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तकनीकि शिक्षा संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों की  शिक्षण दक्षता का विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि पर प्रभाव
January 12, 2020 •   डॉ. घनश्याम शर्मा, जगदीश चन्द्र शर्मा • Research article

तकनीकि शिक्षा संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों की 
शिक्षण दक्षता का विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि पर प्रभाव
      डॉ. घनश्याम शर्मा, जगदीश चन्द्र शर्मा
प्राचार्य,महर्षि दाधीच शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, केशवपुरा, कोटा,राज., प्राध्यापक, डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम विश्वविद्यालय, इंदौर, मप्र.


 सार:- प्रस्तुत शोधपत्र को तैयार करने से पूर्व हमने अनुभव किया है कि तकनीकी संस्थानों मे कार्य करने वाले शिक्षक किसी प्रकार का प्रशिक्षण नही लेते है इससे उनकी शिक्षण दक्षता प्रभावित होती है तथा इससे अध्ययनरत विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि पर भी बुरा प्रभाव पडता है इस शोध पत्र मे हमने इन्दौर व उज्जैन के विभिन्न तकनीकी संस्थाओ से आंकडे एकत्र किये हैं तथा ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रो के निजी व सरकारी तकनीकी संस्थानो मे भी शैक्षिक दक्षता व शैक्षिक उपलब्धि मे अन्तर देखा गया है।
 प्रस्तावना:- शिक्षा एक त्रिमुखी प्रक्रिया है। शिक्षक, शिक्षार्थी व पाठ्यक्रम इसके तीन धु्रव हैं। पाठ्यक्रम के माध्यम से शिक्षक व शिक्षार्थी की अन्त:क्रिया से ही अधिगम उद्ेश्यों की प्राप्ति होती है। शैक्षिक प्रक्रिया में शिक्षक द्वारा शिक्षार्थी में केवल पाठ्यक्रम ही हस्तान्तरित नहीं किया जाता बल्कि वह अपने व्यक्तित्व की छाप भी छोड़ता है। शिक्षण की प्रभावशीलता बहुत कुछ अर्हता प्राप्त योग्यता, कुशलता व दक्षता पर अवलम्बित हैं।
 वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में शिक्षकों को अपने व्यवसाय के सामथ्र्य को सिद्ध करने के लिए ज्ञान, कौशल, दक्षता, मूल्य व अभिवृति संबधी योग्यताओं को अधिक परिवर्तित करने की आवश्यकता है। शिक्षण सर्वाधिक सम्मानजनक व्यवसायों में से एक हैं। शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य को प्रभावी ढ़ंग से दक्षता के स्तर पर खरा उतरने व उपयुक्त कौशल, अभिवृत्तियों तथा योग्यताओं से परिसम्पन्न करना हैं। वास्तव में अध्यापन कार्य शिक्षण सिद्वान्तों के निर्देशन में ही शिक्षक व्यवहार से प्रभावी हो सकता है। प्रभावी शिक्षण के लिए किसी एक ही सिद्वान्त की पूर्ति पर्याप्त नहीं है बल्कि विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न अध्यापन योजनाएँ बनानी होती हैं। अध्यापक का छात्रों के प्रति रूझान तथा प्रोत्साहन कक्षा में उच्च अभिप्रेरणा का वातावरण बना सकता है। अत:शिक्षा विशेषकर तकनीकी शिक्षा एक ऐसा माध्यम हैं जो भारत को विकास के उच्चतर मार्ग पर अग्रसर कर सकती हैं। यह एक ऐसा दायित्व हैं जो असंख्यमूर्त तथा अर्मूत रूपों में विकास के विविध क्षेत्रों में हमारी सभी प्रतिबद्वताओं कोलाभ पहुँचाती हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी हैं शिक्षक को कक्षा शिक्षण की वास्तविक परिस्थितियों का ज्ञान होना अति आवश्यक हैं तभी वह शिक्षा के स्तर को उन्नति के पथ पर अग्रसर कर सकता है।
शब्दकुंजी:-तकनीकी शिक्षा,समायोजन,शिक्षण दक्षता,शैक्षिक उपलब्धि, आई टी आई।
 तकनीकी शिक्षा:-भारतवर्ष में स्वतन्त्रता पूर्व के काल में तकनीकी शिक्षा के विकास के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया गया। इस शताब्दी के पूर्व जो तकनीकी या यान्त्रिकी संस्थायें खोली गई उनका प्रयोजन प्रशासन के लिए कर्मिकों को प्रशिक्षित करना था। सन् 1904 की शिक्षा नीति के सरकारी प्रस्ताव में उद्योग के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था पर बल दिया गया था। भारत में इस पद के अन्तगर्त अनेक प्रकार के पाठ्यक्रम आते हैं जिनका विस्तार स्नातकोत्तर, पाठ्यक्रम और अनुसंधान से लेकर  प्रशिक्षण तक माना जाता हैं। पत्रोपाधि डिप्लोमा, प्रमाणपत्र, कनिष्ठ तकनीकी विद्यालय ,माध्यमिक स्तर के तकनीकी पाठ्यक्रम सभी इस पद से व्यक्त किये जाते हैं। एक और शैक्षिक विकास की समाप्ति होती हैं दुसरी और जीविकोपार्जन के लिए उपयोगी तकनीकों और कौशलों की प्राप्ति होती हैं। इस ही सन्दर्भ में प्रौद्योगिकी शब्द इससे अधिक व्यापक हैं।
 शिक्षण दक्षता:-शिक्षक के लिए यह आवष्यक हैं कि वह अपने शिक्षण को प्रभावी बनाकर छात्रों को अध्ययन के प्रति जागरूक बनायें और उनमें ऐसी भावनाऐ विकसित करें कि वे हर समय सीखने की जिज्ञासा रखें अर्थात् शिक्षण प्रभाविकता में ही शिक्षण के सिद्वान्त ,शिक्षण के उद्वेश्य तथा शिक्षण के प्रतिमान निहित हैं। शिक्षण दक्षता से तात्पर्य हैं प्रभावक रूप से विषयवस्तु का प्रस्तुतीकरण अर्थात पूर्व निर्धारित उद्ेश्यों तथा वांछित व्यवहारगत परिवर्तनों की सरल सुगम तथा वस्तुनिष्ट रूप से हेतु ऐसा शिक्षण जो रोचक हो आकर्षक हो तथा विधार्थियों को पुर्नबलन प्रदान करता हो प्रभावी समझा जाता हैं। शिक्षण दक्षता को अध्ययन के सभी तीन स्तरों के संन्दर्भ में समझना चाहिए ना कि अन्त:क्रिया के स्तर जिनकी अवस्थाएॅ है -
1. शिक्षण से पूर्व तत्परता की अवस्था, 2. शिक्षण की अन्त:प्रक्रिया की अवस्था,3. व्यवहारगत् मूल्यांकन की अवस्था।
 शिक्षण दक्षता का विचार प्रत्येक प्रकार के अधिगम के साथ परिवर्तित होता रहता हैं। तकनीकी शिक्षा विशेषकर पॉलोटेक्निक व आई. टी. आई. के शिक्षकों की कक्षागत अन्त:क्रिया का विश्लेषण कर उनकी कक्षागत शिक्षण दक्षता का पता लगाया जाएगा।
उद्ेष्य:-1. सरकारी व निजी, शहरी व ग्रामीण आई टी आई के शिक्षकों कि  शिक्षण दक्षता का अध्ययन करना।
2. सरकारी व निजी, शहरी व ग्रामीण आई टी आई के विद्यार्थियों कि  शैक्षिक उपलब्धि का अध्ययन करना।
3. सरकारी व निजी, शहरी व ग्रामीण पॉलोटेक्निक कॉलेज के   शिक्षकों कि शिक्षण दक्षता का अध्ययन करना।
4. सरकारी व निजी, शहरी व ग्रामीण पॉलोटेक्निक कॉलेज के विद्यार्थियों कि शैक्षिक उपलब्धि का अध्ययन करना।
परिकल्पना:-1. सरकारी व निजी, शहरी व ग्रामीण पॉलोटेक्निक   कॉलेज के शिक्षकों कि शिक्षण दक्षता में कोई सार्थक अंतर नहीं हैं।
2. सरकारी व निजी, शहरी व ग्रामीण आई टी आई के शिक्षकों कि  शिक्षण दक्षता कोई सार्थक अंतर नहीं हैं।
3. सरकारी, निजी, शहरी व ग्रामीण पॉलोटेक्निक कॉलेज के   विद्यार्थियों कि शैक्षिक उपलब्धि में कोई सार्थक अंतर नहीं हैं।
4. सरकारी व निजी, शहरी व ग्रामीण आई टी आई के विद्यार्थियों कि  शैक्षिक उपलब्धि में कोई सार्थक अंतर नहीं हैं।
परिसीमन:- अध्ययन के लिये आंकडे एकत्रीकरण के लिये सीमा का निर्धारण इन्दौर उज्जैन रखा गया है 
उपकरण:- इस अध्ययन के लिये उपकरण विद्यार्थीयों व शिक्षको के लिये भिन्न भिन्न है तथा स्व निर्मित प्रश्नावली का प्रयोग किया गया है 
न्यादर्श :-तकनीेकी संस्थान शिक्षक  विद्यार्थी
 पोलिटक्निक 30  100
 आई टी आई 30  100
 कुल  60  200
शोध विधि:- प्रस्तुत शोध पत्र सर्वेक्षण विधि पर आधारित है।
सांख्यिकी विश्लेषण व परिणाम:- प्राप्त आकड़ो के विश्लेष्ण करनेपर सरकारी तथा निजी पॉलोटेक्निक शिक्षकों के मान 6.57 व 6.99 प्राप्त हुए हैं। इनसें प्राप्त टी का मान 2.90 हैं जो कि सार्थकता स्तर 0.01 पर सारणीयन मूल्य 2.62 से अधिक हैं। अत: शून्य परिकल्पना सरकारी व निजी पॉलोटेटेक्निक शिक्षकों की शिक्षण दक्षता में सार्थक अंतर नहीं है। परिणामस्वरूप परिकल्पना अस्वीकृत किया जाता हैं। सरकारी पॉलोटेक्निक शिक्षकों का मध्यमान निजी पॉलोटेक्निक शिक्षकों से अधिक हैं। इसलिए कक्षागत् परिस्थितियों में सरकारी पॉलोटेक्निक कॉलेज के शिक्षक शिक्षण के प्रति अधिक दक्ष पाए गए। सरकारी पॉलोटेक्निक कॉलेज के शिक्षक कक्षागत् परिस्थितियों में अधिक प्रभावी रूप से शिक्षण कार्य करते हैं। इससे स्पष्ट होता हैं कि सरकारी व निजी पॉलोटेक्निक शिक्षकों की शिक्षण दक्षता में सार्थक अंतर होता हैं। शहरी व ग्रामीण पॉलीटेक्निक कॉलेज के शिक्षकों की शिक्षण दक्षता के मध्यमान 49.16 व 50.6 प्राप्त हुए हैं। मानक विचलन की गणना करने पर शहरी पॉलोटेक्निक तथा ग्रामीण पॉलोटेक्निक शिक्षकों का मान 6.68 व 7.36 प्राप्त हुआ हैं। इनसे प्राप्त टी का मान 1.02 हैं जो कि सार्थकता स्तर 0.05 पर सारणीयन मूल्य 1.98 से कम हैं। अत: शून्य परिकल्पना शून्य शहरी व ग्रा्रामीण पॉलोटेटेेिनक कॉलेज के शिक्षकों कि शिक्षण दक्षता में सार्थर्कता अंतर नहीं हैं। को स्वीकृत किया जाता हैं।ग्रामीण व शहरी पॉलोटेक्निक शिक्षकों की शिक्षण दक्षता के मध्यमानों में कुछ ही अंतर हैं इसलिए कक्षागत् परिस्थितियों में शहरी व ग्रामीण पॉलोटेक्निक कॉलेज के शिक्षक कक्षागत् परिस्थितियों में समान रूप से शिक्षण कार्य करते हैं। इससे स्पष्ट होता हैं कि सरकारी व निजी पॉलोटेक्निक शिक्षकों की शिक्षण दक्षता में सार्थक अंतर नहीं होता हैं। सरकारी व निजी आई टी आई के शिक्षकों की शिक्षण दक्षता के मध्यमान 53.3 व 47.54 प्राप्त हुए हैं। मानक विचलन की गणना करने पर शहरी सरकारी व निजी आई टी आई शिक्षकों का मान 6.56 व 10.13प्राप्त हुआ हैं। इनसे प्राप्त टी का मान 3.37 हैं जो कि सार्थकता स्तर0.01 पर सारणीयन मूल्य 2.62 से अधिक हैं। अत: शून्य परिकल्पना सरकारी व निजी आईटी आई के शिक्षकोंं कि शिक्षण दक्षता में सार्थक अतंर नहीं हैैं। अस्वीकृत किया जाता हैं। सरकारी आई टी आई शिक्षकों का मध्यमान व निजी आई टी आई शिक्षकों सेअधिक हैं इसलिए कक्षागत् परिस्थितियों में सरकारी आई टी आई के शिक्षक अधिक दक्षपाए गए। सरकारी आई टी आई के शिक्षक कक्षागत् परिस्थितियों में अधिक प्रभावी रूप से शिक्षण कार्य करते हैं। इससे स्पष्ट होता हैं कि सरकारी व निजी आई टी आई शिक्षकों की शिक्षण दक्षता में सार्थक अंतर होता हैं। शहरी आई टी आई शिक्षकों का मध्यमान व ग्रामीण आई टी आई शिक्षकों से कुछ ही अधिक हैं। इसलिए कक्षागत् परिस्थितियों में शहरी व ग्रामीण आई टी आई कॉलेज के शिक्षक समान रूप से दक्ष पाए गए।शहरी व ग्रामीण आई टी आई कॉलेज के शिक्षक कक्षागत् परिस्थितियों में समान रूप से शिक्षण कार्य करते हैं। इससे स्पष्ट होता हैं कि सरकारी व निजी आई टी आई शिक्षकों की शिक्षण दक्षता में सार्थक अंतर नहीं होता हैं निजी पॉलोटेक्निक विद्यार्थियों का मध्यमान व सरकारी पॉलोटेक्निक विद्यार्थियों से अधिक हैं इसलिए कक्षागत् परिस्थितियों में सरकारी पॉलोटेक्निक कॉलेज के विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि निजी पॉलोटेक्निक विद्यार्थियों से कम हैं अर्थात इससे स्पष्ट होता हैं कि सरकारी व निजी पॉलोटेक्निक विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि में सार्थक अंतर होता हैं। शहरी पॉलोटेक्निक विद्यार्थियों का मध्यमान व ग्रामीण पॉलोटेक्निक विद्यार्थियों से अधिक हैं इसलिए कक्षागत् परिस्थितियों में शहरी पॉलोटेक्निक कॉलेज के विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि निजी पॉलोटेक्निक विद्यार्थियों से अधिक हैं। अत: इससे स्पष्ट होता हैं कि शहरी व ग्रामीण पॉलोटेक्निक विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि में सार्थक अंतर होता हैं। सरकारी आई टी आई के विद्यार्थियों का मध्यमान व निजी आई टी आई विद्यार्थियों से अधिक हैं इसलिए कक्षागत् परिस्थितियों में सरकारी आई टी आई के विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि निजी आई टी आई के विद्यार्थियों से अधिक हैं। अत: इससे स्पष्ट होता हैं कि सरकारी व निजी पॉलोटेक्निक विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि में सार्थक अंतर होता हैं।कि ग्रामीण आई टी आई के विद्यार्थियों का मध्यमान व शहरी आई टी आई विद्यार्थियों से अधिक हैं इसलिए कक्षागत् परिस्थितियों में ग्रामीण आई टी आई के विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि शहरी आई टी आई के विद्यार्थियों से अधिक हैं। इससे स्पष्ट होता हैं कि सरकारी व निजी पॉलोटेक्निक विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि में सार्थक अंतर होता हैं।
निष्कर्ष:- शहरी आई टी आई शिक्षकों की शिक्षण दक्षता का मध्यमान अधिक होते हुए भी वहाँ के विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि अधिक नहीं हैं। परन्तु ग्रामीण आई टी आई शिक्षकों की शिक्षण दक्षता कम होते हुए भी वहाँ के विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि अधिक हैं। इसलिए शहरी आई टी आई शिक्षकों की शिक्षण दक्षता का विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि से सार्थक संबंध ंनहीं हैं। शहरी आई टी आई शिक्षकों की शिक्षण दक्षता का विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि पर प्रभाव नहीं पडता हैं।
सन्दर्भ सुची:-
1. तिवारी गोविन्द (1989) शक्षिक एवं मनोवैज्ञानिक अनुसंधान के मूलाधार   विनोद पुस्तक मंदिर आगरा।
2. पी एसनायडु (1992) शैक्षिक अनुसंधान के मूलतत्व प्रथम संस्करण विनोद  पुस्तक मंदिर।
3. वर्मा, जी.एस. (2005) शैक्षिक तकनीकी लॉयल बुक डिपो, मेरठ।
4. अस्थाना विपिन  (2010-2011) शिक्षा और मनोविज्ञान में सांख्यिकी   अग्रवाल पब्लिकेशन।
5. सिंह रामपाल (2013) शैक्षिक अनुसंधान एवं संाख्यिकी अग्रवाल पब्लिकेशन
6. सिंह,रीना,गुप्ता डी.के.(2010) उच्च शिक्षा स्तर पर कार्यरत शिक्षकों की कक्षा  शिक्षण दक्षता का अध्ययन।
7. कुमार सुरेन्द्र (2010) प्राथमिक स्तर पर नियमित शिक्षकों एवं शिक्षामित्रों की
       शिक्षण दक्षता का अध्ययन, शिक्षा शास्त्र विभाग इलाहाबाद।
8. बाबूलाल (2011) बालक अभिभावकों संबधों का बालकों की शैक्षिक उपलब्धि
       पर पडऩे वाले प्रभाव का अध्ययन।
9. डी.एन श्रीवास्तव (2009) अनुसंधान विधियॉँ आगरा साहित्य प्रकाशन।