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श्रृंगार
April 11, 2020 • धर्मेन्द्र कुमार • Hindi literature/Hindi Kavita Etc.

मनोहर लाल कई दिनों से जिस प्रश्न को लेकर परेशान, व्यग्र, व्यथित और चिंतित थे। जिसका जवाब उनके दोस्त-रिश्तेदार यहाँ तक कि विद्वजन भी न दे सके। फ़कीर और महात्मा भी अपना हाथ ऊपर कर दिये। यहाँ आकर पंडितों और ज्ञानियों का ज्ञान भी क्षीण जान पड़ा। जैसे इस गहन समस्या के अंधकार में ज्ञान भी भटक गया हो, मार्ग विहीन हो गया हो, अपने को गुमराह और पराजित मान लिया हो। चारों तरफ़ से थक-हार कर वहीं सवाल पत्नी से जाकर पूछा-“अच्छा प्रिय, मैं कुछ दिनों से एक प्रश्न को लेकर बड़ी दुविधा में हूँ, डूब-उतरा रहा हूँ। इस प्रश्न को जानने की मेरी उत्कंठा बलबली होती जा रही है। इसके समाधान के लिए बहुत प्रयत्न किया किन्तु चारों तरफ़ से निराशा ही मिली। निष्पक्ष और सत्य जवाब की आशा से तुम्हारे पास आया हूँ।”

आनन्दी ख़ुशी से फूले न समायी। मुझ अशिक्षिता को पति इस योग्य समझते हैं कि जीवन के कठिन प्रश्नों का उससे उŸार की आशा रखते हैं। वह प्रश्न जान कर उŸार देने को उतावला हो गयी; किन्तु अपने उतावलेपन को दबाते हुए मुख पर आदर्श की रेखा को अंकित करती हुई बोली-“ऐसा कौन सा प्रश्न है जिसका उŸार बड़े-बड़े ज्ञानी पुरुष भी न दे सके ? भला क्या मैं दे सकूँगी !”

“मुझे उम्मीद है इसका जवाब तुम्हारे ही पास है। यह नारियों से संबंधित प्रश्न है इसलिए पुरुष दुविधा में हो जाता है। नारी-मन को आज तक कोई समझ सका है ?यहाँ त्रिलोकी भी अपने को असमर्थ पाते हैं।”

आनन्दी कटाक्षपूर्ण बड़ी-बड़ी लोचनों से देखकर बोली-“अच्छा ! मगर वह प्रश्न क्या है ?”

“पहले वादा करो, सही और निष्पक्ष जवाब दोगी।”

“पहले प्रश्न तो सुनू कि उसके बारे में कुछ जानती भी हूँ या नहीं।”

“मुझे विश्वास है तुम उसका उŸार जानती हो। अब वादा करो कि मेरे सभी सवालों का जवाब सही दोगी, कुछ भी छुपाओगी नहीं।”

“हाँ, मैं वादा करती हूँ, अपनी संज्ञान में सब सच कहूँगी। अब आप अविलम्ब प्रश्न कीजिए।”

“देखों, बाद में मुकरना नहीं। मैं जानता हूँ, तुम्हें उसका उचित उŸार पता है। मगर मुझे तुम्हारी निष्पक्षता पर संदेह हो रहा है।”

“भला संदेह क्यों होने लगा ?मैं पहले कभी आपसे झूठ बोली हूँ। पति-पत्नी का रिश्ता विश्वास पर टिका होता है। जहाँ प्रेम और अटूट विश्वास हो, वहाँ शंका और अविश्वास जैसी तुच्छ भावनाओं का स्थान नहीं होता।”

“यही तो डर है, प्रेम निष्पक्षता और सत्य मार्ग का सबसे बड़ा शत्रु है। प्रेम और स्नेह के अंधेपन में बस्तियाँ वीरान हो गयी, देश तबाह हो गये, रक्त की नदियाँ बह गयी।”

“आपके मन में मेरे प्रति क्या भाव है, यह आज विदित हो गया ।”

“तुम इसे अपने ऊपर न लो, मैंने वही कहा जो इतिहास ने हमें दिखाया है।”

डबडबायी आँखों से देखते हुए-“क्या आपको मुझपर रŸाीभर भी विश्वास नहीं ? क्या अबतक मैं अंधकार में जी रही थी ?”

“देखों प्रिय, तुम ग़लत न समझो। मैंने अनुभव किया है, कई बार सच्चाई रिश्तें, जाति और समुदाय की बलिवेदी पर चढ़ जाती है। कुŸो और बिल्ली की दोस्ती चाहे कितनी ही गहरी हो किन्तु जब जाति की बात आएगी तो कुŸाा अपने ही दल की तरफ़दारी करेगा। यहाँ दोस्ती का महत्व नगण्य हो जाएगा। तुम देखती हो आये दिन जाति, धर्म, सम्प्रदाय, रिश्तें-नाते, प्रीति, धन-वैभव, दबंगयी आदि के नाम पर सत्य का गला घोट दिया जाता है।”

“मुझे आपकी गूढ़ बातें समझ में नहीं आती। आप सीधे-सीधे प्रश्न करें। मैं अपने जाने में बिल्कुल सही जवाब दूँगी।”

“तुम मुझसे कभी झूठ नहीं बोली हो; किन्तु यह प्रश्न कुछ अलग तरह का है, मैं दावा कर सकता हूँ, इस प्रश्न का उŸार कोई स्त्री निष्पक्ष होकर नहीं दे सकती।”

“जब सब जानते ही है तो व्यर्थ में प्रश्न करने की जिद्द क्यों कर रहे हैं ?”

“क्योंकि मन नहीं मानता और अंदर से एक टूटा हुआ विश्वास भी पैदा हो रहा है। कभी-कभी प्रकाश की झूठी, काल्पनिक चिंगारी भी लक्ष्य तक पहुँचाने में हमारी मदद कर देता है।”

हाथ जोड़ती हुई-”देखिये, इसे और रहस्यमयी न बनाते हुए प्रश्न करने की कृपा करें।“

“तो तैयार हो जाओं। थोड़ा समय लेना मगर सोच-समझ कर जवाब देना। जल्दबाज़ी में यथार्थ से दूर न चली जाना। कई बार बना-बनाया काम शीध्रता के कारण बिगड़ जाता है।”

“पूछना है पूछिये, नहीं मैं जा रही हूँ। मेरी व्याकुलता पराकाष्ठा की अति कर रही है। आपकी तरह सैर-सपाटा नहीं करना है, चूल्हा-चैकी भी देखना है। मैं जानती हूँ, यहाँ से जाकर भी मुझे शांति न मिलेगी। प्रश्न को जानने की उत्कंठा मेरे अंदर बनी रहेगी।”

“अच्छा बैठो मैं पूछता हूँ। तुम....।”

बात काटकर-“बिना किसी भूमिका के प्रश्न करने की महान् अनुकम्पा करें।”

“तो बताओं, स्त्रियाँ अपना शृंगार किसके लिए करती हैं ?”

आनन्दी हँस पड़ी-”बस इसी प्रश्न के लिए कब से रहस्यमयी भूमिका बना रहे थे। यह तो कोई भी बता सकता है। खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। कोई और प्रश्न कीजिए।“

“जितना आसान समझती हो इसका उŸार उतना आसान नहीं है। बताओं किसके लिए शृंगार करती हो ?”

“पति के लिए, अपने सुहाग के लिए और किसके लिए ?”

“पति घर पर, बाहर या किसी काम में कही और होता है और पत्नी बाजार जाती है तो उसके शृंगार को देखने वाला कौन होता है, उस समय किसके लिए शृंगार होता है ?पुरुष बाहर परदेश में होता है और स्त्री घर में बनाव-शंृगार कर बैठी रहती है।”

“किसके लिए का क्या मतलब पति के लिए ही होता है और किसके लिए ! हम वैवाहिक, पतियुक्त स्त्रियाँ पति के नाम पर ही शृंगार करती हैं। वे चाहे कहीं रहे, सात समुन्दर ही क्यों न रहे, शंृगार उन्हीं के लिए, उन्हीं के नाम पर होता है।”

“यह तो वैसा ही हुआ कि ईश्वर के नाम से महंगे, मीठे, स्वादिष्ट, ताज़े मिठाई चढ़ाकर, सुन्दर वस्त्र और आभूषण चढ़ाकर उसका उपभोग स्वंय किया जाए।”

“यह कह आप तमाम पतिव्रत बहनों के साथ अन्याय कर रहे हैं।”

“पति जब शृंगारिक वस्तुओं को मना करता है, तो पत्नी क्यों जिद्द पर अड़ती है ?जबकी देखना पति को ही है, उसी को दिखाने और उसी के ख़ुशी और संतुष्टि के लिए यह सब होता है। फिर आये दिन इस बात को लेकर पति-पत्नी में वैमनस्य क्यों होता है ? बिना शृंगार के भी बाजार जाया जा सकता है।”

“हाँ, जा सकती है मगर बदनामी पति की ही होगी। साथ की औरतें और बाहर के लोग क्या सोचेंगे ?आपको......।”

“इसका मतलब बाहरवालों और साथ के औरतों को दिखाने, उनसे तुलना करने के लिए यह सब किया जाता है पति के लिए ज़रा भी नहीं। मैंने पहले ही शंका व्यक्त किया था कि तुम जानते हुए भी निष्पक्ष जवाब न दे सकोगी। अपनी और अपनी जाति के पक्ष में बोलोगी।”

“आप यह कहकर वैधब्य का दुःख झेलती उन सारी औरतों को कलंकित कर रहे हैं, जो पूरी उम्र शृंगार विहीन, सादगी में काट लेती है। जो कभी सजती-सँवरती नहीं, जो शृंगार को हेय और तुच्छ समझती है।”

“इसका अर्थ तो यही हुआ कि पति की आड़ में अपना निजी शौक़ पूरा किया जाता है। अपने सजने और शृंगार की लालसा को तृप्त किया जाता है। वैधव्य नारियों के पास ऐसा कोई आधार नहीं होता जिसके आड़ में वह अपना काम निकाल सके। हाँ, वे चाहे तो ऐसा कर सकती है अब तो इस दिशा में समाज भी उदासीन हो गया है। तो क्या मैं यह मान लूँ कि स्त्रियों का शृंगार पूर्णतः पति को समर्पित नहीं।”

“यह कैसा कुतर्क है ?चित भी आपकी पट भी आपकी। साज-शृंगार नारी की वृŸिाक शौक़ होती है। शादी के पहले ही लड़कियों में इसका बीजारोपड़ हो जाता है। पर सुहागिन स्त्रियों का असली गहना उसका पति ही होता है।”

“युवतियाँ तो किसी को आधार, आड़ या बहाना नहीं बनाती, शादी-शुदा औरतें यह क्यों कहती है कि सारा बनाव-शृंगार, रूप-लावण्य पति के लिए ही होता है। यह क्यों नहीं कहती कि मेरी वृŸिा या मेरा शौक़ है ?यदि पति ही गहना है तो फिर दूसरे गहने के लिए इतना ज़ोर-ज़बरदस्ती और झगड़ा क्यों ? इस मामले में पति के बातों की अनदेखी, अनसुनी क्यों की जाती है ?”

“मुँहज़ोरी से चाहे आप मान लो किन्तु यह सत्य नहीं है। नारियाँ अपने पति के लिए ही सजती-सँवरती हैं।”

“तो मेरे जैसे कितने ही ऐसे पति हैं, जो पत्नी का सादगीपूर्ण रूप ही पसंद करते हैं। फिर ज़बरदस्ती यह क्यों बताया जाता है कि पति को पत्नी का शृंगारिक रूप ही पसंद है, सादगी वाला नहीं।”

“आपने कभी बताया नहीं ?”

“मैंने कब कहा कि तुम्हारा बनाव-शृंगार मुझे पसन्द है। तुम स्त्रियाँ ख़ुद ही यह मान लेती हो।”

तुनककर-“तो यह कहो कि यह सारा तंज मुझपर है ? ठीक है आगे से मैं चूड़ी, बिन्दी और मंगलसूत्र के सिवा कुछ न पहनूँगी। पैरों में पायल भी नहीं। सिंगार बाक्स को गंगा में डूबो आऊँगी।“ जो न कह पायी वह शब्द यह था कि-तब तो आपके कलेजे को ठंडक मिल जाएगी। वह धीरे-धीरे वहाँ से उठकर चली जा रही थी। मानों उसे अभी उम्मीद हो कि मनोहर उसे बुलाकर मनाएगा। अंत में दरवाज़े पर खड़े होकर बोली-”शादी से पहले तो मेरा बनाव-शंृगार आपको ख़ूब भाता था, अचानक अब क्या हो गया !” यह कहकर डबडबायी आँखें दिखाकर चली गयी।

                उसी दिन शाम को आनन्दी के भाई आये। उनकी माँ की तबियत बहुत ख़राब है। आनन्दी को ले जाने आया है। मनोहर घर लौटा तो देखा, आनन्दी पूरे शृंगार किये भाई के साथ जाने को तैयार है। माँ की तबियत ख़राब है तो सज के जाने की क्या ज़रूरत है। मैं तो यही रहूँगा फिर दिखाना किसे है ? क्या सुबह का वादा इतनी जल्दी भूल गयी ! पति की आड़ में पत्नियाँ कबतक शंृगार-स्वार्थ की सिद्धि करती रहेंगी।

उधर आनन्दी सोच रही थी, अगर बिना गहनों के गयी तो वहाँ लोग क्या सोचेंगे, कितनी जग हँसायी और बदनामी होगी। इन्हें क्या, लोग मुझसे सवाल-जवाब करेंगे। भाभियाँ और सहेलियाँ पूछेगी तो क्या कहूँगी ? बिना शृंगार का ऐसे लगता है मानों प्राण हो किन्तु शरीर नहीं। शरीर रहीत प्राण का क्या महत्व है ! यह गहन बात है जो पुरुष नहीं समझ सकता। स्त्रियों के बनाव-शृंगार में उसे केवल अपने कोष की चिंता लगी रहती है या फिर यह कि मेरे सिवा कोई दूसरा न देखे। किन्तु शृंगार तो देखने-दिखाने की वस्तु होती ही है। पर इन मूर्ख पतियों को कौन समझाएँ कि इस शृंगार किये शरीर को कोई देखता है तो यही लगता है कि मेहनत सार्थक हुआ। प्रदर्शनी दिखाने के लिए ही कि जाती है। यदि कोई देखने वाला ही नहीं हो तो प्रदर्शनी का महत्व कुछ नहीं, जितने अधिक दर्शक देखेंगे उसकी सार्थकता उतनी ही सिद्ध होगी। पुरुष के मन में सदैव छल-कपट भरा रहता है। शादी से पहले हमारा शंृगार उन्हें ख़ूब भाता है, हमें सुन्दर दिखना उन्हें अच्छा लगता है। किन्तु शादी के बाद हमें सुन्दर दिखने से उन्हें जलन और डाह होती है। शादी से पहले जो चीजें़ अच्छी लगती थी अब क्यों नहीं लगती ? इसलिए न की अब घोड़ी खूँटे से बंध गयी है, कहीं भाग नहीं सकती। जितना कम लागत में गुज़ारा हो सके कर लो।

(विधा-कहानी)

लेखक-धर्मेन्द्र कुमार

ग्राम-भवानीपुर (बढैयाबाग), पोस्ट-बाजार समिति तकिया

थाना-सासाराम, जिला-रोहतास, राज्य-बिहार, भारत