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साहित्य के मायने-लेखक तथा पाठक के लिए
February 23, 2020 • डाॅ. हिमा गुप्ता • Research article

हमारे विश्वविद्यालयांे मंे समाज सम्बन्धी अनेक शास्त्र विषय रूप मंे पढ़ाये जाते हैं- समाजशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान आदि-आदि। यह आश्चर्य का विषय है कि इन्हीें के साथ साहित्य भी पढ़या जाता है क्योंकि साहित्य अपनी प्रकृति मंे समाजशास्त्रीय अनुशासनांे से मूलतः भिन्न है। यद्यपि अन्य अनुशासनांे की भाँति साहित्य मंे भी अध्ययन-विश्लेषण का मुख्य विषय ‘मनुष्य‘ ही है किन्तु जहाँ अन्य शास्त्रांे मंे वह एक ‘आब्जेक्ट‘ एक ‘अन्य‘ है, जिसे बाहर से देखा-परखा जाता है, वहीं साहित्य मंे देखने-परखने वाला व्यक्ति स्वयं ‘मैं‘ एक सब्जेक्ट है, वह साहित्य मंे एक ‘अन्य’ की तरह स्वयं को प्रतिबिम्बित होता हुआ पाता है। अन्य शास्त्र मात्र माध्यम हैं, जबकि साहित्य और साहित्य की रचना अपने आप मंे एक लक्ष्य है, साध्य है। लेखक हो या पाठक, आलोचक हो या प्रकाशक यानि अन्ततः समाज के लिए साहित्य एक चुनौति है।
साहित्य वह प्रमाण है, जिसे प्रत्यक्ष के सहारे की कोई जरूरत नहीं क्योंकि वहाँ न होने का प्रत्यक्ष सबसे अधिक सघन रूप से अनुभूत होता है। असली जीवन मंे हमारे भीतर के अनेक कपाट बन्द पडे़ रहते है, जिन्हें हम खोलने का साहस नहीं कर पाते। साहित्य जब अपनी चाबी से उनके बन्द ताले खोलता है, तो हमें एक अजीब-सा आश्चर्य होता है, हम अपनी दबी-छिपी आकांक्षाआंे को उनसे बाहर निकलता हुआ पाते हैं। अतः एक लेखक, या पाठक और समाज की दृष्टि से अथवा उनके लिए साहित्य और उसकी रचना क्या मायने रखती है, प्रस्तुत लेख मंे इन्हीं पर विचार करने का प्रयास किया जायेगा।  
1. साहित्य लेखक के लिए -       
(1) अनुभव - यदि हर उपन्यास, कहानी और कविता हमंे अनूठा स्वाद, रस और आनन्द देती है, तो उनके बीच एक सामान्य केन्द्रीय तत्त्व अवश्य होता है, जो उसे कला का दर्जा देता है। वस्तुतः इस सामान्य केन्द्रीय तत्व का प्रादुर्भाव ही अनुभूति की उर्वरा धरती पर होता है। यदि हम सोचते है कि अनुभूति हमारी किन्हीं भावनाआंे और संवेदनाआंे का क्षेत्र है तो यह अनुभूति की बहुत सीमित और संकीर्ण समझ है। अनुभूति के मूल मंे मनुष्य का अनुभव रहता है, जो ज्ञान, बुद्धि, तर्क, मुक्ति, विवेक, नैतिक बोध आदि अनेक दिशाआंे से प्राप्त होता है। यह स्थान और काल बोध के ऐतिहासिक विभाजनांे को ढहाता हुआ आता है।
 अनुभूति का लोक इतना उर्वर, इतना व्यापक साथ ही इतना धुँधला और कुहासे भरा होता है, जिसमंे दृश्य का अस्तित्व उतना ही ठोस होता है, जितना अदृश्य का। दोनांे एक दूसरे को अपने मंे प्रतिबिम्बित करते हैं। अतः लेखक अपनी साहित्यिक कृति मंे अदृश्य का अनुभव दृश्य के पर्दे पर साझा करता है और यह समूचा चमत्कार शब्दांे के भीतर उद्घाटित होता है।
 साहित्य मंे प्रवेश एक ऐसे कक्ष मंे प्रवेश है, जहाँ चारांे ओर आइने लगे है। (ज्ीम ींसस व िडपततवत)। जिसमंे लेखक के अपने ‘‘मैं‘‘ की एक अखण्डित सत्ता अनेक छवियांे मंे विभाजित होती जाती है, अतः लेखक के जिये हुए या भोगे हुए अनुभव न भी हों, तो भी अनुभूति क्षेत्र मंे उनका अस्तित्व उतना ही ठोस और जीवन्त होता है, जैसे हमारे नींद के स्वप्न, जो हमारी जागृतावस्था की ही उपज होते हैं। साहित्य में संभाव्य की सत्ता उतनी ही प्रामाणिक है,जितनी यथार्थ की। दैनिक जीवन में जो अनुभव हमें नितान्त मायावी,असंगत और अस्वाभाविक जान पड़ते हैं, साहित्य में वे एक आश्चर्यजनक अनिवार्यता और विश्वसनीयता प्राप्त कर लेते हैं किन्तु यथार्थवाद के नाम पर हमने मनुष्य को यथार्थ से विलग कर दिया जो उसके जीवन और मृत्यु के प्रश्नों को अर्थ प्रदान करता है।
 किसी लेखक से पूछा जाये कि लिखने का बीज उसमें कब पडा तो वह उसका उत्तर ठीक-ठीक नहीं बता सकता। वह मात्र अपने अनुभवों को साझा कर सकता है, जिन्होंने उसके संवेदनशील मन पर अमिट छाप छोडी है। ऐसे अन्तर्मुखी अनुभव समय के सुदूर कूलों से उठकर बहते हुए जब एक-दूसरे से मिलते हैं तो एक तीसरी सृष्टि का जन्म होता है। एक व्यक्ति के भीतर ’लेखक’ का जन्म शायद इसी सृष्टि में होता है। किताबें, यात्राएँ, चेहरे, बीते हुए लोग,शहर, बचपन के दोस्त, टीचर, प्रकृति के मनोरम और वीभत्स दृश्य, परम्पराएँ और रूढियाँ-क्या कोई एक शब्द हैं, जिसे पकड़कर वह कह सके कि इसकी चुभन और टीस ने उसके भीतर सोये हुए लेखक को पहली बार जगाया, शायद नहीं।
(2) भाषा -
 लेखक अपनी कृति में अदृश्य का अनुभव दृश्य के पर्दे पर साझा करता है और यह चमत्कार शब्दों के भीतर उद्घाटित होता है, अतः साहित्य का प्रासंगिक प्रश्न आता है-भाषा के साथ साहित्य का अनूठा और विशिष्ट सम्बन्ध,जहाँ सम्प्रेषण का उद्देश्य आत्मान्वेषण के रास्ते से होकर सम्पन्न होता है। यद्यपि हर अनुभव भाषा के माध्यम से सम्प्रेषित होता हैं किन्तु हर सम्प्रेषित होने वाला अनुभव साहित्यिक अनुभव नहीं होता। सत्य तो यही है कि जिस क्षण लेखक अपनी भाषा मंे लिखने का निश्चय करता है, उसी क्षण वह सहज रूप से ही अपनी परम्परा और जातीय स्मृति के मूल स्रोतों से सम्पृक्त हो जाता है। लेखक सोचता है कि शब्दों का चुनाव वह कर रहा है, जबकि शब्द अपनी सत्ता मात्र से लेखक को एक ऐसे विशिष्ट संवेदनतन्त्र से जोड़ देता है, जिसकी लय कवि के समस्त कल्पना विधान को अनुप्राणित करती हैं। इससे एक लेखक की जिम्मेदारी दोहरी हो जाती हैं। न केवल भाषा के प्रति बल्कि अपने प्रति भी। भाषा पर मजबूत पकड़ के लिए लेखक को उस भाषा में निबद्व समग्र ज्ञान व साहित्य को आत्मसात् करना पड़ता है। कवि चाहे किसी देश या काल के लेखकों के कृतित्व से प्रेरणा प्राप्त करे, अपनी भाषा में साहित्य के अवतरित होते ही उनका ‘प्रभाव’ एक भिन्न काया को धारणा कर लेता है। निराला हो या ठाकुर, जिस लेखक की जडं़े अपनी भाषा में है, वह सब दिशाओं से  आने वाली हवाओं का स्वागत करता है। विदेशी प्रभाव से आतंकित तो हमारे आलोचक हैं। लेखक, जिसकी जड़ों में स्वाध्याय और परम्परा विचरण करते हैं, उन्होंने कहीं किसी ओर से अपने कपाट बन्द नहीं किये। वर्तमान में विदेशी प्रभाव का प्रश्न अप्रासंगिक हो गया है, इसे हम जितना जल्दी छोड़ंे, उतना ही हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।
 अपनी भाषा का प्रश्न इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि भाषा से केवल साहित्य सृजन नहीं जुड़ा, सम्पूर्ण सांस्कृतिक मनीषा जुड़ी होती है। क्या भारतीय मनीषा की महीन बुनावट किसी विदेशी भाषा में परिलक्षित हो सकती है, जिसमें भारतीय संस्कार और स्मृतियों का नितान्त अभाव है। इससे अधिक विडम्बना क्या होगी कि आज  पश्चिमी देशों में केवल अंग्रेजी में रची भारतीय लेखकों की रचनाएँ भारतीय साहित्य का प्रतिनिधित्व करने लगी हैं जबकि स्वयं भारतीय भाषाओं का साहित्य महज ‘क्षेत्रीय’ बन कर रह गया है। यह नहीं है कि अंग्रेजी भाषा में लिखित साहित्य उत्कृष्ट नहीं हो सकता किन्तु उसकी उत्कृष्टता की जाँच अंग्रेजी भाषी अन्य साहित्य की अपेक्षा सम्पूर्ण भारतीय साहित्य के परिप्रेक्ष्य में की जानी चाहिये। इसके अतिरिक्त अनूदित रचनाओं के आधार पर भी यह आकलन असम्भव है क्योंकि अनुवाद की प्रक्रिया में जिस चीज को तात्कालिक ठेस पहुँचती है, वह उस रचना की भाषागत विशिष्टता है, जहाँ उसकी अपनी आत्मा की आवाज सुनाई देती है।
(3) संस्कृति -
 किसी भी साहित्यिक रचना की गुणवत्ता को आँकने के जो भी आलोचनात्मक निकष ऩिरूपित किये जाते हैं-‘कला पक्ष‘ और ‘भाव पक्ष’ उन दोनों में एक ऐसा केन्द्रीय तत्त्व वि़द्यमान होता है, जिसके बिना उस रचना के किसी भी पक्ष पर सार्थक बहस सम्भव नहीं है औंर वह तत्त्व है,उस लेखक और उसकी भाषा, जिसमंे रचना हो रही है और उनकी संस्कृति। भारत के सन्दर्भ में भारतीयता की खोज कोई पुनरूत्थानवादी प्रयास न होकर स्वयं अपनी चेतना से विस्मृति की धूल पोंछने का प्रयास है। आधुनिक भारतीय कविता और उपन्यासों में भी रामायण और महाभारत की स्मृतियों, पौराणिक कथाओं और मिथकों का योगदान इतना महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वे एक संस्कृति के स्मृति चिह्न हैं, जिनके सहारे लेखक अपने भीतर के अतीत को अपने वर्तमान से जोड़कर एक पैटर्न में एकसूत्रित कर पाता है। यह उपक्रम कोई सचेत रूप से नहीं करता किन्तु उसके रचनालोक के परिवेश में ये स्मृति चिह्न अदृश्य रूप से व्याप्त होते हैं। यदि आज हम अपनी ‘भारतीयता’ के प्रति अत्यधिक सचेत हो रहे है तो इसलिए कि वह हमारी सृजन चेतना के भीतर न रहकर हमसे दूर छिटक गई है। यह बात कुछ अजीब लग सकती है कि जब हमारे देश का आधुनिक साहित्यकार सच्चे अर्थों में अपने परम्परा-बोध और संस्कारों में ‘भारतीय’ था - बंगाल में रविन्द्रनाथ, मराठी में खांडेकर, तमिल में भारती, हिन्दी में प्रसाद, प्रेमचन्द, निराला- तब भारतीयता की चर्चा बहुत कम होती थी। यह शायद इसलिए कि जब लेखक सहज रूप से अपनी जड़ों से जुड़ा होता है, तो वह अलग से अपनी जातीय अस्मिता का ढिंढोरा नही पीटता। न ही वह  तथाकथित ‘अभारतीय’ या गैर भारतीय तत्त्वों के काँटों को चुन-चुनकर अपनी साहित्य-वाटिका से हटाने-बुहारने का उपक्रम करता है। जो हमारे पूर्वजों के लिए अपेक्षाकृत महत्त्वहीन प्रश्न था, कैसे वह आज हमारे लिए सहसा इतना प्रासंगिक हो चुका है कि उसे हम कविता, कहानी, उपन्यास के मूल्यांकन में एक कसौटी की तरह नहीं, एक लाठी की तरह इस्तेमाल करने लगते हंै, तो उसकी प्रामाणिकता पर सन्देह होना स्वाभाविक हो जाता है।
 जब हम जो कुछ है, उसे भूलकर कुछ और होने का प्रयास करते हंै तब हम सर्वप्रथम उस जातीय चेतना को गँवा देते हैं, जो हमें अपनी संस्कारगत परम्परा से प्राप्त थी। सही अर्थों में भारतीयता का प्रश्न एक लेखक और विचारक के लिए ही नहीं, बल्कि हर संवेदनशील भारतीय के लिए अपनी खोई पहचान को ऐतिहासिक विस्मृति के कुहासे से निकालकर दिन के उजाले में लाना है। ताकि हम स्वयं को वैसा ही देख सके, जैसे हम हैं।
(4) चेतना -
 अपने युग औंर समाज की असली आन्तरिक आकांक्षाओं को केवल वे ही साहित्यिक कृतियाँ अभिव्यक्त करने की क्षमता प्राप्त करती हैं, जिनमें लेखक की स्वाधीन चेतना सबसे अधिक सजग रूप  से क्रियाशील रहती है। हर व्यक्ति के अनुभव सत्य को दर्शाने के लिए स्वयं लेखक को अपनी रचना में निर्वैयक्तिक होना पड़ता है। वाल्मीकि आदिकाव्य रामायण की रचना में तभी प्रवृत्त हो पाये जब वे वाल्मीकि न रह कर क्रौंची के करूण क्रन्दन को अपने अन्दर समाहित कर स्वयं क्रौंची बन गये। कालिदास कभी दुष्यन्त, कभी शकुन्तला तो कभी कण्व बन गये। कहने का तात्पर्य यह है कि स्वाधीन चेतना का संवाहक बन कर कवि, प्राचीन हो या अर्वाचीन कथावस्तु तथा चरित से स्वयं को जोड़ लेता है। साथ ही समसामयिक विरोधी अवधारणाओं से अप्रभावित होकर अपनी साधना से चेतना के ऐसे द्वार खोल सकता है, जो उसे मनुष्य की उन सम्भावनाआंे से अवगत करा सके, जो अब तक अज्ञात के अँधेरे मंे छिपी थी। जब विवेकानन्द ने अमेरिका मंे ‘‘अद्वैत‘‘ की व्यवस्था करते हुए आत्म और अन्य के भेद को नकारा था तो यह कोई अमूर्त रहस्यवादी स्थापना नहीं थी बल्कि एक ऐसा सत्य था जिसके आलोक मंे स्वयं पश्चिमी सभ्यता के नागरिकांे ने अपने कुंठित जीवन की सीमाआंे को पहचाना था। अज्ञेय, रेणु ने अपनी वैचारिक स्वतन्त्रता की आधारभूमि पर अपनी समूची सृजन यात्रा सम्पन्न की थी, अतः वे कालजयी कवि स्वाधीन चेतना के श्रेष्ठ संवाहक बने।
 भारतीय समाज मंे राजनीतिक स्वतन्त्रता की बात की जाती रही है, किन्तु यह स्वतन्त्रता अपने मंे कितनी कमजोर और एंकागी होती, यदि व्यक्ति अपने चिन्तन, विवेक और सृजन मंे स्वाधीन नहीं होता। साहित्य की समस्त प्रासंगिकताएँ अन्ततः व्यक्ति की स्वाधीनता मंे आकर चुक जाती हंै, क्योंकि उसके सन्दर्भ मंे ही हर विचार और विचारधारा को आँका-तौला जा सकता है। जिस क्षण हम मर्मान्तक दासता का जुआ अपने से छुड़ाकर फेंक देते हंै, हम दुनिया को नई निगाहांे से देखने लगते हैं। तब हमंे लगता है कि समाज, मनुष्य और प्रकृति पर से बहुत से परदे एकाएक उतर गये हैं किन्तु अपने युग के प्रति लेखक की प्रासंगिकता इससे सिद्ध नहीं होती कि वह किन तात्कालिक विचारधाराआंे को अपनी रचना मंे व्यक्त करता है। बल्कि किस हद तक वह अपने भीतर की दमित वर्जनाआंे से मुक्ति पाकर जीवन के उन सार्वभौम सत्यांे को उजागर कर सके, जो हर समय और समाज के सन्दर्भ मंे प्रासंगिक होते हैं। यह एक विचित्र विरोधाभास ही माना जायेगा कि हम बाहर से आरोपित प्रतिबद्धताआंे से मुक्ति पाकर ही अपने साहित्यिक दायित्व को निभा पाते हैं।
2. साहित्य पाठक के लिए - सभी प्रकार के लिखित टैक्स्ट, जानकारी आदि के बावजूद ऐसा क्यांे है कि किसी का साहित्य के प्रति आकर्षण अलग ही होता है ? अखबार, विज्ञापन, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, सभी लिखा हुआ टैक्स्ट है, किन्तु वह क्या कारण है कि विज्ञापन या अखबार की उपयोगिता, उपयोग करते ही समाप्त हो जाती है पर साहित्य की नहीं। यानि हर लिखा हुआ टैक्स्ट साहित्य नहीं है, हालांकि साहित्य अपने-आप मंे लिखा हुआ टैक्स्ट है, इसमंे क्या अन्तर है ? उत्तर यह है कि बाकी लिखे हुए टैक्स्ट सिर्फ साधन हैं, माध्यम हैं, ‘‘कंज्यूमरिस्ट कोमोडिटी‘‘ की तरह इस्तेमाल किये जा सकते हैं, जबकि साहित्य की रचना अपने मंे एक लक्ष्य है, एक साध्य है। हम निराला या वात्स्यायन की कविता पढ़कर ये नहीं कह सकते कि बस हमने कविता पढ़ ली और हमारा उससे कोई सरोकार नहीं रहा। जीवन के हर स्तर पर, हर बार वह हमंे एक नया आनन्द देती है तो उसका मुख्य कारण यह है कि उसका रस उसका सत्य, उसकी सरंचना मंे है, उसकी उपयोगिता मंे नहीं। जो कवि के शब्दांे मंे सत्य छिपा होता है, वह कभी हमंे पूरी तरह से हासिल नहीं होता। उसका कुछ हिस्सा हमंे मिल पाता है तो कुछ हिस्सा काव्य अपने पास रख लेता है, जब हमारा अनुभव कुछ बदलता है, परिष्कार होता है और तब पुनः उस काव्य के पास जाने पर पता चलता है कि वह काव्य हमसे कुछ और भी कह रहा है, जो पहले नहीं कहा था।
 हम बहते जीवन की अराजकता के बीच यदि साहित्य पढ़ते हैं तो पाते हैं कि लिखे हुए शब्दांे के संयोजन के बीच मंे जीवन की अर्थवत्ता छुपी हुई है। इसके लिए आपको थोड़ा विराम चाहिये और वह विराम साहित्य देता है। हमंे अपने बदहवासी के जीवन मंे किताब उस तरह का क्षण देती है। जहाँ बिखराव के बीच हम एक संगति ला पाते हैं।
कहा जाता है कि कला जीवन बदल देती है अथवा ये कि कला हमंे बदल देती है पर वस्तुतः कला न तो जीवन को, न ही हमंे बदलती है। कला बडे़ ही नरम ढंग से, बिना बोले हुए चुपचाप, हमारा आस-पास की जिन्दगी से रिश्ता बदल देती है और जब रिश्ता बदल जाता है, तो सब कुछ पहले जैसा नहीं रहता, वह क्या चीज है, जो बदल जाती है, हमंे एक तरह का आनन्द देती है, यह आनन्द मनोरंजन से सर्वथा भिन्न होता है, अजीब किस्म का अनूठा आनन्द। यह एक जिन्दगी को जीते हुए बहुत सी जिन्दगियांे और बहुत से यथार्थों से साक्षात्कार कराता है। इस प्रकार साहित्य हमारे जीवन को समृद्ध, बहुआयामी, सघन बनाने मंे योग देता है। वह किसी अनुभव की अन्तिम परिणति तक ले जाता है। शब्दांे के भीतर का हर रंग, राग और इमेज अपने आप आविष्कृत कर लेते हैं। ये साहित्य की बहुत बड़ी खूबी है, जो अन्य कलाआंे मंे नहीं पाई जाती। साहित्य से हम कुछ लेने लायक बन सकें, इसके लिए हम जितनी पुस्तकंे पढे़ंगे, उतने संस्कारवान बनेंगे और हमारे संस्कार जितने परिष्कृत होंगे, उतना ही हम पुस्तकांे, से ज्यादा आनन्द, रस और अर्थ ग्रहण कर पायेंगे। किसी ने कहा है - ‘‘साहित्य अकेलेपन के क्षणांे मंे अपने से साक्षात्कार है।‘
यही वह तत्व है, जिसने सदा मनुष्य को पशु या यन्त्रांे से पृथक् एक सार्थक् मूल्यवान अस्तित्व दिया है।
साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात् पषुः पुच्छविषाणहीनः।
तृणन्न खादन्नपि जीवमानः तद्भागधेयम् परमं पषूनाम्।। -नीतिषतक, 12
तथा -
 सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम्।
 अहार्यत्वादनघ्र्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा।।   -हितोपदेष, 1.4

 

डाॅ. हिमा गुप्ता
सहायक आचार्य, संस्कृत 
राजकीय कला महाविद्यालय, कोटा