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सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के काव्य में हास्य और व्यंग्य
January 3, 2020 • डॉ. अन्जुशर्मा • Research article

वर्तमान में साहित्य की अनेक कृतियों में व्यंग्य किसी न किसी रूप में अवष्य दृष्टिगोचर होता है और यह एक विधागत स्वतन्त्र अस्तित्व लिये है। '' व्यंग्य की व्युत्पत्ति वि $ अंग = व्यंग्य से है।''1

व्यंग्य प्राचीन भारतीय वाड्मय में अंग्रेजी के 'सेटायर' के पर्याय के रूप में प्रचलित नहीं था। अंग्रेजी में 'सेटायर' षब्द से अभिप्राय किसी व्यक्ति या समाज की बुराई या न्यूनता को सीधे षब्दों में न कहकर उलटे या टेढ़े षब्दों में व्यक्त किए जाने से है। बोलचाल में प्रायः इसे ताना, बोली या चुटकी भी कहा जाता है। ''व्यंग्य एक ऐसा साहित्यिक अभिव्यक्ति या रचना है , जिसमें व्यक्ति या समाज की कमजोरियों , दुर्बलताओं कथनी और करनी में अन्तरों की समीक्षा अथवा निदा भाषा को टेढ़ी भंगिमा देकर , अथवा कभी-कभी पूर्णतःसपाट षब्दों में प्रहार करते हुए की जाती है। वह पूर्णतःगम्भीर होते हुए गंभीर हो सकती है, निर्दय लगते हुए दयालु हो सकती है, प्रहारात्मक होते हुए तटस्थ हो सकती। मखौल लगती हुई बौद्धिक हो सकती है।अतिषयोक्ति एवं अतिरंजना का आभास देने के बावजूद पूर्णतःसत्य हो सकती है।व्यंग्य में आक्रमण की उपस्थिति अनिवार्य है।''2 हमारा समाज वर्तमान में अन्याय ,अत्याचार पाखण्ड , कालाबजारी, छल,दो मुँहापन अवसरवाद आदि विसंगतियों से घिरा हुआ है। कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है।अतःरचनाकार , कृतिकार , कलाकार ने स्वयं को भी तर बाहर से आहत अनुभव किया परिणाम स्वरूप वह व्यंग्य षील हो उठा।जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव उनकी कविताओं में दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने अपनी कृति से समाज के संत्रास, षोषण और अत्याचार , खोखलेपन आदि को उद्घाटित करने का प्रयास किया है।
छायावाद के प्रमुख स्तम्भों में से एक निराला जी ऐसे कवि थे , जिन्होंने छायावादी गम्भीरता को अपने व्यंग्यों से तोड़ने के लिए सतत प्रयास किया।परमानंद श्रीवास्तव के षब्दों में ,''व्यंग्य विदूरप के उपयोग का प्रयोजन निराला के यहां प्रकट है।निराला को इसलिए भी श्रेय जाता है कि आधुनिक हिन्दी कविता में पहली बार उन्होंने व्यंग्य और करूणा के साहचर्य का उपयोग यथार्थ वादी काव्यरूप को नया संगठन देने के लिए किया।''3 निराला ने अपने षोक गीत 'सरोज स्मृति'में दुःख की करूण अभिव्यंजना की है , साथ ही उनकी रचनाओं की आलोचना करने वाले आलोचकों व सम्पादकों ,  कान्यकुब्ज-कुल-कुलांगर , समाज के ठेकेदारों के प्रति आक्रोष और व्यंग्य किया है --
''ये कान्यकुब्ज - कुलकुलांगर
खाकर पत्तल में करें छेद
इनके कर कन्या ,अर्थ खेद
इस विषम बेलि के विष ही फल
यह दग्ध मरूस्थल - नहीं सुजल।''4
डा. हुकुमचंद जी के अनुसार ,''नये पत्ते में संकलित अनेक कविताओं में निराला की वर्गीय चेतना को देखा जा सकता है।पूँजीवादी व्यवस्था पर तीक्ष्ण व्यंग्य प्रहार तथा षोषित के प्रति सहानुभूति प्रकट की है।''5 उनकी रचना 'रानी और कानी' में व्यंग्य अत्यन्त सघन रूप में सम्प्रेक्षित किया गया है।नियति की विडम्बनाओं से आहत व्यक्ति की दयनीयता के दर्षन इस प्रकार से व्यंग्य के माध्यम से स्पष्ट हो जाते हैं--
''माँ उसको कहती है रानी
आदर से ,जैसा है नाम ;
लेकिन उसका उल्टा है रूप ,
चेचक के दाग़ ,काली , नक चिप्टी
गंजासिर ,एक आँख कानी।''6
निरालाजी ने अपने कुछ गीतों में पूंजीवादी पर तीक्ष्ण प्रहार किया है। भागीरथ मिश्र जी के षब्दों में , ''पूंजीवादी समाज के निरालाजी प्रखर विरोधी थे।राजनीति के नाम पर मानव विभिन्न वर्गों में बहता जाय और नष्ट होता जाए, यह उन्हें मान्य नहीं था।निराला के गद्य और पद्य व्यंग्य , इसी सड़ी-गली एवं संकुचित राजनीति की खासी खबर लेते है।''7 उनकी कविता 'किनारा वह हमसे'का उदाहरण दृष्टव्य है -
''किनारा वह हमसे किए जा रहें हैं।
दिखाने को दर्षन दिये जा रहे है।
खुला भेद ,विजयी कहा येहु,जो,
लहू दूसरे का पिये जा रहे है।''8
प्रगतिवादी आन्दोलनों में सर्वहारा का समर्थन करते हुए निराला ने 'पांचक'नामक कविता में नव्य सामाजिक परिदृष्य की विरूपताओं पर आक्रमक व्यंग्य हैं।
''आदमी हमारा तभी हाराहै ,
दूसरे के हाथ जब उतारा है।
राह का लगान गैर ने दिया,
यानी रास्ता हमारा बन्द किया।
माल हाट में है और भाव नहीं ,
जैसे लड़ने को खड़े दाव नहीं''9
कुकुरमुत्ता निराला की आत्मकथात्मक षैली में लिखी एक प्रसिद्ध व्यंग्य परक रचना है ,जिसमें निराला ने हास्य व्यंग्य को सतहीपन के दलदल से निकालकर एक ऐसा स्वरूप पाठक के सम्मुख उकेरा है जो व्यंग्कार की तटस्थता और अद्भुत आलोचक प्रतिभा का परिचय दिया है।
''अबे ,सुन बे गुलाब
भूल मत नहीं जो पाई खुषबू ,रंगोंआब।
खून चूसा खाद का तूने अषिष्ट
डाल पर इतरा रहा कैप्टिलिस्ट।
कितनों को तूने बनाया गुलाब ,
माली कर रखा, सहा या जाड़ा-घाम,
हाथ जिसके तू लगा
पैर सर पेर खकर पीछे को भागा
औरत की जानिब मैदान यह छोड़कर''10
कुकुरमुत्ता को निराला के चौतरफा व्यंग्य का अद्भुत नमूना स्वीकारते हुए धनंजय वर्मा ने निराला : काव्य और व्यक्तित्व में लिखा है-'' कुकुरमुत्ता असफलता नहीं , व्यंग्य की सफलता का है।मेरी दृष्टि में कुकुरमुत्ता का व्यंग्य विविध क्षेत्रीय एवं तीव्र है।जो भी वर्ग कुकुरमुत्ता के प्रतिमोह दिखाकर अपना प्रतीक माने गाव ही व्यंग्य का षिकार होगा।इस रचना के पीछे कोई असाधारण प्रतिभा और लक्ष्य कार्य कर रहा है।''11
छायावादी कवियों में क्योंकि निराला सर्वाधिक क्रान्तिकारी माने जाते हैं ,इसीलिए उनके खण्डकाव्य 'तुलसीदास' में व्यंग्य का प्रादुर्भाव को आकस्मिक नहीं माना जा सकता है। प्रस्तुत खण्डकाव्य में व्यंग्यात्मक प्रहार है परन्तु हास्य एवं विनोद नहीं है।जिसमें उन्होंने रत्नावली द्वारा तुलसीदास को तिरस्कृत किये जाने की स्थिति का प्रसंग प्रस्तुत किया है।रत्नावली द्वारा उच्चारित तीखे और मर्मान्तक व्यंग्य ने तुलसीदास के जीवन में क्रान्ति मचा दी थी।
''धिक! आये तुम अनाहूत
धो दिया श्रेष्ठ कुल धर्म धूत,
राम के नहीं ,काम के सुत कहलाए!
हो बिके जहाँ तुम बिना दाम
वह नहीं और कुछ हाड़-चाम!
कैसी षिक्षा, कैसे विराम पर आए।''12
कबीर की भांति निराला ने भी अपने समय में फैली धार्मिक विषमताओं का पुरजोर विरोध किया है। 'दान'उनकी ऐसी ही व्यंग्य परक रचना है। जिसमें उन्होंने तथा कथित भक्त पर कटु व्यंग्य किया है।जहां वानर को तो पुए खिलाए जाते है किन्तु भूखे भिखारी को देखकर भी अनदेखा कर दिया जाता है-
झोली से पुए निकाल लिये,
बढ़ते कपियों के हाथ दियेः
देखा भी नहीं उधर फिरकर
जिस ओर रहा भिक्षु इतरः
चिल्लाया किया दूरदान,
बोला मैं ,धन्य श्रेष्ठ मानव''13
दुःख की अवस्था में मानव चुप्पी साध लेता है। वह कभी हंसता है तो कभी रोता है।अत्यधिक क्रोधित होने पर वह मुख से तो कुछ नहीं कहकर व्यंग्य का सहारा लेता है। कविवर निराला भी विरोधियों के मुख से अपनी निंदा सुनते-सुनते परेषान हो गए थे।उनके हृदय में अत्यधिक क्रौध था किन्तु वह समाज के सम्मुख खुलकर न तो हंस पा रहें थे , और न ही अपने षोक को दबा पा रहें थे , परिणाम स्वरूप यह दबाव अर्न्तमुखी व्यंग्य के रूप में व्यक्त होता है अनामिका काव्य संग्रह की कविता 'सच है' का एक उदाहरण-
''यह सच है.......
तुमने जो दिया दान दान वह,
हिंदी के हित का अभिमान वह,
जनता का जन-ताका का ज्ञान वह,
सच्चा कल्याण का अथच है।
यह सच है।''14
कविवर निराला जितना अपने मन को दबाने का प्रयास करते उतना ही वह कूट षैली के निकट पहुंच जाते हैं।गीतिका काव्य संग्रह की कविता 'नुपुर चरणरणन' का उदाहरण इस तथ्य की पुष्टि करता है-
''चलता तू ,थकता तू ,
रूक-रूककर फिर बकता तू ,
कमजोरी दुनिया हो ,तो
कह क्या सकता तू ?
जो धुला उसे धोता क्यों?
रे कुछ ना हुआ ,तो क्या ?
जग धोका ,तो रो क्या ?''15
उर्पयुक्त विवेचन एवं उद्धाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि निराला ने व्यंग्य को समृद्ध बनाने का सार्थक प्रयास किया है।''निराला का काव्य उनके व्यक्तित्व से अनुप्रेरित है, जिस प्रकार उनके व्यक्तित्व में परुषता-कोमलता , विरक्ति-आसक्ति , योग-भोग , विष- अमृत, कटु-मधुर, दर्षन ,राष्ट्रीयता आदि विरोधी तत्व मिलते हैं। उसी प्रकार उनकी काव्य-वीणा भी विषम झंकृत है। उनकी कविता में अनेक संवादी-विवादी स्वर उनके विभाजित एवं विकीर्ण व्यक्तित्व के प्रमाण है।निराला के काव्य में विकास की कोई निष्चित दिषा नहीं हैं, एक ओर वे 'जूही की कली' पर मोहक दृष्टि निक्षेप करते हैं और दूसरी ओर वे सोते भारतीयों की निद्रा को तोड़ने के लिए 'महाराज षिवाजी का पत्र'तैयार करते हैं।इस पत्र में जगाने के कल,एक घोर ललकार है।दीन-दुखियों के प्रति सहानुभूति व्यक्त करके और समाज की दुर्व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए निराला अपने वयक्तित्व के मार्ग को बिखराव से आकीर्ण बनाते चले जाते हैं।उनका विद्रोही एवं आत्म विष्वासी वयक्तित्व अपने मूल रूप में स्त्रैणता संमुक्त वज्र परुषता से दृढ़ दिखता है।''16 'कुकुरमुत्ता' के अतिरिक्त 'नये पत्ते' की समस्त कविताएँ व्यंग्य से परिपूर्ण है।जहाँ 'मास्को डायेलाग्स'तथा 'महगूमहगारहा' राजनीति और राजनेताओं के कारनामों का पर्दाफाष करती है तो वहीं 'गर्म पकौड़ी' 'प्रेम संगीत' के माध्यम से उन्होंने अभिजात्य वर्ग के विरूद्ध सामान्य जनमानस को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है।अतः यह कहना कदापि अतिशयोक्ति नहीं होगा कि निराला आधुनिक हिन्दी के युग प्रर्वतक व्यंग्यकार है जिन्होंने व्यंग्य को अभिजात्य और छन्द दोनों से मुक्त कर दिया है।उनके काव्य में आन्तिरिक विद्रोह की प्रहारात्मकता संरचना ही है जिसने उन्हें विद्रोही कवि के रूप में साहित्य जगत में ख्याति प्रदान की है।इसी कारण इन का नाम हिन्दी के प्रमुख व्यंग्यकारों की श्रेणी में लिया जा सकता है।
सन्दर्भग्रन्थ सूची :-- 
1. पांडे ,रामखेतावन , हिन्दी साहित्य कोष , भाग -1 , पृ0-741
2. गर्ग ,षेरजंग , व्यंग्य के मूलभूत प्रष्न , आलेख प्रकाषनवी-8 , नवीन षाहदरा , दिल्ली, पृ0-26
3. श्रीवास्तव ,परमानंद , पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला , पृ0-60-61
4. निराला ,सूर्यकान्त त्रिपाठी, अनामिका , नवजादिक लाल , 23 षंकरघोष लेन, कलकत्ता, पृ0-129
5. राजपाल ,हुकुमचन्द ,निराला की काव्यचेतना , पृ0-30
6. निराला ,सूर्यकान्त त्रिपाठी, नयेपत्ते , लोकभारती प्रकाषन, इलाहबाद, पृ0-129-130
7. मिश्र ,भागीरथ , निराला काव्य का अध्ययन , राधाकृष्णप्रकाषन, दिल्ली,पृ0-83
8. नवल, नंदकिषोर, निराला रचनावली खण्ड-2, राजकमल प्रकाषन ,नईदिल्ली ,पृ0-140
9. निराला ,सूर्यकान्त त्रिपाठी, नयेपत्ते , लोकभारती प्रकाषन, इलाहबाद, पृ0-32
10. निराला ,सूर्यकान्त त्रिपाठी,  कुकुरमुत्ता , वर्जिन साहित्यपीठ, नजफगढ़, नईदिल्ली, पृ0-3
11. गर्ग ,षेरजंग , व्यंग्य के मूलभूत प्रष्न , आलेख प्रकाषनवी-8 , नवीन षाहदरा , दिल्ली, पृ0-48
12. निराला  ,सूर्यकान्त त्रिपाठी, अपरा (संचयन),साहित्यकार संसद, प्रयाग, पृ0-163
13. नवल, नंदकिषोर,  निराला रचनावली प्रथम खण्ड , राजकमल प्रकाषन ,नईदिल्ली , पृ0-309
14. षर्मा ,रामविलास, निराला की साहित्य साधना भाग -2 , राजकमल प्रकाषन ,नईदिल्ली ,पृ0-233
15. वही ,पृ-234
16. षर्मा, देवव्रत, निराला के काव्य में बिम्ब और प्रतीक ,आषा प्रकाषन गृह , दिल्ली , सं-1973, पृ0-76

 

डॉ. अन्जुशर्मा
हिन्दीविभाग
एस.एस.डी.पी.सी.पी.जी.कॉलेजरूड़की (हरिद्वार)
     उत्तराखण्ड 
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