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संवैधानिक राजर्षि शाहू महाराज और वर्तमान यथार्थ      
January 12, 2020 • वाढेकर रामेश्वर महादेव • Research article

संवैधानिक राजर्षि शाहू महाराज और वर्तमान यथार्थ
      वाढेकर रामेश्वर महादेव
हिंदी विभाग, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद, महाराष्ट्र


 भूमिका:- प्राचीन काल से भारत में वर्ण व्यवस्था थी। इसी कारण उच्च वर्गीय लोग निम्न वर्गीय लोगों के साथ जानवरों... इससे भी बत्तर बर्ताव करते थे। इस कारण उनका जीवन नरक बना था। वह जी तो रहे थे, लेकिन लाश बनकर...। समाज में उन्हेें हिन नजरीया से देखा जाता था। प्रतिष्ठा कर्म पर नहीं जाति, धर्म पर थी। आधुनिक समाज में संविधान के कारण भले ही परिस्थिति बदल गई परंतु यह वर्तमान वास्तव है कि आज भी जाति, धर्म के नाम पर शोषण होता है । सिर्फ उसका स्वरूप बदला है । 
 भारत में जातिभेद का कलंक आज भी है । इसी का विरोध महात्मा गांधी, महात्मा फुले, राजर्षि शाहू महाराज, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, विेल रामजी शिंदे आदि ने विरोध किया। बहुजनों का आवाज बने। आज संविधान हमें समाज में समता, बंधुता, न्याय स्थापित करने की प्रेरणा देता है । परंतु क्या समाज में यह मूल्य पुरी तरह से स्थािपत हो रहे हैं ? ब्रिटिश काल में कही संस्थान थे जिसमेें बड़ोदा एवं करवीर लोककल्याणकारी थी। रयत को न्याय मिलता था। राजर्षि शाहू महाराज ने बनाए कानून संविधान में दिखाई देते है। संविधान में राजर्षि शाहू महाराज, सयाजीराव गायकवाड के विचार अभिव्यक्त हुए है। शाहूशाही में लोकशाही निर्माण की। इस कारण राजर्षि शाहू महाराज के विचार संवैधानिक है। इस पर हम विस्तार से प्रकाश डालेगें।
लोकशाही: -
 राजर्षि शाहू महाराज करवीर रियासत के राजा थे। उन्होंने अधिकारों का इस्तमाल जनता के लिए किया। जिस वर्ग पर अन्याय होता था उन्हें न्याय दिया। बहुजनों के जीवन में परिवर्तन लाया। आम लोगों के लिए खुद की जान जोखिम में डाली। अंतिम समय तक बहुजन लोगों की सेवा की। राजेशाही में लोकशाही निर्माण की। राजर्षि शाहू महाराज के कार्य को देखकर डॉ. बाबाबासाहेब आंबेडकर कहते है -
 ÓÓअस्पृश्य समाज एवं मुझे करवीर का अभिमान है, क्योंकि राजर्षि शाहू महाराज ने करवीर में ही लोकशाही की शुरूआत की।ÓÓ1 
 वर्तमान में संविधान तो है लेकिन आम लोगों को न्याय नहीं। क्योंकि संविधान का अमल सत्ताधारी वर्ग नहीं करते। इसी वजह से वर्तमान में तानाशाही निर्माण हो रही है। यह वर्तमान का वास्तव चिर्त है। इसे नकारा नहीं जा सकता। न्याय व्यवस्था में राजनेता हस्तक्षेप कर रहे है। इस कारण लोकशाही होकर भी आम लोगों को न्याय नहीं मिलता, मिलती है तारीख पे तारीख...। तारीख पे तारीख...।
आरक्षण:-
  समाज में सभी वर्गों को समान न्याय मिले इसलिए राजर्षि शाहू महाराज ने 1902 में कानून बनाकर बहुजनों को आरक्षण दिया। इसी कारण पिछड़ा वर्ग प्रवाह में आया। उनके जीवन में बदलाव हुआ। बहुजन समाज के संदर्भ में राजर्षि शाहू महाराज कहते हैं कि, ÓÓसभी जाति के लोगों के लिए शिक्षा दी। उन्हें पढऩे के लिए प्रोत्साहन दिया। लेकिन पिछड़े लोगों में बदलाव पुरी तरह से नहीं हुआ यह देखकर मुझे दु:ख होता है।ÓÓ2 संविधान में अनुसुचित जाति, अनुसुचित जमाति के लिए अनुच्छेद 330, 332 के अनुसार सीटें आरक्षित है। लेकिन उन्हें न्याय मिला है क्या? उनकी समस्या का समाधान हुआ है क्या? यह देखने लायक है। राजर्षि शाहू महाराज ने करवीर रियासत में आधी सीटें पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित रखी। उनकी समस्या पर हल निकाला। जो काम वर्तमान में नहीं हुआ वह काम राजर्षि शाहू महाराज ने अपने समय में करके दिखाया।
प्राथमिक शिक्षा शक्ति:-
 शिक्षा व्यवस्था प्राचीन समय से उच्च वर्ग के हाथ में थी। बहुजनों को शिक्षा का अधिकार नहीं था। इसी कारण आम लोगों का शोषण होता था। इस समस्या पर हल निकालने के लिए राजर्षि शाहू महाराज ने प्राथमिक शिक्षा सक्ति एवं मूफ्त की। जो बच्चें को पाठशाला नहीं भेजेगा उन्हें दंड भी दिया। इसी वजह से पिछड़ा वर्ग प्रवाह में आया। बहुजन समाज के शिक्षा के संदर्भ में राजर्षि शाहू महाराज कहते है- ÓÓपिछड़े वर्ग के ज्ञान अर्जन पर बंधन है। उसका विरोध करना है तो उनको मूफ्त एवं प्राथमिक शिक्षा की बहुत जरूरत है।ÓÓ3 संविधान में अनुच्छेद 45 के अनुसार चौदह साल तक शिक्षा सक्ति है। लेकिन उसका अमल होता है क्या? यह देखना जरूरी है। वर्तमान में कहीं बच्चें शिक्षा से वंचित है। कई गाँवों में पाठशाला नहीं है। कुछ पाठशाला में शिक्षक नहीं। यह भारत का यथार्थ...। जो कार्य राजर्षि शाहू महाराज ने 1917 में किया वह हम आज तक नहीं कर पाएंँ।
समता:-
 प्राचीन समय से जातिभेद है, इसी कारण पिछड़े वर्ग का शोषण...। जाति-जाति में दरार थी। इसी कारण पिछड़े जाति के व्यक्ति को कई पदों पर राजर्षि शाहू महाराज ने नियुक्त किया। गुण देखकर जाति देखकर नहीं...! समाज में समता निर्माण की। जो अस्पृश्ता मानते थे उन्हें 1919 में कानून बनाकर सजा दी। राजर्षि शाहू महाराज अस्पृश्यता के संदर्भ में कहते है - ÓÓसभी सार्वजनिक इमारत, धर्मशाला, स्टेट हाऊसेस, सरकारी अनाज कोठार, सार्वजनिक कँुए आदि स्थान पर छूआछूत न माने। खिश्चन बिल्डिंग एवं सार्वजनिक कँुए पर जिस रूप में अमरिका मिशन में डॉ. व्हेल एवं वॉन्लेस सभी को समान न्याय देते है। कोई छूआछूत नहीं मानता। जहाँ छूआछूत दिखाई देगी उस गाँव के लोग, पाटील, पटवारी को शिक्षा दी जाएगी।ÓÓ4 संविधान में अनुच्छेद 17 के अनुसार Óअस्पृश्यताÓ मानना गुन्हा है। लेकिन वर्तमान में अस्पृश्यता मानी जाती है। जाति के नाम पर भेदभाव किया जाता है। अस्पृश्यता राजर्षि शाहू महाराज ने 1919 में खत्म की। वह काम हम आज भी नहीं कर पाए। यह शर्म की बात है...।
वतन खालसा:-
 भारत में कहीं प्रकार के वतन अस्तित्व में थे कोई अच्छे तो कोई बुरे...। Óमहार वतनÓ के कारण उनका बहोत शोषण होता था। इसी कारण वह गुलाम बने। वह विरोध भी नहीं कर पाते थे। इसी कारण राजर्षि शाहू महाराज ने Óमहार वतनÓ खालसा किया। उन्हें नई जिंगदी दी। इसी के साथ कुलकर्णी, वेठबिगार आदि वतन 1919 में कानून बनाकर नष्ट किए। Óमहार वतनÓ के संदर्भ में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कहते है - ÓÓमहार लोगों को सुखी होना है तो वह गाँव मे न रहकर गाँव छोड़कर जाए ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी।ÓÓ5 वर्तमान में वतन खालसा हुए है। लेकिन कुछ मार्ता में जाति के नाम पर व्यवस्था चलती है। इसे खत्म करना होगा। तब समाज में परिवर्तन होगा।
विधवा पुनर्विवाह एवं आंतरजातीय विवाह:-
 प्राचीन समय से विधवा विवाह, आंतरजातीय विवाह को मान्यता नहीं थी... वर्तमान में भी न के बराबर..। इस प्रथा के विरोध में कहीं महापुरूषों ने संघर्ष किया। अपनी बहन Óचंद्रभागाबाईÓ का विवाह राजर्षि शाहू महाराज ने धनगर जाति के Óयशवंत होळकरÓ व्यक्ति से किया। समाज में परिवर्तन हो इसलिए विधवा पुनर्विवाह, आंतरजातीय विवाह आदि कानून 1919 में बनाए। सिर्फ कानून बनाए नहीं अमल में लाए। आंतरजातीय विवाह के संदर्भ में राजर्षि शाहू महाराज कहते हैं कि, ÓÓअठरा साल पुरे हुए लड़की को पिताजी की सहमती होना अनिवार्य नहीं है। स्त्री को अपना जीवन साथी चयन करने का अधिकार है।ÓÓ6 संविधान में विधवा पुनर्विवाह, आंतरजातीय विवाह के संदर्भ में अनुच्छेद होकर भी उसका अमल नहीं होता। जो लड़के आंतरजातीय विवाह करते है, उन्हें कानून होकर भी जान गवानी पड़ती है। समाज उन्हें स्वीकारता नहीं। यह वर्तमान का वास्तव है। राजर्षि शाहू महाराज ने जो कार्य किया वह हम संविधान अस्तित्व में होकर भी नहीं कर पा रहें है। क्योंकि संविधान का अमल ही सत्ताधारी अच्छी तरह से नहीं करते। इसी कारण आम लोगों की अवस्था बेेकार है। इसमेें परिवर्तन करना होगा। 
 निष्कर्ष रूप में इतना ही कहना चाहता हँंू की फुले, शाहू, आंबेडकर के विचारों से लोकशाही निर्माण हुई है, इसे तानाशाही न बनने दे। शिक्षण व्यवस्था सक्षम हो तभी बदलाव संभव है। समाज में समता, बंधुता निर्माण हो। तब समाज में एकता निर्माण होगी। महापुरूषों ने जिंदगी के अंतिम क्षण तक समाज के लिए कार्य किए। समाज में प्रगति की। इसी विचार को हमें आगे बढ़ाना है। तभी फुले, शाहू, आंबेडकर ने देखे स्वप्न साकार होगें। 
 
संदर्भ सूची:-
1. डॉ. रमेश जाधव - राजर्षी शाहू गौरव ग्रंथ, पृ. 690
2. डॉ. जयसिंगराव पवार-राजर्षी शाहू छर्तपती जीवन व 
 कार्य, पृ. 38
3. डॉ. जयसिंगराव पवार - राजर्षी शाहू छर्तपती जीवन 
 व कार्य, पृ. 96
4. डॉ. रमेश जाधव - राजर्षी शाहू गौरव ग्रंथ, पृ. 768
5. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर - बहिष्कृत भारत, पृ. 106
6. डॉ. राजेश करपे - राजर्षी शाहू महाराज आणि 
 वर्तमान संदर्भ, पृ. 150