ALL Hindi literature/Hindi Kavita Etc. Research article literature News Interview Research Paper Guidline
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रामकाव्य और राम का स्वरूप
February 23, 2020 • सुमन रानी • Research article

‘रामकथा और राम’ भारतीय संस्कृति और सभ्यता का बहुत सुन्दर पुंज है। रामकाव्य विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की प्रेरणा देता है और राम का व्यक्तित्व और उनकी कथा इतनी सघन और व्यापक है कि उसमें सम्पूर्ण जीवन की गहराई और सूक्ष्मता, विस्तार और सौन्दर्य, संघर्ष और सत्य, यथार्थ और आदर्श विधि-विश्वास और प्रज्ञा आदि स्थितियों, चित्तवृत्तियों और भावभूमियों की अभिव्यक्ति के लिए विपुल आकाश है। आधुनिक युग में रामकथा विश्व के सभी प्राणियों के लिए ज्ञान और मूल्य का स्रोत रहेगी क्योंकि रामकाव्य में सभी प्राणियों के हित की बात है, जीवन-मूल्यों का सार है, राष्ट्र के प्रति प्रेम-भावना और त्याग है। पूरे संसार का सुख और खुशी की भावना है। रामकथा ‘मानवमन और मानवप्रज्ञा’ का प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए यदि रामकथा को जीवन का महाकाव्य कहा जाये तो यह अतिश्योक्ति न होगी। रामकाव्य का प्रभाव भारत के जनमानस के साथ विश्व के सभी देशों पर पड़ा है। विदेशी भाषाओं में रामकथा और राम के स्वरूप की व्याख्या हुई है। रामकाव्य को विश्व के समग्र साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है और जनमानस के हृदय में राम का मर्यादा पुरुषोत्तम रूप और स्वरूप भी अमिट है। एशिया में रामकथा में राम का स्वरूप में सभी रचनाकारों ने अपनी-अपनी लेखनी और भावों की अपार आस्था से अभिव्यक्त कर शब्दों में लिखा है।
श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है क्योंकि राम में कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन हुआ नहीं मिलता। संपूर्ण भारतीय समाज में राम का आदर्श रूप उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम के सभी भागों में स्वीकार किया गया है। भारत की हर एक भाषा की अपनी रामकथाएँ हैं। इसके उपरांत भारत के बाहर के देशों-फिलीपाइंस, थाईलैंड, लाओस, मंगोलिया, साईबेरिया, मलेशिया, बर्मा अब म्यांमार, स्याम, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा, कम्बोडिया, चीन, जापान, श्रीलंका, वियतनाम आदि में भी रामकथा प्रचलित है। बौद्ध, जैन और इस्लामी रामायण भी हैं। मैक्समूलर, जोंस, कीथ, ग्रीफिथ, बारान्निकोव जैसे विद्वान राम के त्यागमय, सत्यनिष्ठ जीवन से आकर्षित थे। किसी भी काल्पनिक पात्र का अन्य देशों, अन्य धर्मों में हजारों वर्षों से ऐसे प्रभाव का टिका रहना संभव नहीं। भारतीय मानस को तो राम कभी काल्पनिक लगे ही नहीं। वे घर -घर में इष्ट की तरह पूजे जाते हैं. राम ने अपने युग में एकता का महान कार्य किया था। आर्य, निषाद, भील, वानर, राक्षस आदि भिन्न संस्कृतियों के बीच सुमेल साधने का काम राम ने किया। रावण की मृत्यु के बाद राम के मन में रावण के प्रति कोई द्वेष नहीं।
राम शब्द का अर्थ है- ‘रा’ शब्द परिपूर्णता का बोधक है और ‘म’ परमेश्वर वाचक है। अर्थात् रमंति इति रामः जो रोम-रोम में रहता है, जो समूचे ब्रह्मांड में रमण करता है वही राम हैं। भारतीय लोक-जीवन में राम-नाम की प्रभुसत्ता का विस्तार सहज देखा जा सकता हैं। बच्चों के नाम में राम का सर्वाधिक प्रयोग इस तथ्य का अकाट्य प्रमाण है। अभिवादन के आदान-प्रदान में ‘राम-राम’, ‘जै रामजी की’, ‘जै सियाराम, ‘जै राम’ का उपयोग वास्तव में राम नाम के प्रति गहन लोकनिष्ठा और श्रद्धा के प्रकटीकरण का माध्यम शताब्दियों से बना हुआ है। भारत में तो किसान हल चलाने से पहले बैलों को कहता ले राम का नाम और शुरू करे काम। 
लोक-जीवन में रामलीलाओं का युग-युगांतरों से समावेश किया गया है। लोकप्रियता और व्यापकता की दृष्टि से रामलीला का हमारे जनजीवन में विशिष्ट स्थान है। इस रचना में एक समूचे समुदाय की धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं कलात्मक अभिव्यक्ति होती है। रामलीला में दर्शकों का जितना सहज एवं संपूर्ण सहयोग होता है उतना किसी और नाट्य में असंभव-सा है। रामचरितमानस में रामलीला की ऐतिहासिकता के स्पष्ट संकेत हैं। उत्तरकांड में काक भुशुंडजी कहते हैं-
‘चरम देह द्विज के मैं पायी। सुर दुर्लभ पुराण श्रुति गायी।
खेलऊँ तहूँ बालकन्ह मीला। करऊँ सकल रघुनायक लीला।’
मनुष्य साँसारिक होते हुए भी राम नाम के सहारे यह संसार पार पा सकता है।
‘राम नाम कहि राम कहि राम राम कहि राम। 
इंडोनेशिया में अधिकतर मुस्लमानों का निवास होने पर भी उनकी संस्कृति पर रामायण की गहरी छाप है। रामकथा पर आधारित जावा की प्राचीनतम कृति ‘रामायण काकावीन’ जो कावी भाषा में है। यह जावा की प्राचीन शास्त्रीय भाषा है। काकावीन का अर्थ महाकाव्य है योगीश्वर द्वारा रचित यह नौवीं शताब्दी की रचना है। रामायण काकावीन का स्थान सर्वोपरि है। यह छब्बीस अध्यायों में विभक्त एक विशाल ग्रंथ है, जिसमें महाराज दशरथ को विश्वरंजन की संज्ञा से विभूषित किया गया है। इस रचना का आरंभ रामजन्म से होता है। कावी भाषा में कई महाकाव्यों का सृजन हुआ है- ‘उत्तरकांड’ गद्य, चरित रामायण अथवा कवि जानकी, बाली द्वीप व परवर्ती रचनाओं में ‘सेरतकांड’, ‘रामकेलिंग’ और ‘सेरी राम’ का नाम उल्लेखनीय है। इनके अतिरिक्त ग्यारहवीं शताब्दी की रचना-‘सुमनसांतक’ में इंदुमती का जन्म, अज का विवाह और दशरथ की जन्मकथा का वर्णन हुआ है। चैदहवीं शताब्दी की रचना अर्जुन विजय की कथावस्तु का आधार अर्जुन सहस्रबाहु द्वारा रावण की पराजय है।
महाकवि रामकथा के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं-राम चरित्र जीवन की संपूर्णता का प्रतीक है। राम के महान आदर्श का अनुकरण जनजीवन में हो, इसी उद्देश्य से इस महाकाव्य की रचना की गई है। यह कथा संसार की महानतम पवित्र कथाओं में एक है। रचना के अंत में महाकवि योगीश्वर उत्तम विचारवाले सभी विद्वानों से क्षमा याचना करते हैं। 
कंपूचिया की रामायण ख्मेर लिपी में है। एस. कार्पेल्स द्वारा लिखित रामकेर्ति के सोलह सर्गों (1-10 तथा 76-80) का प्रकाशन अलग-अलग पुस्तिकाओं में हुआ था। इसकी प्रत्येक पुस्तिका पर रामायण के किसी-न-किसी आख्यान का चित्र है।2 कंपूचिया की रामायण को वहाँ के लोग ‘रिआमकेर’ के नाम से जानते हैं, किंतु साहित्य में यह ‘रामकेर्ति’ के नाम से विख्यात है।
‘रामकेर्ति’ ख्मेर साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृति है। ‘ख्मेर’ कंपूचिया की भाषा का नाम है। ‘रामकेर्ति’ और वाल्मीकि रामायण में अत्यधिक समानता है।
दक्षिण-पूर्व एशिया की रामकथाओं में सीता त्याग की घटना के साथ एक नया आयाम जुड़़ गया है, अतुल्य के आग्रह पर सीता द्वारा रावण का चित्र बनाना। अतुल्य का उस चित्र में प्रवेश कर जाना। सीता द्वारा उस चित्र मिट नहीं पाना और उसे पलँग के नीचे छिपा देना। राम का पलँग पर लेटते ही तीव्र ज्वर से पीड़ित हो जाना। इस यथार्थ से अवगत होने पर वे लक्ष्मण से वन में ले जाकर सीता का वध करने का आदेश देते हैं और मृत सीता का कलेजा लाने के लिए कहते हैं। वन पहुँचकर लक्ष्मण जब सीता पर तलवार प्रहार करते हैं, तब वह पुष्पहार बन जाता है। 
लक्ष्मण से सीता त्याग के यथार्थ को जानकर राम उनके पास गए। उन्होंने सीता से क्षमा-याचना की, किंतु वे द्रवित नहीं हुईं। उन्होंने अपने दोनों पुत्रों को राम के साथ जाने दिया और स्वयं पृथ्वी में प्रवेश कर गई। हनुमान ने पाताल जाकर सीता से लौटने का अनुरोध किया। उन्होंने उस आग्रह को भी ठुकरा दिया। रामकेर्ति की खंडित प्रति की कथा यहीं पर आकर रुक जाती है। 
1238 ई. में स्वतंत्र थाई राष्ट्र की स्थापना हुई थी परंतु पहले से ही इस क्षेत्र में रामायणीय संस्कृति विकसित हो गई थी। थाईवासी परंपरागत रूप से रामकथा से परिचित थे। उस समय उसका नाम स्याम था। तेरहवीं शताब्दी में राम वहाँ की जनता के नायक के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे,3 किंतु रामकथा पर आधारित सुविकसित साहित्य अठारहवीं शताब्दी में ही उपलब्ध होती है।
राजा बोरोमकोत (1732-58 ई.) की समकालीन रचनाओं में रामकथा के पात्रों तथा घटनाओं का उल्लेख हुआ है। उन्होंने थाई भाषा में रामायण को छंदोबद्ध किया जिसके चार खंडों में 2012 पद हैं। पुनः सम्राट राम प्रथम (1782-1809 ई.) ने कवियों के सहयोग से रामायण की रचना करवाई उसमें 50177 पद हैं। यही थाई भाषा का पूर्ण रामायण है। 4 राम द्वितीय (1809-24 ई.) ने एक संक्षिप्त रामायण की रचना की जिसमें 14300 पद हैं। तदुपरांत राम चतुर्थ ने स्वयं पद्य में रामायण की रचना की जिसमें 1664 पद हैं। 5 इसके अतिरिक्त थाईलैंड में रामकथा पर आधारित अनेक कृतियाँ हैं। थाई रामायण में शिव की कृपा से सीता और राम का पुनर्मिलन दिखाया गया है।
लाओस की संस्कति चाहे जितनी पुरानी हो, राजनीतिक मानचित्र पर वह मध्यकाल में ही अस्तित्व में आया। लाओस राज्य की स्थापना चैदहवीं शताब्दी के मध्य हुई है। लाओस के निवासी और इनकी भाषा को ‘लाओ’ कहा जाता है जिसका अर्थ है ‘विशाल’ अथवा ‘भव्य’। 1 लाओ जाति के लोग स्वयं को भारतवंशी मानते हैं। लाओ साहित्य के अनुसार अशोक (273-237 ई.पू.) द्वारा कलिंग पर आक्रमण करने पर दक्षिण भारत के बहुत सारे लोग असम-मणिपुर मार्ग से हिंद चीन चले गए। 2 लाओस के निवासी अपने को उन्हीं लोगों के वंशज मानते हैं। रमेश चंद्र मजूमदार के अनुसार थाईलैंड और लाओस में भारतीय संस्कृति का प्रवेश ईसा-पूर्व दूसरी शताब्दी में हुआ था। उस समय चीन के दक्षिण भाग की उस घाटी का नाम ‘गांधार’ था।3
लाओस में रामकथा पर आधारित कई रचनाएँ हैं जिनमें मुख्य रूप से फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), ख्वाय थोरफी, पोम्मचक (ब्रह्म चक्र) और लंका नाई के नाम उल्लेखनीय हैं। ‘राम जातक’ के नाम से विख्यात ‘फ्रलक फ्रलाम’ की लोकप्रियता का रहस्य उसके नाम के अर्थ ‘प्रिय लक्ष्मण प्रिय राम’ में समाहित है। ‘रामजातक’ लाओस के आचार-विचार, रीति-रिवाज, स्वभाव, विश्वास, वनस्पति, जीव-जंतु, इतिहास और भूगोल का विश्वकोश है।5 राम जातक दो भागों में विभक्त है। इसके प्रथम भाग में दशरथ पुत्री चंदा और दूसरे भाग में रावण तनया सीता के अपहरण और उद्धार की कथा है। राम जातक के प्रथम खंड में लाओस के भौगोलिक स्वरूप और सामाजिक परंपराओं का विस्तृत वर्णन है।राम जातक के द्वितीय खंड में सीता-हरण से उनके निर्वासन और पुनर्मिलन की सारी घटनाओं का वर्णन हुआ है, किंतु सब कुछ लाओस की शैली में हुआ है। अन्य जातक कथाओं की तरह इसके अंत में भी बुद्ध कहते हैं कि पूर्व जन्म में वे ही राम थे, यशोधरा सीता थी और देवदत्त रावण था। 
बर्मावासियों के प्राचीन काल से ही रामायण की जानकारी थी। ऐतिहासिक तथ्यों से ज्ञात होता है कि ग्यारहवीं सदी के पहले से ही वह अनेक रूपों में वहाँ के जनजीवन को प्रभावित कर रही थी। ऐसी संभावना है कि लोकाख्यानों और लोकगीतों के रूप में रामकथा की परंपरा वहाँ पहले से विद्यमान थी, किंतु बर्मा की भाषा में रामकथा साहित्य का उदय अठारहवीं शताब्दी में ही दृष्टिगत होता है। यू-टिन हट्वे ने बर्मा की भाषा में रामकथा साहित्य की सोलह रचनाओं का उल्लेख किया है-1 (1) रामवत्थु (1775 ई. के पूर्व), (2) राम सा-ख्यान (1775 ई.), (3) सीता रा-कान, (4) राम रा-कान (1784 ई.), (5) राम प्रजात (1789 ई.), (6) का-ले रामवत्थु (7) महारामवत्थु, (8) सीरीराम (1849 ई.), (9) पुंटो राम प्रजात (1830 ई.), (10) रम्मासुङ्मुई (1904 ई.), (11) पुंटो रालक्खन (1935 ई.), (12) टा राम-सा-ख्यान (1906 ई.), (13) राम रुई (1907 ई.), (14) रामवत्थु (1935 ई.), (15) राम सुमरू मुइ (1936 ई.) और (16) रामवत्थु आ-ख्यान (1957 ई.)।
रामकथा पर आधारित बर्मा की प्राचीनतम गद्यकृति ‘रामवत्थु’ है। इसकी तिथि अठारहवीं शताब्दी निर्धारित की गई है। इसमें अयोध्या कांड तक की कथा का छह अध्यायों में वर्णन हुआ है और इसके बाद उत्तर कांड तक की कथा का समावेश चार अध्यायों में ही हो गया है। रामवत्थु में जटायु, संपाति, गरुड़, कबंध आदि प्रकरण का अभाव है।
रामवत्थु की कथा बौद्ध मान्यताओं पर आधारित है, किंतु इसके पात्रों का चरित्र चित्रण वाल्मीकीय आदर्शों के अनुरूप हुआ है। कथाकार ने इस कृति में बर्मा के सांस्कृतिक मूल्यों को इस प्रकार समाविष्ट कर दिया है कि वहाँ के समाज में यह अत्यधिक लोकप्रिय हो गया है। यह बर्मा की परवर्ती कृतियों का भी उपजीव्य बन गया है।
रामवत्थु का आरंभ दशगिरि (दशग्रीव) तथा उसके भाइयों की जन्म कथा से होता है। कथा की समाप्ति अपने दोनों पुत्रों के साथ सीता की अयोध्या वापसी से होती है।
मलेशिया का इस्लामीकरण तेरहवीं शताब्दी के आस-पास हुआ। मलय रामायण की प्राचीनतम पांडुलिपि बोडलियन पुस्तकालय में 1633 ई. में जमा की गई थी।1 इससे ज्ञात होता है कि मलयवासियों पर रामायण का इतना प्रभाव था कि इस्लामीकरण के बाद भी लोग उसके परित्याग नहीं कर सके। मलेशिया में रामकथा पर आधारित एक रचना ‘हिकायत सेरीराम’ तेरहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच लिखी गई थी। इसके अतिरिक्त यहाँ के लोकाख्यानों में उपलब्ध रामकथाएँ भी प्रकाशित हुई हैं। इस संदर्भ में मैक्सवेल द्वारा संपादित ‘सेरीराम’, विंसटेड द्वारा प्रकाशित ‘पातानी रामकथा’ और ओवरवेक द्वारा प्रस्तुत हिकायत महाराज रावण के नाम उल्लेखनीय हैं।
हिकायत सेरीराम विचित्रताओं का अजायब घर है। इसका आरंभ रावण की जन्म कथा से हुआ है। ‘हिकायत सेरी राम’ इसी प्रकार की विचित्रताओं कथाओं से परिपूर्ण है। यद्यपि इसमें वाल्मीकीय परंपरा का बहुत हद तक निर्वाह हुआ है, तथापि इसमें सीता के निर्वासन और पुनर्मिलन की कथा में भी विचित्रता है। सेरी राम से विलग होने पर सीता देवी ने कहा कि यदि वह निर्दोष होंगी, तो सभी पशु-पक्षी मूक हो जाएँगे। उनके पुनर्मिलन के बाद पशु-पक्षी बोलने लगते हैं। इस रचना में अयोध्या नगर का निर्माण भी राम और सीता के पुनर्मिलन के बाद ही होता है। फिलिपींस में रामकथा को नये रूप-रंग में प्रस्तुत की गई है। फिलिपींस की मानव भाषा में संकलित इक विकृत रामकथा की खोज की है जिसका नाम मसलादिया लाबन है। इसकी कथावस्तु पर सीता के स्वयंवर, विवाह, अपहरण, अन्वेषण और उद्धार की छाप स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होता है।
तिब्बत के लोग प्राचीन काल से वाल्मीकि रामायण की मुख्यकथा से परिचित थे। तिब्बती रामायण की छह प्रतियाँ तुन-हुआंग नामक स्थल से प्राप्त हुई है। उत्तर-पश्चिम चीन स्थित तुन-हुआंग पर 787 से 848 ई. तक तिब्बतियों का आधिपत्य था। ऐसा अनुमान किया जाता है कि उसी अवधि में इन गैर-बौद्ध परंपरावादी रामकथाओं का सृजन हुआ। तिब्ब्त की सबसे प्रामाणिक रामकथा किंरस-पुंस-पा की है।
किंरस-पुंस-पा की रामकथा का आरंभ शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण द्वारा दसों सिर अर्पित करने के बाद उसकी दश गर्दनें शेष रह जाती हैं। इसी कारण उसे दशग्रीव कहा जाता है से होता है। यहाँ पर सीता रावण की पुत्री कही जाती है जिसका विवाह राम से होता है और अंत सीता सहित राम पुष्पक विमान से अयोध्या लौट गए जहाँ भरत ने उनका भव्य स्वागत किया। 
चीनी साहित्य में रामकथा पर आधारित कोई मौलिक रचना नहीं है। बौद्ध धर्म ग्रंथ त्रिपिटक के चीनी संस्करण में रामायण से संबद्ध दो रचनाएँ मिलती हैं। ‘अनामकं जातकम’ और ‘दशरथ कथानम’। ‘अनामकं जातकम’ का कांग-सेंग-हुई द्वारा चीनी भाषा में अनुवाद हुआ था जिसका मूल भारतीय पाठ अप्राप्य है। चीनी अनुवाद लिएऊ-तुत्सी-किंग नामक पुस्तक में सुरक्षित है।
‘अनामकं जातकम’ में किसी पात्र का नामोल्लेख नहीं हुआ है, किंतु कथा के रचनात्मक स्वरूप से ज्ञात होता है कि यह रामायण पर आधारित है, क्योंकि इसमें राम वनगमन, सीताहरण, सुग्रीव मैत्री, सेतुबंध, लंका विजय आदि प्रमुख घटनाओं का स्पष्ट संकेत मिलता है। नायिका विहीन ‘अनामकं जातकम’, जानकीहरण, वालि वध, लंका दहन, सेतुबंध, रावण वध आदि प्रमुख घटनाओं के अभाव के बावजूद वाल्मीकि रामायण के निकट जान पड़़ता है। अहिंसा की प्रमुखता के कारण चीनी रामकथाओं पर बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
‘दशरथ कथानम’ के अनुसार राजा दशरथ जंबू द्वीप के सम्राट बनने से कथा आरंभ होती है और कथा का अंत दशरथ के पुत्र लोमो के राजा बनने से होता है और लोमो के राजा बनते ही देश धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। कोई किसी रोग से पीड़ित नहीं रहा। जंबू द्वीप के लोगों की सुख-समृद्धि पहले से दस गुनी हो गई।
एशिया के पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित तुर्किस्तान के पूर्वी भाग को खोतान कहा जाता है जिसकी भाषा खोतानी है। एच.डब्लू. बेली ने पेरिस पांडुलिपि संग्रहालय से खोतानी रामायण को खोजकर प्रकाश में लाया। उनकी गणना के अनुसार इसकी तिथि नौवीं शताब्दी है। खोतानी रामायण अनेक स्थलों पर तिब्बती रामायण के समान है, किंतु इसमें अनेक ऐसे वृत्तांत हैं जो तिब्बती रामायण में नहीं हैं।
खोतानी रामायण की शुरुआत राजा दशरथ के प्रतापी पुत्र सहस्रबाहु वन में शिकार खेलने गए जहाँ से हुई और अंत लोकापवाद के कारण सीता धरती में प्रवेश कर गई। अंत में शाक्य मुनि कहते हैं कि इस कथा का नायक राम स्वयं वे ही थे।
चीन के उत्तर-पश्चिम में स्थित मंगोलिया के लोगों को रामकथा की विस्तृत जानकारी है। वहाँ के लामाओं के निवास स्थल से वानर-पूजा की अनेक पुस्तकें और प्रतिमाएँ मिली हैं। वानर पूजा का संबंध राम के प्रिय पात्र हनुमान से स्थापित किया गया है। मंगोलिया में रामकथा से संबद्ध काष्ठचित्र और पांडुलिपियाँ भी उपलब्ध हुई हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि बौद्ध साहित्य के साथ संस्कृत साहित्य की भी बहुत सारी रचनाएँ वहाँ पहुँचीं। इन्हीं रचनाओं के साथ रामकथा भी वहाँ पहुँच गई। दम्दिन सुरेन ने मंगोलियाई भाषा में लिखित चार रामकथाओं की खोज की है।4 इनमें राजा जीवक की कथा विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसकी पांडुलिपि लेलिनगार्द में सुरक्षित है।
जीवक जातक की कथा का अठारहवीं शताब्दी में तिब्बती से मंगोलियाई भाषा में अनुवाद हुआ था। इसके तिब्बती मूल ग्रंथ की कोई जानकारी नहीं है। आठ अध्यायों में विभक्त जीवक जातक पर बौद्ध प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़़ता है। इसमें सर्वप्रथम गुरु तथा बोधिसत्त्व मंजुश्री की प्रार्थना की गई है और अंत राम दानव राज को पराजित कर अपनी पत्नी के साथ देश लौट गए, जहाँ वे सुख से जीवन व्यतीत करने लगे।
जापान के एक लोकप्रिय कथा संग्रह ‘होबुत्सुशू’ में संक्षिप्त रामकथा संकलित है। इसकी रचना तैरानो यसुयोरी ने बारहवीं शताब्दी में की थी। रचनाकार ने कथा के अंत में घोषणा की है कि इस कथा का स्रोत चीनी भाषा का ग्रंथ ‘छह परिमिता सूत्र’ है। यह कथा वस्तुतः चीनी भाषा के ‘अनामकंजातकम’ पर आधारित है, किंतु इन दोनों में अनेक अंतर भी हैं परंतु पुरी कथा लोक-जीवन मंे रची-बसी है।
श्रीलंका में भारतीय महाकाव्यों की परंपरा पर आधारित ‘जानकीहरण’ के रचनाकार कुमार दास के संबंध में कहा जाता है कि वे महाकवि कालिदास के अनन्य मित्र थे। कुमार दास (512-21 ई.) लंका के राजा थे। इतिहास में इनकी पहचान कुमार धातुसेन के रूप में की है।7 कालिदास के ‘रघुवंश’ की परंपरा में विरचित ‘जानकी हरण’ संस्कृत का एक उत्कृष्ट महाकाव्य है। इसके अनेक श्लोक काव्य शास्त्र के परवर्ती ग्रंथों से उद्धृत किए गए हैं। इसका कथ्य वाल्मीकि रामायण पर आधारित है।
सिंहली साहित्य में रामकथा पर आधारित कोई स्वतंत्र रचना नहीं है। श्रीलंका के पर्वतीय क्षेत्र में कोहंवा देवता की पूजा होती है। इस अवसर पर मलेराज कथाव (पुष्पराज की कथा) कहने का प्रचलन है।8 इस अनुष्ठान का आरंभ श्रीलंका के सिंहली सम्राट पांडुवासव देव के समय ईसा के पाँच सौ वर्ष पूर्व हुआ था।9 मलेराज की कथा के अनुसार राम विष्णु के अवतार हैं।
नेपाल में रामकथा का विकास मुख्य रूप से वाल्मिकि तथा अध्यात्म रामायण के आधार पर हुआ है। नेपाली काव्य और गद्य साहित्य में रामकथा पर बहुत सारी रचनाएँ हैं। नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखागार में वाल्मीकि रामायण की दो प्राचीन पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं। इनमें से एक पांडुलिपि के किष्किंधा कांड की पुष्पिका पर तत्कालीन नेपाल नरेश गांगेय देव और लिपिकार तीरमुक्ति निवासी कायस्थ पंडित गोपति का नाम अंकित है। इसकी तिथि सं. 1076 तदनुसार 1029 ई. है। दूसरी पांडुलिपि की तिथि नेपाली संवत् 795 तदनुसार 1674-76ई. है।10
नेपाली साहित्य में भानुभक्त कृत रामायण को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। नेपाल के लोग इसे ही अपना आदि रामायण मानते हैं। यद्यपि भानुभक्त के पूर्व भी नेपाली रामकाव्य परंपरा में गुमनी पंत और रघुनाथ का नाम उल्लेखनीय है। रघुनाथ कृत रामायण सुंदर कांड उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में लिखा गया। इसका प्रकाशन नेपाली साहित्य सम्मेलन, दार्जिलिंग द्वारा कविराज दीनानाथ सापकोरा की विस्तृत भूमिका के साथ 1932 में हुआ।
नेपाली साहित्य में प्रथम महाकाव्य रामायण के रचनाकार भानुभक्त का उदय सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना है। पूर्व से पश्चिम तक नेपाल का कोई ऐसा गाँव अथवा कस्बा नहीं है जहाँ उनकी रामायण की पहुँच नहीं हो। भानुभक्त कृत रामायण वस्तुतः नेपाल का ‘रामचरितमानस’ है। भानुभक्त का जन्म पश्चिमी नेपाल में चुँदी-व्याँसी क्षेत्र के रम्घा ग्राम में 29 आसाढ़ संवत 1871 तदनुसार 1814 ई. में हुआ था। संवत् 1910 तदनुसार 1953 ई. में उनकी रामायण पूरी हो गई थी,11 किंतु कहा जाता है कि युद्धकांड और उत्तर कांड की रचना 1855 ई. में हुई थी।12
भानुभक्त कृत रामायण की कथा अध्यात्म रामायण पर आधारित है। इसमें उसी की तरह सात कांड हैं, बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा, सुंदर, युद्ध और उत्तर। बालकांड का आरंभ शिव-पार्वती संवाद से हुआ है। युद्ध कांड में राम का अयोध्या प्रत्यागमन, भरत मिलन और राम राज्याभिषेक का चित्रण हुआ है।
जबकि उत्तरकांड में राम द्वारा लक्ष्मण के परित्याग के उपरांत उनके महाप्रस्थान के बाद कथा की समाप्ति हुई है।
इस प्रकार भानुभक्त कृत रामायण नेपाली भाषा की महान रचना है जो कालांतर में संपूर्ण नेपालवासियों का कंठहार बन गई। 
संदर्भ
1. रामकथा, पृ. 46
2ण् त्ंहीनअपत ंदक ल्ंउंउवजवए ज्ीम त्ंउंलंदं पद ब्ीपदंए च्च्ण् 27.30
3ण् ठंपसलए भ्.ॅ.ए ज्ीम त्ंउंलंदं पद ज्ञीवजंदए श्रवनतदंस व ि।उमतपबंद ैवबपमजलए टवस.59ए 1939ए च्च्.460.468
4ण् क्ंउकपद ैनतमदए ज्ण्ैण्ए ज्ीम त्ंउंलंदं पद डंदहवसपंए ज्ीम त्ंउंलंदं ज्तंकपजपवद पद ।ेपंए च्ण् 657 
5ण् त्ंहीअंदए टण्ए ज्ीम त्ंउलंदं पद ळतमंजमत प्दकपंए च्.24 
6ण् क्तण् श्रवदहए श्रण्ॅण्ए ज्ीम ेजवतल व ित्ंउं पद ज्पइमजए।ेपंद टंतपंजपवदे पद त्ंउंलंदंए च्ण् 163 
7ण् प्इपकए च्.173
8ण् त्ंहीअंदए टण्ए ज्ीम त्ंउंलंदं पद ळतमंजमत प्दकपंए च्.32
9ण् भ्ंतंए डपदवतनए त्ंउंलंदं ेजवतपमे पद ब्ीपदं ंदक श्रंचंदए ।ेपंद अंतपंजपवदे पद  त्ंउंलंदंए च्च्.347-48
10ण् भ्ंतंए डपदवतनए थ्मगजनंस जीमउम व ित्ंउंलंदं पद श्रंचंदए ज्ीम त्ंउंलंदं जतंकपजपवद पद ।ेपंए च्च्.341-45
11ण् ळवकानउइनतंए ब्ण्म्ण्ए त्ंउंलंदं पद ैतपसंदांए ज्ीम त्ंउंलंदं ज्तंकपजपवद पद ।ेपंए च्.445
12ण् प्इपकए च्.438
13ण् ज्पसंा ैपतपए श्रण्ए त्ंउंलंदं पद ैतपसंदां ंदक पजे विसा अमतेपवद
14ण् ळवकानउइनतंए ब्ण्म्ण्ए वच.बपज.ए च्.438
15ण् ठंदंतरममए छण्त्ए ज्ीम त्ंउंलंदं जीमउम पद छमचंसमम ।तजए ।ेपंद टंतपंजपवद पद त्ंउंलंदंए च्.155 
16. शर्मा, तारानाथ, नेपाली साहित्य का इतिहास, पृ. 32
17ण् ैंदातपजलंदंए ज्ञंउंसंए त्ंउंलंदं पद छमचंसपए ज्ीम त्ंउंलंदं ज्तंकपजपवद पद ।ेपंए च्ण् 368 
18ण् ैंदातपजलंदंए ज्ञंउंसंए वच.बपजए च्ण् 378

 

सुमन रानी
शोधार्थी, पी-एच.डी. हिन्दी
पंजीकृत संख्या: भ्लध्च्ीण्कण्;भ्पदकपद्धध् 15ध् 2017
शोध निर्देशक
प्रो. मन्जुनाथ एन. अंबिग
अध्यक्ष हिन्दी विभाग
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा
एरण्आकूलम (केरल)