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व्यंग्य - हरी चाय पर चर्चा
July 18, 2020 • मदन गुप्ता सपाटू
व्यंग्य
हरी चाय पर चर्चा
 
    गुलाब तो गुलाब है , उसे गेंदा कहने से उसकी खुशबू में क्या फर्क पड़ता है ? नाम में क्या रखा है, ऐसे विषयों पर अंग्रेजों से लेकर अपन के साहित्यकारों तक ,सबने अब तक काफी  कलम घिसाई कर ली है। लेकिन आज  आप चाय को महज  चाय नहीं कह सकते। चाय के रंग ढंग बिल्कुल बदल गए हैं।
   21वीं सदी में हमें यह जरुर समझ आ गया कि चीन से चली  और अब भारत में उगाई चाय में बहुत कुछ रखा है। अब तो यह जुमला भी घिस चुका है कि चाय वाला कैसे पी.एम बन गया ? इस एपीसोड के बाद  फुटपाथ पर चाय बनाने वालों की तो निकल पड़ी, साथ साथ पकोैड़े वालों का भी स्टेट्स अपडेट हो गया और  रातों रात ,मार्किट वेल्यु में भी उछाल आ गया।
   पहले बुद्धिजीवी, साहित्यकार, फिल्मकार, अफसर, मंडी हाउस के और  नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा स्ट्र्ग्लर ,यहां तक कि नेता लोग कॉफी हाउस में कॉफी पर चर्चा करते या कभी कभी भड़ास निकालते हुए अक्सर दिख जाते थे। क्नाट प्लेस का इंडियन कॉफी हाउस इसका गवाह रहा है। बहुत से पत्रकारों व लेखकों ने अपनी रचनाओं का मसाला इसी जगह ढूंढा है।
   किसी दफतर में चाय फुटपाथ सें मंगवाई जाए तो पीने और पिलाने वालों का स्टैंडर्ड , गिरा गिरा सा लगता है। वही चाय, टी बैग वाली आ जाए तो दोनों की गर्दनें  कुछ तन कर एक दूसरे को देखने लग जाती हैं। और जब आपसे पूछ लिया जाए कि सर ग्रीन टी लेंगे , या लेमन टी, तुलसी - जिंजर वाली ...... ब्लैक टी   या दूध वाली...फीकी या शुगर- फ्री वाली  तो कहीं अंदर ही अंदर लगने लगता है कि भई ऐंवें ही नहीं , अपना भी कोई स्टेट्स है ! ऐसा नहीं है कि टी ग्रीन है या ब्लैक या 10- 12 उबाले वाली , अदरख डाली हुई, च्वाईस पूछने से अगले का स्टेट्स , बढ़ जाता है। मलाई मार के या दुद्ध वाली या कटिंग चाय या चीनी रोक के - पत्ती ठोक के वाली चाय से बंदा खुद को सड़क छाप सा महसूस करने  लगता है।
 कोरोना काल में ग्रीन टी का खूब प्रचार किया गया। चाय की  भी टी. आर. पी बढ़ गई। हमें तो अब पता चला कि इसमें तो कोरोना से लड़ने की सारी गोलियां भरी पड़ी हैं। व्हॉट्स एप पर हमारे एक बंधु ने फॉरवर्डिड मैसेज घुमाया कि दिन में और कुछ करो न करो  बस सारा दिन ग्रीन टी पीते रहो ....कोरोना की ऐसी कम तैसी। भाग जाएगा जहां से आया । सबको मालूम है कि चाय और कोरोना कहां से आया।
  ग्रीन टी एक - फायदे अनेक। दूध की बचत, नकली दूध का कोई खतरा नहीं। चीनी का खर्चा बंद। इलैक्ट्र्कि कैटल में तीन मिनट पानी उबाला, कप में टी बैग डाला और मामला ओवर। न चाय वाले की इंतजार में मेहमान को ज्यादा देर  बर्दाश्त करने की जरुरत । सामने वाला भी कुर्सी से दो ढाई ईंच उपर कि साहब ने चाय अपने  पर्सनल हाथों से सर्व की बेशक उसे गटकने में उसे पत्नी याद आ रही हो लेकिन मजाल है उसके चेहरे पर कोई शिकन  नजर आए,  फीलिंग हाईली ऑब्लाइज्ड की मुख मुद्रा बना कर रखेगा और ग्रीन टी के दो चार फायदे और जोड़ जाएगा।
  ग्रीन टी को हरी चाय बोलने में जुबान को वैसी ही तकलीफ होती है जैसे इंडिया को भारत बोलने में होती है। कभी आपने हरी चाय कहते किसी को सुना ? क्योंकि आज ग्रीन टी स्टेटस सिंबल है। दो घूंट जाते ही दिमाग की बत्ती जल जाती है और आप विशुद्ध  बुद्धिजीवी , क्रिटिक,  विचारक, चिंतक, टिप्पणीकार, साहित्यकार बन जाते हैं और देश के ज्वलंत विषयों के महारथी बन जाते हैं। आप बताते हैं कि दुर्दांत बदमाश का एन्कांउटर था या सरेंडर, सरकार को क्या करना चाहिए था क्या नहीं, मंहगाई को कैसे रोका जा सकता है, भारत की अर्थव्यवस्था कब ठीक होगी, कोरोना कब जाएगा, वैक्सीन कब बनेगी, इंडिया को चाईना से कैसे लड़ना चाहिए, परमाणु बम कब काम आएगा.......... वगैरा वगैरा। बेशक घर में आप की चूं तक न निकलती हो पर चाय पर चर्चा ऐसे ही विषयों पर चलती है।
  अब तो ग्रीन टी इतनी पापुलर होने लगी है कि कल कुछ राजनीतिक पार्टियां हरी चाय और  केसरिया सी दिखने वाली ब्राउन चाय के मामले में धार्मिक रंग ही न लेले और बैठे ठाले हर टी वी चैनल पर हरी , लाल ,काली , सफेद चाय पर राजनीतिक चर्चाएं छिड़ जाएं। चाय पर चर्चा के समय लोकतंत्र, असहिष्णुता, देश प्रेम, कश्मीर, अर्थव्यवस्था, आपसी खुंदकें  जैसे विषय बैंक के ए .टी .एम से उगलते हुए नोटों की तरह बाहर आने लगें।
  यह बात भी दीगर है कि ग्रीन टी पर चर्चा वाले , घर आते ही दूध में 10 - 12 उबाले वाली, कुटी अदरख सहित, चीनी रोक के पत्ती ठोक के , दूध - पत्ती वाली चाय, पिर्च- प्याले में सुड़क सुडक़  कर पीते हुए ,आन्ने वाली थां  ; औकात द्ध पर बीवी का आदेश मानते हुए, लॉक डाउन में असाईन की गई डयूटी को अनलॉक होने के बावजूद वॉश बेसिन की ओर प्रस्थान कर जाते हों ......।
- मदन गुप्ता सपाटू