धिजीवी पांखडी और ढोंगी हैं। वरिष्ठ आलोचक चंद्रकला त्रिपाठी ने कहा कि धार्मिक सत्ताओं के लिए दलित और स्त्री का वजूद नहीं है। हत्यारे बलात्कारी सब राष्ट्रवादी हैं। 
 संगोष्ठी के दूसरे सत्र का संचालन बुंदेलखंड विवि के प्राध्यापक डॉ मुन्ना तिवारी ने किया और अध्यक्ष मंडल में वरिष्ठ आलोचकगण राजकुमार, बजरंग बिहारी तिवारी, प्रो0 काली चरन स्नेही, वरिष्ठ कथाकार अखिलेश व युवा लेखिका डॉ शशिकला राय थीं। डा राज कुमार का कहना था कि किसी अंश मात्र से किसी को राष्ट्रवादी घोषित करना उचित नहीं हैं। समाज की विविधता, बहुलता खत्म करके राष्ट्रवाद बना। उपनिवेशवाद के विरोध में पैदा राष्ट्रवाद बहुसंख्यकों का समूह है जिसमें अल्पसंख्यकों की चिंता नहीं होती। युवा आलोचक अनिल त्रिपाठी के अनुसार गंभीर बुनियादी सवालों से ध्यान हटाने के लिए पूंजीवाद राष्ट्रवाद पैदा कर रहा है। लखनऊ विवि के प्रोफेसर डा कालीचरन स्नेही ने  कहा कि हमें संविधान को बचाना है तभी दलितों और स्त्रियों की स्थिति सुधरेगी। डॉ शशिकला राय ने कहा कि हिंदुत्व राष्ट्रवाद से टकरा रहा है। जो गैर हिंदू हैं वे गैर भारतीय हैं।दलित मुद्दों के चिंतक बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि मनुष्य के कुछ नैसर्गिक अधिकार होते हैं। आज राज्य धर्म अर्थसत्ता का गठजोड़ बन गया है। चर्चित कथाकार अखिलेश ने कहा कि राष्ट्रीय आंदोलन के द्वंद्व से राष्ट्रवाद बना। नए राष्ट्रवाद में सत्ता से सहमति असहमति के आधार पर राष्ट्रभक्त और राष्ट्रद्रोही सिद्ध किया जा रहा है। देश भाषाओं, संस्कृतियों, धर्मों का समुच्चय होता है। नया और अभूतपूर्व भारत बनाना वर्चस्ववादी और दमनकारी सोच है।
  इस संगोष्ठी में लखनऊ के अनेक लेखकों की भागीदारी रही जिनमें प्रमु,ख नरेश सक्सेना, विजय राय, देवेन्द्र, नवीन जोशी, प्रो रूपरेखा वर्मा, सूर्य मेाहन कुलश्रेष्ठ, सुभाष चंद कुशवाहा, सुभाष राय, शीला रोहेकर, किरण सिंह, दयानंद पांडे, प्रताप दीक्षित, महेन्द्र भीष्म आदि प्रमुख हैं।
 वरिष्ठ लेखक, कवि वीरेन्द्र सारंग के धन्यवाद ज्ञापन के साथ संगोष्ठी समाप्त हुई।