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पुस्तक समीक्षा =करमजला
May 6, 2020 • महेश कुमार केशरी
पुस्तक समीक्षा =करमजला
 
उपन्यास--करमजला
लेखक- शिरोमणि महतो
प्रकाशन- अनुज्ञा बुक्स
संस्करण -पेपरबैक
मूल्य-150 रू
 
नोट - करमजला उपन्यास पर रीता देवी वीमेन्स यूनिवर्सिटी भुवनेश्वर के बाद  वर्द्धमान यूनिवर्सिटी की एक छात्रा के द्वारा  लघु शोध कार्य किया जा रहा है.
 
लगभग दो दशक पहले सन 2000 में शिरोमणि महतो जी का एक सामाजिक उपन्यास उपेक्षिता आया था, गांव की सामाजिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास था .आज दो - दशक के बाद उनका दूसरा उपन्यास करमजला आया है, ये उपन्यास भी सामाजिक -जीवन के बिंबों का सफल चित्रण है, उपन्यास का नायक है, राघव, और नायिका है विभा, उपन्यास के शुरुआत में स्कूल के दृश्य का चित्रण है, एक कमजोर समाज का लड़का कैसे अपनी कक्षा में प्रवेश करता है और मोहन नाम का लड़का राघव( नायक ) का विरोध करता है, लेकिन राघव का सर्मथन  नायिका ( विभा)करती है. नायिका के पिता माथुर सिन्हा और खुद नायक( राघव) में भी सामान्य मानवीय दुर्बलताएं  हैं, जिसे लेखक समय समय पर उपन्यास में चित्रित करते  चलता है  इसी की और कडियां हैं हरहरि सिंह  , रेशमा,  और दिवाकरन , दुलिया कामिन . नायिका ( विभा) के पिता माथुर सिन्हा विभा की मुंह बोली मौसी के साथ संसर्ग करते हैं, वहीं  राघव उपन्यास का नायक , पगली कलसी, रेशमा,  के साथ भी शारीरिक संसर्ग करता है .कोयलांचल में जहाँ, बाहरी ( बिहारियों) और लोकल ( झारखंडियों) के आपसी टकराव को चिन्हित किया गया है.वहीं, ये उपन्यास 1980  के दशक के आसपास के झारखंड और उसके आंदोलन को लेकर है, जिसके केन्द्र में, विनोद बिहारी महतो, और शिवा महतो हैं. एक प्रसंग में शिवा महतो कहते हैं -" कैसे लोगे झारखंड " ,  जबाब होता है," लडकर लेंगें झारखंड! "! राघव को विभा अक्सर पढने- लिखने और कुछ बडा़ बनने के लिए बार-बार प्रेरित करती रहती है. एक प्रसंग में नायक फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन से प्रभावित होकर फिल्मी दुनिया में जाना चाहता है, और हीरो बनना चाहता है. नायिका विभा राघव को हीरो बनने के लिए प्रोत्साहित करती है. फिर, राघव प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहता है. इसके लिए भी नायिका राघव को प्रोत्साहित करती है.
राघव और विभा का क्वार्टर अगल - बगल में है.दोनों एक ही कक्षा में पढते हैं . दोनों पढने में मेघावी  भी हैं. राघव विभा के घर पढने के लिए जाता है. इसी क्रम में उनके बीच प्रेम हो जाता है.इधर विभा की माँ का दमे की बीमारी के कारण देहांत हो जाता है. माथुर सिन्हा बेटी के सर से मां का साया उठ जाने से विभा को और भी प्रेम करने लगते हैं. इधर विभा, राघव से गर्भवती हो जाती है! 
कहने की  जरूरत नहीं है कि समाज में बिन ब्याही मां का क्या स्थान होता है. राधव के पिता रघु महतो  बिहारियों के विरोधी हैं क्योंकि उनकी ममेरी बहन हरहरि सिंह से फंसी हुई है. हरहरि सिंह बिहारी है और वो कोयलांचल की कामिनों   का यौन- शोषण करता है. केवल हरहरि सिंह ही नहीं कोयलांचल के हर अमला -बाबू झारखंडियों के इज्जत- अस्मत लूटने के लिए लालायित है, कदाचित रघु महतो इसलिए भी बिहारियों से नफरत करते हैं.इधर विभा के पांव  भारी हो जाने के कारण माथुर सिन्हा विवश हो जाते हैं और रघु महतो से राघव और विभा के विवाह की बात करते हैं , यहाँ ये बताना जरूरी है कि माथुर सिन्हा बिहार के रहने वाले हैं.इसलिए भी रघु महतो, माथुर सिन्हा से नफरत करते हैं. रघु महतो, माथुर सिन्हा के प्रस्ताव को सिरे से नकार देते हैं.इस पर राघव, विभा से दिल्ली भाग चलने की बात कहता है, विभा, राघव के साथ  भागने से इंकार कर देती है. माथुर सिन्हा, रघु महतो के इंकार से टूट जाते हैं. बिचौलिए शंकर पांडे   (किराना वाले) माथुर सिन्हा के सामने भैरव सिंह का प्रस्ताव रखता है कि भैरव सिंह विभा से अपने बेटे की शादी करना चाहते हैं. आरंभ में माथुर सिन्हा विभा की राय जानने के बहाने  शंकर पांडे को टाल जाते हैं लेकिन कुछ समय के पश्चात विभा और भैरव सिंह के लड़के का विवाह संपन्न हो जाता है. इधर, विभा की शादी से दुखी होकर राघव जहर खा लेता है ,  लेकिन पडोस में रहने वाले, चाचा- चाची और पडौसियों की मदद से राघव को अस्पताल ले जाया जाता है जहाँ राघव को बचा लिया जाता है . कमलदेव( विभा के पति) को कुछ महीने बाद विभा के गर्भवती होने का पता चलता है. वो विभा से मारपीट भी करता है वो जानना चाहता है कि ये होने वाला बच्चा किसका है. विभा स्पष्ट तौर पर राघव का नाम घरलू पंचायत में ले लेती है.  घरेलू पंचायत में फैसला होता है कि विभा पैसे वाले बाप की बेटी है( इसलिए दुधारू गाय की लात भी सहनी पडती है) विभा  का गर्भपात करवा दिया जाए जिससे घर की इज्जत घर में ही  बनी रह जाए और यदि बाद में कमलदेव का मन करे तो वो एक शादी और कर ले! लेकिन, विभा गर्भपात करवाने से साफ इंकार कर देती है. और वो कमलदेव का घर छोड़कर वापस माथुर सिन्हा के पास आकर रहने लगती है. बाद में विभा के श्वशुर विभा के पिता के पास पच्चीस- हजार रूपये की मांग जमीन खरीदने के लिए करते हैं. भैरव सिंह बहू से होने वाली गलती ( गर्भवती होने) को ढकने की कीमत के तौर पर ये पच्चीस हजार रुपये मांगते हैं लेकिन, वे इस बात को साफ - साफ कहना नहीं चाहते, लेकिन विभा इसका आशय समझते हुए माथुर सिन्हा को पैसे देने के लिए मना कर देती है.भैरव सिंह अपनी दाल गलते न देखकर विभा और उसके पिता को खरी- खोटी और उल-जलूल बकते हुए चले जाते हैं.
इधर विभा का राघव के घर आना जाना जारी रहता है, लेकिन राघव विभा से एक निश्चित दूरी बनाकर रहता है.अब वो विभा से बिलकुल मिलता जुलता नहीं है. विभा की शादी के बाद वो  रघु महतो से सीधे मुंह बात भी नहीं करता है अब वो क्वार्टर में  भी नहीं  रहता  है .वो अब गांव में ही रहता है.  नंदनी देवी ( राघव की माँ) राघव और विभा के प्रेम से लेकर वियोग (विभा की शादी ) तक की बात को भलीभाँति जानती है . कुछ- कुछ राघव से सहानुभूति भी रखती है. लेकिन वो कर भी क्या सकती है, राघव के पिता रघु महतो विभा और राघव की शादी के खिलाफ हैं.कालांतर में रघु महतो को भी विभा और उसके होनेवाले बच्चे को लेकर चिंता होती है. उन्हें लगता है कि आखिर विभा के पेट में पलने वाला बच्चा भी उन्हीं का ही तो खून है ! उन्हें पश्चाताप होने लगता है.और आखिरी में वो विभा और उसके बच्चे को अपनाना चाहते हैं. लेकिन, राघव को इन बातों से कोई मतलब नहीं है. वो पगली कलसी से शारीरिक संबंध बनाता है. पगली - गंदी कलसी . लेकिन पगली कलसी में आदिम मादकता है जो क्षणभंगुर नहीं है वो बार- बार कलसी को भोगना चाहता है. कलसी पगली की आदिम मादकता राघव को वासनांध कर देती है. रेशमा, विभा और पगली कलसी के बीच की कड़ी है. उसके जिस्म की मादकता उन दोनों( विभा और पगली कलसी) से अलग है, और ज्यादा बेहतर है. लेखक ने गांव के सफेदपोश और व्यवसायी के गठजोड़ की ओर इशारा करते हुए रूपचंद महतो का जिक्र किया है, रुपचंद महतो ( व्यवसायी- कृषक) भी पगली कलसी के आदिम मादकता को खूब भोगते हैं,वो अधेड़ हैं पचास- पचपन साल के लेकिन दिखते चालीस साल के हैं गांव के प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं. कलसी को लोगों और युवाओं ने बूट( चना) और मिठाई देकर खूब भोगा है. गांव की बदनामी ना हो इससे बचने के लिए गांव की औरतें गांव की ही कुसराइन से दवा लेकर पगली कलसी का कई बार गर्भ भी गिरवा चुकीं हैं . गांव को बदनामी से बचाने के लिए! गांव में हो रही अनैतिकताओं की पोल लेखक ने बडी़ ही साफगोई से खोल दिया है! वहीं सत्ता को भी एक तरह से बेनकाब कर दिया है. पगली कलसी को गांव में किसी ने जहर दे दिया है. पगली कलसी मर गई है. लेकिन, रुपचंद महतो गांव के प्रतिष्ठित व्यवसायी भी हैं उनके मित्र गांव के विधायक हैं और रूपचंद महतो के अच्छे दोस्त भी हैं, इस कारण से मामला रफा- दफा हो जाता है! हांलाकि, पगली कलसी के नाम से राघव का नाम भी जुड जाता है.
1980  के दशक के समय ही  झारखंड में एक और आंदोलन चलाया जा रहा था .  देवा समाज . इस समाज का मुख्य उद्देश्य था शादी के बाद एक दूसरे को छोडने के रिवाज का सामाजिक विरोध करना इसको लेकर ही  और देवा समाज की स्थापना की गई थी ताकि शादी के बाद ना तो लडका, लड़की को छोड़ पाए और न ही लड़की, लडका को छोड़ पाए! रेशमा नारी उत्थान समिति की अध्यक्षा है,  वो दिवाकरन की प्रेमिका भी है.
राघव को उसके पिता रघु महतो समझाते हैं, कि विभा के पेट में पल रहा बच्चा आखिर उनका ही खून है , वो राघव को विभा को अपनाने के लिए कहते हैं लेकिन राघव पिता  की बात को टाल जाता है. और अचानक से रघु महतो की तबीयत ज्यादा खराब हो जाती है और उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पडता है.वहाँ विभा श्वशुर रघु महतो की खूब सेवा- सुश्रूषा करती है और रघु महतो के साथ उनके पूरी तरह से ठीक होने तक साथ में ही रहती है. सास नंदनी देवी विभा के सेवा -व्यवहार से तृप्त हो जाती है और ये फैसला करती हैं कि वो विभा को अपने घर की बहू बनाएंगी. बाद में वो राघव से कहती हैं कि वो विभा को अपना ले नहीं तो वो विभा की शादी माधव  ( राघव के छोटे भाई) से कर देगी . राघव को अपने भाई को बलि का बकरा बनते देख राघव नंदनी देवी की बात मान लेता है और विभा से एक सादे समारोह में शादी कर लेता है. लेकिन राघव घर नहीं लौटता है वो रेशमा के पास चला जाता है.और उससे प्रेम संबंध बनाता है. वहां दिवाकरन कुछ अरसे बाद आकर रेशमा को राघव के शादी-शुदा होने की जानकारी देता है और रेशमा को भडकाता है तत्काल रेशमा राघव को भला- बुरा कहती है और उसे भगा देती है. फिर वो दिवाकरन को भी नारी उत्थान समिति की संयुक्त संयोजिकता  मंजुलता के साथ छेडखानी की बात को लेकर दुत्कारती  है . रेशमा दिवाकरन को नारी उत्थान समिति की बदनामी को लेकर कोसती है और दिवाकरन को भी वहां से चले जाने को कहती है.फिर उसे राघव से अपने किए गए  व्यवहार की गलती का एहसास होता है और वो  आत्मग्लानि  के कारण  राघव से माफी मांगती है. एक बार फिर से दिवाकरन रेशमा के पास आता है और रेशमा को भडकाना चाहता है, इसी बात पर राघव और दिवाकरन के बीच मारपीट हो जाती है और दिवाकरन को बेइज्जत करके रेशमा और राघव भगा देते हैं.इधर दिवाकरन को रेशमा और राघव का प्रेम खटकता है और वो गाँव वालों को भडकाता है . बाद में पंचायत तक की नौबत आ जाती है. पंचायत में राघव और रेशमा को लोग मारपीट और बेइज्जत करते हैं. इसका कारण ये होता है कि राधव और रेशमा के बीच मौसी और बेटे का संबंध होता है. लेकिन रात के अंधेरे में राघव और रेशमा रिश्तों की मर्यादा तोडते रहते है, जिससे बस्ती वालों को उनके असली रिश्ते की जानकारी मिलती है. अंततः दोनों को बेइज्जत होना पड़ता है.  इधर, विभा ने एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया है, नंदनी देवी पोती को पाकर खुश हैं. बहुत दिन के बाद उनके घर में बेटी आयी है वो बहुत ही ज्यादा खुश हैं. इधर, विभा की मुलाकात नर्सिंग होम में कपिल  नामक कंपाउंडर से होती है. कपिल कभी -कभी विभा के घर भी आता है, इंजेक्शन लगाने. विभा का जवान मन कपिल का स्पर्श पाकर गदगद हो जाता है. प्रारंभ में कपिल का घर आना -जाना नंदनी देवी को अच्छा नहीं लगता लेकिन, राघव को रेशमा के चुंगल से जब आजादी दिलवाने को लेकर वो अपना असफल  प्रयत्न करती है तब उन्हें भी विभा के नारी देह की  जरूरत का एहसास हो जाता है. प्रौढ़ मन कपिल- विभा के प्रेम की शुरुआती पेंगों को भांप लेता है. वो विभा और कपिल के सामने ये प्रस्ताव रखती हैं कि अगर वे दोनों चाहे तो आपस में विवाह कर सकते हैं. लेकिन, नंदनी देवी के इतने उदार व्यवहार से कपिल नंदनी देवी के पैरों में गिरकर हृदय से गदगद होकर माफी मांगता है और नंदनी देवी भी अकेली विभा पर तरस खाकर कपिल से अनुरोध करतीं हैं - कि कभी-कभी विभा से आकर मिलते रहो. विभा का मन लगा रहेगा . कपिल उनके अनुरोध को मान लेता है.इधर नंदनी देवी दिव्या के जन्म की खुशी में और राघव और विभा की शादी के उपलक्ष्य में गाँव में एक भोज  लाल भात (खस्सी का मीट और भात) का आयोजन करना चाहती हैं.  लेकिन पंचायत राघव के  बिरादरी के बाहर जाकर शादी करने के कारण  राघव और उसके परिवार का विरोध करता है और उसे अर्थदंड भी लगाता है करीब 15 सौ रूपये ! नंदनी देवी इसका पुरजोर विरोध करती  हैं . इघर समाज के लोगों से  प्रताडित होकर राघव जब अपने घर लौटा तो वो अपनी बेटी दिव्या को देखकर हृदय से गदगद हो गया. कुल मिलाकर करमजला उपन्यास एक बार पढने लायक है.
 
महेश कुमार केशरी
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 मेघदूत मार्केट फुसरो
 बोकारो झारखंड ( 829144)